मेरी कहानी

मेरी कहानी: जब पाकिस्तान के लोगों ने मेरे जेब से एक रूपये भी खर्च नहीं होने दिए

तर्कसंगत

November 19, 2019

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ये उन दिनों की बात है जब  पाकिस्तान भी भारत का अंग हुआ करता था, मेरा परिवार 1947 के पहले चिन्योट जिला में रहता था और मेरे पिता का जन्म भी वहीं हुआ लेकिन एक ऐसी रात आई जब सब कुछ बिखर सा गया 1947 की वो काली रात जब धर्म-जाती के नाम पर हिन्दू मुस्लिम एक दूसरे को मरने-मारने पर उतावले हो गये उसके बाद जो हुआ उससे हम भली भांति परिचित है भारत और पाकिस्तान के बीच एक सरहद का निर्माण हुआ जिसके नीव सिर्फ और सिर्फ नफरत के आधार पर बनी थी उसका परिणाम ये हुआ कि न जाने कितने परिवार बेघर हुए और न जाने कितने मासूमो की जान गई, जी हां उसमे से एक मेरा भी परिवार था।

1947 के दंगे के बाद चिन्योट शहर छोड़ मेरा परिवार दिल्ली में रहने के लिए आ गया और मेरा जन्म सन् 1955 में हुआ, बचपन और जवानी भारत की धरती पर बिता लेकिन मेरी दादी और पिता जी कभी- कभी चिन्योट के बारे में जिक्र किया करते थे। मेरी उम्र 13 साल की होगी जब दादी ने हमारे इतिहास के बारे में बताना शुरू किया उन्होंने बताया कि चिन्योट में अपना घर था जो कि अब पाकिस्तान का हिस्सा है और हमारी वहाँ सोनार की दूकान थी और बीते सुनहरे पल के बारे में  सुनाते वक्त दादी की आँखों में आँसू आ जाते फिर कहने लगती कि हमें तो पता ही नहीं था कि हिन्दू और मुस्लिम में क्या फर्क है होता है, उन्होंने कमरा नंबर भी बताया गलियों का वख्यान भी किया और इसके बाद ये सारी बाते मेरे दिल में बस गई मुझे याद है दादी ने बताया था कि वहाँ 4 गालिया थी और हमारे घर का रूम नंबर 4 था। दिल में बहुत जिज्ञासा थी कि अपने पुरखो की निशानी देखूं जहाँ से हमारा इतिहास आरंभ हुआ था।

 

 

मैंने अपने तरफ से कई बार प्रयास किया कि चिन्योट जीते जी देख लूँ, लेकिन चिन्योट जो अब पाकिस्तान का भाग है इस लिए वहाँ जाना न के बराबर था लेकिन मैने हार नहीं मानी और वीसा लेने के लिए हर वक्त कोशिश करता लेकिन जभी- भी पाकिस्तान एम्बेसी वीसा के लिए गया उन्होंने साफ इंनकार कर दिया क्यूंकि मैं हिन्दू हूँ और वीसा न देने का सही कारण भी बताया कि पहला कारण ये था कि वहाँ सब लोग नॉनवेज खाते है,और आप ब्राह्मण हो, दूसरा कारण यह था कि अब वहाँ पर आपका कोई रिश्तेदार है नहीं तो आप कहाँ रहोगे ? अब जब मैंने इसके बारे में सोचा तो ऐसा लगा कि एम्बेसी वाले बिलकुल सही बोल रहे है। मैं हूँ हिन्दू और वहाँ सब नॉनवेज खाते और मैं रहूँगा कहाँ अब धीरे-धीरे उम्मीद की किरण ढल रही थी, लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि जिसका मुझे आभास भी नहीं था, हम जहाँ रहते है नई दिल्ली में वहाँ से पाकिस्तान एम्बेसी बहुत नजदीक है जो कि चाणक्यपुरी में स्थित है। अब जो आगे होता है वो काफी दिलचस्प है, हमारे यहाँ सीता होटल है, ऐसा है कि जो होटल के मालिक है वो हमारे परम मित्र है, उन्होंने एक दिन फ़ोन किया और बोलने लगे यहाँ पर लाहौर से कुछ लोग आये है जियारत करने के लिए और अपने होटल में ही ठहरे है, इनसे बात करके देखो कुछ हो सकता है तो देख लो और मै निकल पड़ा होटल के लिए जो कि मेरे घर से पांच मिनट की दूरी पर है, अब वहाँ पहुंचा और उनसे मिला जैसे मैंने उनसे चर्चा कि तो पता चला वो मेरे पड़ोसी है जहाँ हम पहले रहा करते थे, वो कुदरती वही के थे मैंने उनको बताया कि चिन्योट में हमारा एक समय पर मकान और दुकान था मेरे दादा जी वहाँ सोने के व्यापारी थे तथा मेरे वालिद का जन्म भी वही हुआ था, उनको मकान का नंबर भी बताया जैसे दादी ने मुझे बताया था और मेरी बहुत हसरत है कि मैं भी अपना मकान देखूं लेकिन मैंने बहुत बार कोशिश की वीसा लेने के लिए पर अभी तक वीसा मिला नहीं है ये सब सुनते ही जो पाकिस्तान से जो आये थे जनाब नदीम भाई उन्होंने तुरंत कहा कि आप बिलकुल चिंता न करे मैं चिन्योट जाने के बाद कुछ प्रयास करता हूँ। 

