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जेएनयू के बाद अब देश के एम्स कॉलेज के एमबीबीएस की पढ़ाई भी हो सकती है महंगी

तर्कसंगत

November 27, 2019

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जेनएयू के बाद ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एसोसिएशन (एम्स),अब अपने वित्तीय घाटे को ठीक करने के लिए ट्यूशन फीस में बढ़ोतरी के लिए तैयार है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने संस्थान से विभिन्न टेस्ट्स जैसे ब्लड टेस्ट , एक्स-रे और रोगियों के लिए ओपीडी शुल्क बढ़ाने के लिए भी कहा है।

पिछले हफ्ते, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश में छह एम्स के केंद्रीय संस्थान निकाय (CIB) को निर्देश दिया कि वह ट्यूशन फीस की समीक्षा करने और रोगियों के लिए विभिन्न सुविधाओं के लिए एक समान शुल्क तय करने की प्रक्रिया शुरू करे।

विभिन्न मीडिया रिपोर्टों द्वारा जारी रिपोर्टं में एम्स के वित्तीय सलाहकार के एक पत्र में कहा गया है, “भारत सरकार (वित्त मंत्रालय और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय) के निर्देशों के अनुपालन में, एम्स दिल्ली को संस्थान में सभी शुल्क और उपयोगकर्ता शुल्क की समीक्षा करने की आवश्यकता है।”

CIB ने अपने विभिन्न विभागों और अनुभागों को मौजूदा शुल्क, वास्तविक वर्तमान लागत और उपयोगकर्ता शुल्क को मौजूदा लागतों से कम करने के कारणों का विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

नाम न बताने की शर्त पर स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी ने कि संस्थान ने पिछले 25 वर्षों से डायग्नोस्टिक प्रक्रियाओं के लिए उपयोगकर्ता शुल्क नहीं बढ़ाया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी ने यह भी कहा है कि पिछले 50 वर्षों से इंस्टिट्यूट की ट्युशन फीस में संशोधन नहीं किया गया है।

न्यू इंडियन  एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि इसकी फीस बढ़ाकर ₹ 50,000 – 70,000 प्रति वर्ष करने की योजना है.

इस फैसले पर एम्स रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने स्वास्थ्य मंत्रालय के फैसले के प्रति अपनी अस्वीकृति व्यक्त की है।

एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. अमरिंदर मल्ही ने एक बयान में कहा, “हम, रेजिडेंट डॉक्टर, प्रशासन द्वारा जारी ज्ञापन के खिलाफ हैं। हम सभी चिकित्सा संस्थानों में छात्रों के ट्यूशन फीस और रोगियों के लिए उपयोगकर्ता शुल्क में किसी भी वृद्धि के खिलाफ हैं।”

एम्स के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) ने कहा कि वे समाज के सभी वर्गों के लिए गुणवत्ता और सस्ती शिक्षा के साथ हैं और सरकार या किसी भी संगठन को इससे समझौता करने की अनुमति नहीं देंगे।

तर्कसंगत से बात करते हुए अमरिंदर ने कहा, “प्रशासन द्वारा नयी फीस स्ट्रक्चर लागू  होने पर हम इसका विरोध करेंगे।” उन्होंने इस तथ्य को भी दोहराया कि इस देश के सभी एम्स संस्थान बहुत कम शुल्क पर शिक्षा प्रदान करते हैं।

“मैं यह नहीं समझ प् रहा कि सरकार मरीजों की फीस बढ़ाने की कोशिश क्यों कर रही है।” 2017 में, डॉ. अनूप सराया के तहत एक समिति ने ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे जैसी डायग्नोस्टिक प्रक्रियाओं के शुल्क को हटाने की सिफारिश की थी, “रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के एक पूर्व अध्यक्ष – हरजीत सिंह भट्टी ने कहा।

2017 में उपयोगकर्ता शुल्क की समीक्षा करने के लिए एक आंतरिक समिति ने परीक्षण और प्रक्रियाओं के लिए पैसे वसूलने की खिलाफत की थी, जिसकी लागत 500रूपये से भी कम थी। समिति ने इसके बजाय नुकसान की भरपाई के लिए निजी वार्डों के शुल्कों को बढ़ाने का सुझाव दिया था।

“कई छात्र डॉक्टर बनने के सपने के साथ एम्स में शामिल होते हैं। अगर फीस वृद्धि होती है तो बहुत सारे छात्रों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा ”, एम्स-दिल्ली के छात्र संघ के अध्यक्ष मुकुल कुमार ने कहा।

यूजर चार्ज वसूलने के प्रस्ताव पर बात करते हुए मुकुल ने कहा कि एम्स पर मरीजों का बोझ है। मुकुल ने कहा, “यदि आप विभिन्न डायग्नोस्टिक परीक्षण की तुलना दूसरे डायग्नोस्टिक लैब्रोटरीज़ के साथ करते हैं, तो आपको पता चल जाएगा कि कमजोर वर्ग के लोग अन्य अस्पतालों में एम्स को क्यों पसंद करते हैं।”

वर्तमान में, हर साल सरकार एम्स-दिल्ली पर लगभग 3,500 करोड़ रूपये और 14 अन्य कार्यात्मक एम्स में से प्रत्येक पर-300-500 करोड़ खर्च करती है।

 

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