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मोहम्मद शरीफ़: मैं सुबह भगवद गीता पढ़ता हूं और रात में कुरान के आयतें पढ़कर सो जाता हूं

तर्कसंगत

November 27, 2019

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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय यानी बीएचयू में संस्कृत पढ़ाने के लिए डॉक्टर फ़िरोज ख़ान की नियुक्ति पर भले ही विवाद चल रहा हो लेकिन ऐसा नहीं है कि संस्कृत पढ़ाने के लिए फ़िरोज़ ख़ान अकेले मुस्लिम शिक्षक हैं. बल्कि देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में ये सिलसिला दशकों से चला आ रहा है.

इस बात की जानकारी के लिए जब हमने विश्विद्यालय की वेबसाइट से संस्कृत डिपार्टमेंट के चेयरमैन को फ़ोन लगाया तो एक अच्छी तरह से संयमित आवाज़ ने फोन उठाकर एक “हैलो” के बजाय, ‘नमस्ते’ से शुरुआत की और हम उनके नाम से अपने ज़ेहन में इख्तियार किये तस्वीर की सोच कर ‘सलाम’ कह गए. लाइन की दूसरी ओर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष और प्रमुख प्रोफेसर मोहम्मद शरीफ थे.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के चेयरमैन यानी विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर मोहम्मद शरीफ़ पिछले क़रीब ढाई दशक से न सिर्फ़ संस्कृत पढ़ा रहे हैं बल्कि उनके अधीन कई मुस्लिम छात्र भी पीएचडी करके कई जगहों पर संस्कृत पढ़ा रहे हैं. प्रोफ़ेसर शरीफ़ की पत्नी डॉक्टर शाहीन जाफ़री भी आज़मगढ़ के शिबली नेशनल कॉलेज में संस्कृत विभाग में असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं.

“हमारा विभाग काफी पुराना है. हमने 1875 में काम करना शुरू किया था और आज तक ये डिपार्टमेंट अच्छे से चल रहा है. ”उन्होंने गर्व के साथ कहा. बातचीत में प्रोफ़ेसर शरीफ़ कहते हैं, “अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में तो तब से संस्कृत पढ़ाई जा रही है जब यह मुस्लिम एंग्लो ओरियंटल कॉलेज हुआ करता था. उस ज़माने में अन्य भाषाओं के छात्रों को सिर्फ़ एक रुपए की स्कॉलरशिप मिलती थी जबकि संस्कृत पढ़ने वालों को दो रुपए मिलते थे. ऐसा इसलिए था, ताकि मुस्लिम छात्रों में संस्कृत के प्रति रुझान बढ़े.”

वह खुद को ‘संस्कृत के छात्र’ के रूप में जाने जाना ज़्यादा दुरुस्त समझते हैं क्योंकि वह हमेशा सीखने का प्रयास करते है. वह 26 वर्षों से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में काम कर रहे हैं और बताते  हैं कि उनका विश्वविद्यालय किसी भी तरह के भेदभाव या पूर्वाग्रह से मुक्त है. “एएमयू की संस्कृति वास्तव में भारत की संस्कृति की प्रतिनिधि है. असाधारण रूप से बहुलतावादी और विविध.”

54 वर्षीय, भारत के पहले मुस्लिम ’डॉक्टर ऑफ लिटरेचर  (डी.लिट) में से एक हैं और उन्होंने उत्तर प्रदेश में अपनी शिक्षा पूरी की है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद, उन्होंने अपनी डी.लिट थीसिस को भी पूरा किया.



प्रोफ़ेसर शरीफ़ बताते हैं कि एएमयू में मौजूदा समय में संस्कृत विभाग में कुल नौ प्राध्यापक हैं जिनमें दो मुस्लिम और सात ग़ैर मुस्लिम हैं. प्रोफ़ेसर शरीफ़ ख़ुद यहां वेद, पुराण, उपनिषद, व्याकरण और आधुनिक संस्कृत पढ़ाते हैं.

शरीफ़ कहते हैं, “जहां तक छात्रों का सवाल है तो ज़्यादातर छात्र हिन्दू ही होते हैं लेकिन मुस्लिम छात्रों की संख्या भी कम नहीं है. इसे आप इस बात से समझ सकते हैं कि मेरे निर्देशन में अब तक 15 छात्र पीएचडी कर चुके हैं जिनमें से चार मुस्लिम विद्यार्थी हैं. आठ लोग अभी पीएचडी कर रहे हैं और उनमें भी दो छात्र मुस्लिम हैं.”

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में एक छोटे शहर के लड़के के रूप में, मोहम्मद शरीफ को अपने स्कूल के दिनों में संस्कृत भाषा से प्यार हो गया था. उन्होंने अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा संस्कृत में अपने प्राथमिक विषयों में से एक के रूप में पूरी की और संस्कृत, दर्शन और उर्दू में कला स्नातक की पढ़ाई की. डॉक्टर शरीफ़ की पत्नी डॉक्टर शाहीन जाफ़री आज़मगढ़ के शिबली डिग्री कॉलेज में संस्कृत पढ़ाती हैं. डॉक्टर शाहीन ने भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही पढ़ाई की है.

यह पूछे जाने पर कि क्या उनके अकादमिक विकल्पों के कारण उन्हें अपने परिवार से किसी भी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, उन्होंने गर्व से कहा कि उनके माता-पिता ने उनके हर फैसले का दिल से समर्थन किया  “मुझे केवल अपने रिश्तेदारों द्वारा कुछ ताने सहने पड़े, उन्होंने कहा.

उनके द्वारा एक ही सांस में ‘भगवान’ के लिए वैदिक और इस्लामी शब्द का उपयोग करते हुए सुनना मेरे लिए आश्चर्यचकित करने वाला था.


 


उनके विभाग में छात्रों के लिए नियम विश्वविद्यालय के बाकी हिस्सों से अलग है. वह विश्वविद्यालय के मुस्लिम प्रभुत्व होने के बावजूद उनके विभग में मुस्लिम छात्रों की संख्या 100 में से 20 तक होगी। अपनी कक्षाओं में, वह पाली, रामायण और महाभारत, योग और वेदांत की मृत भाषा भी सिखाते हैं.

हम अपनी बात खत्म करने वाले थे, जब मैंने उनसे पूछा कि वे कैसे बुतपरस्ती और पूजा अर्चना की हिमायत काने वाले धर्म की पढाई पढ़ा पाए जहां जब वो खुद वैसे धर्म से आता हैं जहाँ बुतपरस्ती को हराम माना गया है.

तब उन्होनें बड़ी आसानी से कहा : “मैं सुबह भगवद गीता पढ़ता हूँ और रात में कुरान के आयतें पढ़कर सो जाता हूँ। ऐसा मेरा विश्वास है और यही मेरा जीवन है.”

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