 

 

मै इस ख्याल में था कि क्या पता फ़ोन भी आएगा कि नहीं, किन्तु हुआ यूँ कि लगभग 15 दिनों बाद जनाब नदीम जी का फ़ोन आता है और जनाब कहने लगे कि मैं अपने प्रॉपर्टी और शॉप के कुछ पेपर पोस्ट के माधयम से आपको भेज रहा हूँ और आप ये सारे पेपर लेकर जाइये और पाकिस्तान एम्बेसी में उनको पुरे दस्तावेज़ दिखा देना हो सकता है आपको वीसा लेने में आसानी हो, अब दस्तावेज़ मिलते ही मैं सब पेपर लेकर दिल्ली में स्थित पाकिस्तान एम्बेसी लेकर पंहुचा और वहाँ के अफसर को सारे दस्तावेज़ दिखाया जिसमे इनकम टैक्स के और प्रॉपर्टी के कुछ पेपर थे, ये सब देखर वो हैरान रहे गया और मुझे कहा जनाब आखिर मसला क्या है, आप तो खुद हिन्दू हो और वहाँ कोई हिन्दू नहीं है, कैसे जानते हो नदीम जी को फिर मैंने बतलाया कि यहाँ आये थे वो जियारत करने के लिए हज़रात निज़ामुद्दीन दरगाह पर, हमारी मुलाकत हुई, और चर्चा होने के बाद पता चला कि इत्तेफाक से वो हमारे पड़ोसी निकले और उनका भी चिन्योट में गोल्ड कि दुकान है इसके बाद सारे दस्तावेज़ देखने के बाद एम्बेसी के अफसर ने कहाँ ” मै माफ़ी चाहता हूँ ” मै मजबूर हूँ आपको वीसा नहीं दे सकता हूँ और उनको इतनी मोहब्बत है आप से तो उनको कहीये कि इस्लामबाद में हमारा इंटीरियर डिपार्टमेंट तो उनसे बोलो वहाँ से अप्लाई करने के लिए और हो सकता आपको वहाँ से वीसा मिल जाये बाकि ये सारे दस्तावेज़ ठोस है फिर इस तरह से वीसा देने से इंकार कर दिया।

 

 

 

पाकिस्तान एम्बेसी से बाहर निकलते ही जनाब नदीम भाई को फ़ोन किया और  इन सभी समस्या के बारे में इत्तेला किया इसके बाद जनाब ने कहा ठीक है मुझे कुछ वक्त दीजिये मै यहाँ से प्रयास करता हूँ और इसके बाद मुझे लगता है लगभग छह महीने नदीम भाई ने बड़ी कोशिश की, क्योंकी चिन्योट से इस्लामबाद 400 किलोमीटर दूर पड़ता है, और उनकी खुद गोल्ड की दूकान है जो की एक चिन्योट में और दूसरा फैसलाबाद में है, काम में व्यस्त होने के बावजूद भी उन्हें खुद निजी रूप में चार-पांच बार पाकिस्तान एम्बेसी जाना पड़ा और आप यकीन मानिये की लगभग आठ महीनो के बड़े प्रयास के बाद उन्होंने  मेरा और मेरी धर्मपत्नी का वीसा भेजा, अब मैं वीसा लेकर एम्बेसी गया, तो अफसर हैरान हो गया उसने मुझे चेयर पर बिठाया और कहने लगा भाई मामला क्या है ? क्यों जाना चाहते हो पाकिस्तान? फिर अफसर को पूरी बात बताई की मेरा जन्म हुआ है दिल्ली में पर  मेरे पिताजी चिन्योट,पंजाब से थे और हमारी गोल्ड की दुकान थी और मैंने घर का नंबर भी बताया था जो की 4 नंबर मकान था, विशेष रूप से वहाँ सिर्फ चार ही गलियां थी जहाँ हम रहते थे। मेरी कुछ यादे शेयर की मैंने कहा मेरी बहोत हसरत है, मैं वो स्थान देखना चाहता हूँ जहाँ मेरे दादा जी की दुकान थी,  फिर आखिर में मुझे वीसा दे दिया गया।

