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बिहार के शिक्षकों की गुहार: क्यों छीन रहे हमसे रोज़गार और बच्चों से भविष्य सरकार

तर्कसंगत

November 20, 2019

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2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “डिजिटल इंडिया” की मुहीम शुरू की जिसमे पूरे देश को डिजिटली साक्षर बनाने की कामना करता है. इसका एक अहम हिस्सा भारत के कोने कोने में कंप्यूटर की शिक्षा उपलब्ध हो. इस सपने को साकार करने के लिए बच्चों का उत्साह और साथ में उचित शिक्षकों का होना भी महत्त्वपूर्ण है. 

 

कॉन्ट्रैक्ट पर हुई थी बहाली

बिहार में भी यही पहल जारी की गयी. 2012 में कई कंप्यूटर शिक्षकों की राज्य के माध्यमिक विद्यालयों में नियुक्ति मिली थी. इन शिक्षकों को 5 साल के कार्यकाल का अनुबंध मिला था. 2017 में  इसी अनुबंध का समापन हुआ. मगर 22 अगस्त  2016 से शिक्षकों ने अपनी नौकरी स्थायी करने की मांग की जिससे इनकी रोज़गार पर कोई असर न पड़े और साथ ही बिहार के सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा पर भी असर न पड़े. 

 5 सितम्बर को आप और हम इस दिन को शिक्षक दिवस के तौर पर जानते है. इससे बड़ी व्यंगय की बात तो शायद हो ही नहीं सकती की बिहार की सरकार ने इससे शुभ दिन शायद नहीं चुना होगा इन् शिक्षकों को बेरोज़गारी का उपहार देने के लिए. अंततोगत्वा 5 सितम्बर 2017 में उनकी इस कॉन्ट्रैक्ट का अंत हुआ और हाजारों कंप्यूटर शिक्षक एक झटके में बेरोज़गार हो गए. 



 

तकरीबन तीन सालों से पटना के गर्दनीबाग में बेरोज़गार कंप्यूटर शिक्षक धरने पर बैठे है और इनमें से कुछ शिक्षक अनशन पर भी बैठे हैं. इस धरने को अब 813 दिन और अनशन को 804 दिन हो चुके हैं. तर्कसंगत से बात करते हुए कंप्यूटर शिक्षक और बिहार कंप्यूटर शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन के मीडिया प्रभारी रुपेश सिंह ने अपनी पीड़ा व्यक्त करी, “ हमारी नौकरी 5 साल के लिए दी गयी थी पर सरकार ने यह हमसे छीन लिया. हमारी रोज़गारी ख़तरे में है और सरकार हमें अनसुना कर रही है.”

 

स्कूल के कंप्यूटर क्लास पर लग गए ताले

तर्कसंगत ने जब इस बात का पता लगाया तो जाना कि इसका असर राज्य के विद्यालयों में भी पड़ा है. सासाराम के बिलारी माध्यमिक विद्यालय में कंप्यूटर लैब से अधिकतम उपकरणों की चोरी हो गयी. क्यूंकि पढ़ने वाले और पढ़ने वाले थे ही नहीं तो होर भी अपना हाथ साफ कर गए. पटना के आर्य कन्या उच्च विद्यालय, पूर्व चम्पारण के पूर्व चम्पारण काटखेमवा माध्यमिक विद्यालय और ऐसे ही कई विद्यालयों में लैब पर ताला लगा हुआ है और बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा नहीं मिल रही है. 

 

कई तरह से प्रदर्शन किया एक साथी भी खोया

शिक्षकों  ने अपने आंदोलन को एक दिन भी नहीं रोका. एसोसिएशन के अध्यक्ष अविन्दर प्रसाद यादव ने सरकार के शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर अपनी चिंताएं भी व्यक्त की. एक मशाल मार्च भी निकाली गयी जिसमे सारे शिक्षक शामिल हुए. एक प्रतिनिधि मंडल मुख्यमंत्री नितीश कुमार से भागलपुर में मिलकर अपनी परेशानी ज़ाहिर की उनको आश्वासन भी मिला. मगर वो सब केवल कागज़ पर ही रह गया.  