जनाब, फिर 9 नवंबर 2017 को मैं भारत से पाकिस्तान के लिए रवाना हुआ अपनी पत्नी के साथ और हम जब अटारी बॉर्डर पर पहुंचे तो वहाँ भी बहुत चेकिंग हुई और फिर कुछ सुरक्षा कर्मी  डराने लगे क्यों जा रहे हो बडा खतरनाक देश आप के साथ आपकी वाइफ भी है और आप ऐसा खतरा मोल ले रहे हो इस तरीके से डराने का प्रयास किया फिर मैंने सहेज में कहे दिया अरे कोई खा तो नहीं जायगा मुझे, मेरी 63 साल उम्र है ये बुढ़िया 61 की है कोई छीन लेगा क्या हमसे, मैंने कहा मैं जरूर जाऊंगा किसी भी हालत में, चाहे कुछ भी हो जाये, फिर यह किसी भी तरह से जनाब जब हम चिन्योट पहुंचे तो बता नहीं सकते की वहाँ के लोग वहाँ की अवाम  किसी के दिल में कोई भेदभाव वाली बात नहीं थी कि हम भारत से आये है।

 

 

जनाब नदीम भाई ने चिन्योट शहर में पहुंचते ही हमारे रहने की व्यवस्था की, दो कमरे का रूम हमें दिया तथा हमारे शाकाहारी होने के कारन हमें अलग से नया बर्तन एवं दाल – चावल और इत्यादि वस्तुए उपलब्ध करा कर दी और इस तरह हमें अपने परिवार का के अंग बना लिया गया था। जब हम खाना बनाते तो मोहल्ले के लोग भी साथ बैठ कर साथ भोजन करते और भारतीय अंदाज़ में भोजन चख कर लोगो का दिल भर आता, सुबह की चाय और शाम की चाय स्थानिक नागरिको के साथ होती थी। हाँ एक किस्सा ऐसा हुआ जहाँ पर बहुत बड़ी संख्या में हमें लोग देखने आये खास करके हमारी पत्नी को जैसे कोई अजूबा आ गया हो चिन्योट की धरती पर, सच कहूँ तो भारतीय संस्कृति वहाँ के महिलाओ को भा गई, और वहाँ की अनेक महिला बस धर्मपत्नी से भारतीय संस्कृति एवं पहनावे के बारे में चर्चा करती थी, जैसे की मांग टिका, कभी बिंदी के बारे में पूछना और साड़ी के बारे में तारीफ करना और बातो ही बातो कहना की आज तक हमने ऐसी संस्कृति सिर्फ सीरियल में ही देखी है इस तरह से वहाँ के लोग दिल से जुड़ रहे थे।

 

 

जनाब जब मैं अपना शहर घूमने निकला तो देखा कि वहाँ की पुलिस अफसर भी बहुत सहायक थे मैं आप को एक और किस्से से रूबरू कराता हूँ एक दिन मैं बाजार में घूमने निकला तो पता चला कि सामने कमिश्नर ऑफ़ पुलिस ऑफिस है तो मैं वहाँ चला गया तो मेरी मुलाकात सीधे अफसर से हुई उन्हें मैंने अपना परिचय दिया कि मैं दिल्ली से हूँ और यहाँ पर अपने पुरखो का माकन देखने आया हूँ और मेरे वालिद का जन्म चिन्योट में  हुआ था और जो मेरी माँ थी वो लायलपुर से थी जो की अब फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है। मैंने दरख्वास्त की सर मैं अपने पुरखो की निशानी देखना चाहता हूँ और मेरे पास पूरा पता है, मेरी बहुत हसरत है, मैं इंडिया से आया हूँ एवं मेरे पास 15 दिनों का वीसा है,तो जनाब आप यकीन माने उसने मुझे 24 घंटो का वीसा दिया यानि कि अनुमति दी उस स्थान पर जाने का वो सहेज में कहने लगे आप चले जाओ आराम से कौन रोकेगा आपको सब हमें ही तो देखना है, मैं तोड़ा सा सतर्क हो गया मैंने हंसी के अंदाज़ से कहा सर मुझे दूसरा कुलभूषण जाधव नहीं बनना है, कृपा करके लिखित रूप में दे दीजिये। आप यकीन माने उन्होंने हमें 24 घंटो की अनुमति लिखित रूप में दी, मैंने कहा सर आप विश्वास करे आप 24 घंटो का वीसा दे रहे है हम 20 घंटो में आ जायेंगे और फिर हम मियाँ-बीवी निकल पड़े अपने शहर की ओर जिसके लिए हम आये थे, अब इसके बाद हमने जो नज़ारा देखा, ऐसा लगा की जो कल्चर पाकिस्तान का है वो हूबहू भारत जैसा लग रहा था कही कोई फर्क नहीं है अच्छा आप वहाँ के बाजार देखो जैसे हमारे यहाँ दिल्ली में जामा मस्जिद है पुरानी दिल्ली में लगता है सब बिलकुल एक लग रहा था कोई फर्क नज़र नहीं आ रहा था और ना तो कोई भाषा में ज्यादा फर्क दिखा। 

 

 

चिन्योट पहुंचते ही पड़ोसी अपने-अपने घर ले जाते और हर बार किसी और के घर पे खाना खाने का अवसर मिला हमने पूरी तरह से 12 दिनों का भरपूर आनंद लिया। एक और मजेदार बात है हमारे से मिलने के लिए कई पत्रकर आये और कहने लगे की मैं आप का इंटरव्यू लेना चाहता हूँ मैंने कहा देखिये मैं कोई व्यक्ति विशेष नहीं हूँ मैं तो अपना वतन देखने आया हूँ, मैं कोई पोलिटिकल आदमी भी नहीं हूँ, कैमरा पर बात न करते हुए ऐसे चर्चा करते फिर जनाब ने एक सवाल कर दिया कि आपके यहाँ हमारे देश के बारे में चर्चा बहुत होती है, फिर मैंने जवाब में कहा देखिये महोदय मैं कोई लीडर नहीं हूँ माफ़ी चाहता हूँ, मैं दो चीज़ो पर कभी बात नहीं करता पहला तो राजनीती और दूसरा किसी भी धर्म और जाती पे क्यूंकि  ये दोनों भी चीज़े ऐसे है कि रिश्ता ख़राब करती है, उस एक पल के लिए लगा कि आज भी जो नफरत की एक दिवार बनी हुई है उसका कारण सिर्फ यही है कि आज के समय में मीडिया गलत तरीके से दोनों देश को निचा दिखा रही है कही धर्म के नाम पर लड़ा रही है तो कही जाती के नाम पर आखीर कौन है इसका जिम्मेदार ?

 

 

पाकिस्तान के जिस स्थान पर हम रुके थे वहाँ पर बस प्यार ही पाया किसी ने भी इंडिया के बारे में बुरा-भला नहीं कहा बस यही बाते हो रही थी कि भारत में चीनी का भाव क्या है चावल का भाव क्या ? और मैंने भी वहाँ के आर्थिक स्थति को देखा आप यकीन नहीं मानोगे कि मुझे लगा ही नहीं कि मैं पाकिस्तान में हूँ या भारत में हूँ, ये सब सुनके लगा कि जनता को तो फ़िक्र है बस रोज़मर्रा के जिंदगी की फिर धर्म के नाम पर आग कहाँ से लग जाती है ये बहुत बड़ा सवाल है ? मैंने चिन्योट और फैसलाबाद का वो हर कोना देखा जिसका जिक्र मेरी दादी और वालिद किया करते थे। मेरे एक मित्र है अगस्त्य कपूर जिनका घर भी पाकिस्तान में हुआ करता था उनके और मेरे एक खास दोस्त है जिनका बाटा का शो-रूम है पाकिस्तान में तो उन्होंने एक कार दे रखी थी वो भी ड्राइवर समेत जहाँ जाना हो कार से जाना होता था आप यकीन मानिये उन्होंने मुझे एक सिगरेट भी अपने पैसे नहीं खरीदने दी, ये तो कुछ नहीं साहब जब मैं कोई दुकान से कोई सामान लेने भी जाता और जब पैसे देने जाता और उन्हें जैसे पता चलता कि मेरे परिवार यही पर रहा करता था और बंटवारा होने के बाद भारत जाना पड़ा तो वो मुझसे पैसे लेने से भी इंकार करते,और बड़े प्यार से बात कर मेरे से पूछते सब कैसे है घर वाले? मैं इतना हैरान था कि इतनी मोहब्बत इनके दिलो में है। हम जब लौट रहे थे भारत के लिए आप यकीन मानो वहाँ के लोगो ने इतने तोफे दिए की मैं तो बहुत हैरान था की दोनों तरफ पॉलिटिक्स इतनी गन्दी की यहाँ के नेता भारत के नेता तो गालिया दे रहे है और वहाँ के नेता यहाँ के नेता को….