आंदोलन के दौरान कुछ व्याख्याओं की वजह से गाड़ी कई बार पटरी से भी उतरी. कई शिक्षकों के स्वास्थ्य पर बहुत भारी असर पड़ा. रुपेश कुमार सिंह की तबियत बिगड़ी, एक और शिक्षक राम परवेश डेंगू का शिकार होगए थे. सुमित कुमार नामक एक शिक्षक की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु इस अनशन के दौरान हो गयी थी. आंदोलनकारियों सरकार से दिवंगत के परिवारजनों को मुआवज़ा देने की भी मांग की है. जो कि वो भी बेकार जायेगी ऐसे मालुम हो रहा है. 



 

अहिंसा पर विश्वास और अच्छे दिन की आस

 रोज़गारी के लाले पड़ने के बावजूद इन शिक्षकों को बच्चों की शिक्षा और साक्षरता की ज़्यादा चिंता है. एक साक्षर देश का सपना तभी पूरा हो सकता है अगर शिक्षकों और छात्रों के कल्याण का ध्यान रखा जाए. इनके इस आंदोलन को ये खबर लिखे जाने तक इस धरने का 820 दिन पूरा हो चूका है. सोचिये की देश के एक राज्य की राजधानी में शिक्षक धरने पर बैठा है. सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर की पढ़ाई ठप्प है. मगर प्रशासन से ले कर शासन तक सब चुप खामोश हैं. दाद देनी होगी इन शिक्षकों की जो 3 साल की कड़ाके की सर्दी रोड पर झेल कर, एक साथी, अपनी आमदनी और अन्धकार भविष्य को देखते हुए भी शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे हैं. इन्हे अब भी भरोसा है कि इनकी मांगों को संज्ञान में लेते हुए इनकी बहाली होगी और बिहार सरकार के सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर की शिक्षा पुनः बहाल होगी. इन्होने मुख्यमंत्री से मिलने के लिए कई बार गुहार भी लगायी है 


 


शिक्षको और शिक्षिकाओं का बुरा हाल

धरने पर बैठे कई सारे शिक्षक अपने घर में एकलौते कमाने वाले हैं, सरकार का अनसुना करना मगर उनके इस आस को तोड़ नहीं पा रहा है. तर्कसंगत से बात करते हुए कंप्यूटर शिक्षिका रिंकू कुमारी ने बताया कि स्कूल के बंद होने के साल भर से भी ज़्यादा का समय बीतने के बाद जब उनकी कमाई का कोई साधन नहीं बना तो उन्होनें हारकर प्राइवेट इंस्टिट्यूट में नौकरी करनी पड़ी. इनमें से कई आज भी बेरोज़गार हैं क्यूंकि प्राइवेट स्कूल उन्हें कम पगार पर रखना चाहती है, खुद के पास पैसे भी नहीं की अपनी हुनर के हिसाब से छोटा मोटा व्यवसाय शुरू कर पाएं. शिक्षकगण अब शिफ्ट में धरने पर बैठ रहे हैं. ज़ाहिर सी बात है कि इतने साल तक कोई भी अपने घर वालों को भूखा रखकर नहीं छोड़ सकता.

   

तर्कसंगत का तर्क

 इन शिक्षकों की मांग को हम तब जायज़ या नाज़ायज़ कह सकते थे, जब कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद भी बिहार के सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा की पढ़ाई चल रही होती, मगर सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर की पढ़ाई भी बंद हो चुकी है. ऐसी परिस्थति में हम डिजिटल इंडिया जैस सोच को सार्थक होते भविष्य में कैसे देख सकते हैं? तर्कसंगत अपने शब्दों पर विराम लगाने से पहले बिहार की सरकार से इस समस्या पर ग़ौर करने की गुज़ारिश करता है और आशा करता है कि शीघ्र ही इन शिक्षकों को रोज़गार मिले और बच्चों को आधुनिक तकनीकियों से अवगत होने का मौका मिले.

 

रिपोर्ट : आकांक्षा  सक्सेना

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