 

 

मैं जिंदगी के वो 12 दिन कभी नहीं भूल सकता हूँ जो मैंने चिन्योट में गुजारे, मुझे याद जब मेरी पत्नी खाना बनाती तो वहाँ के लोग कहते की भाभी जी थोड़ा ज्यादा बनाना हम भी चखेंगे और फिर साथ में बैठ कर भोजन करना वो पल अभी भी आँखो से ओझल नहीं होता है तथा एक बार हुआ यूँ कि जो हमारे दादा जी के शागिर्द थे हमारी मुलाकात उनसे हुई जिनकी उम्र लगभग 88 साल होगी, उन्होंने बताया कि इस पुरे चिन्योट में कुछ लोग थे जिन्होंने उस समय 10 वी कक्षा पास की थी, उसमे एक मेरे पिता जी थे उस बजुर्ग से इतना प्यार मिला की वो माहौल देख कर मेरी आँखे नाम हो गई उस वक्त ऐसा लगा कि हम सब एक है हिन्दू और मुस्लिम का कोई टैग नज़र ही नहीं आ रहा था। जनाब नदीम भाई एवं हाजी जावेद साहब, काशिफ़ भाईसाब ने हर पल मेरी मदद की इन्ही के कारन मुझे वीसा मिला और मुझे चिन्योट जाने का मौका मिला। मेरा सौभाग्य था कि मुझ पर एक और रहमत हुई जहाँ पर मुझे हज़रत पीर शाह दौलत दरबार में सजदा करने का मौका मिला जो कि रजोया सादात चिन्योट में स्थित है। ये सफर 9 नवम्बर 2017 को शुरू हुई थी और 20 नवम्बर 2017 को संप्पन हुई। ये सफर मैं अपने जीवन काल में कभी नहीं भूल सकता हूँ।

 

 

मैं आखरी रात को घर बैठे बस यही सोच कर बड़ा हैरान था कि एक अनजाना व्यक्ति जो मुझे अच्छी तरह से नहीं जनता है मैं उन्हें अच्छी तरह से नहीं जानता हूँ बस एक मुलाकात से उन्होंने मेरी मदद की हमें वीसा दिलाया वो भी बिना किसी भेद- भाव के कि मैं हिन्दू हूँ, और मैं भारत से हूँ  ये वही लोग है जिन्होंने ने मेरे जेब से एक रुपया भी खर्चा नहीं होने दिया बल्कि हर पल मेरे साथ रहे भरपूर प्यार दिया जिस दिन हमें भारत के लिए रवाना होना था स्थानिक लोगो ने मिठाई से भरे डिब्बे दिए हमने बस उनके आँखों में इंसानियत देखी और कुछ नहीं ये देखर मुझे मेरी दादी की बाते याद आने लगी की वो भी एक दौर था जब हिन्दू, मुस्लिम, सिख धर्म का नाम वाला रंग लोगो पर नहीं चढ़ा था सिर्फ एक ही धर्म का रंग लोगो पर चढ़ा था वो केवल और केवल इंसानियत धर्म था। अंत में चंद आसार याद आ गई जो एक महान कवी विवेक शौक़ अक्सर कहा करते थे “मस्जिद तो हुई हासिल हमको खाली ईमान गँवा बैठे।”

 

 

 

रिपोर्ट : गौरव

स्रोत  : अगस्त्य कपूर 

इस कहानी के ज़रिये तर्कसंगत कि ये कोशिश है कि पाकिस्तान से अपने रिश्ते को हम न्यूज़ के प्राइम टाइम के तर्ज़ पर नहीं बल्कि एक इंसान की दूसरी इंसान की जुड़ाव, प्यार, भाईचारे के नज़र से भी देखें। भारत पाकिस्तान कि ऐसी कई कहानियां होंगी जो हम और आप नहीं जानते, हमारी कहानी इस पहल का हिस्सा है कि हम पड़ोसी मुल्क को उसकी सियासत से नहीं उसके लोगों से पेहचाने। 

 

 

 

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