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झारखंड: इस गांव में कोई भी 50 वर्ष से ज़्यादा जी नहीं पता, सरकार ने भी हाथ खड़े किये

तर्कसंगत

Image Credits: Twitter/ANI

November 27, 2019

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झारखंड चुनाव की सरगर्मी इस ठंड में बढ़ चुकी है. नेताओं और पार्टियों की जीतने की दल बदलने की कवायदें नए मुख्यमंत्री बनने तक चलती रहेंगी. झारखंड विधानसभा चुनाव के अंतर्गत पहले चरण के लिए 30 नवंबर को मतदान होना है.  चुनाव के समय में सबसे ज़्यादा जिन पर नेताओं को भरोसा होता है वो होते हैं गाँव और सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोग, इनको अपनी बातों में फंसना आसान होता है. इनकी कुछ मुलभूत ज़रूरतों को पूरा करने का हवाला देकर इनसे वोट लेना आसान होता है.

झारखंड चुनाव से पहले एक ऐसी खबर आ रही है, जिस पर कभी भी झारखंड का चुनाव नहीं लड़ा गया. झारखंड के पलामू जिला स्थित चूकरू गांव में वहां के लोगों का दावा है कि उनके गांव के पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा बहुत ज्यादा है और जिसकी वजह से लोगों में शारीरिक अक्षमता बढ़ रही है. इस गांव के ज्यादातर लोग दिव्यांग हैं. ANI से  बात करते हुए ग्रामीण, राजेश्वर पाल कहते हैं कि “दूषित पानी हमारी हड्डियों और दांतों को नुकसान पहुंचा रहा है. अब तक गांव के कई युवा अपनी जान गंवा चुके हैं.”


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आश्चर्य की बात ये भी है कि ये बीमारी बीते कुछ सालों की नहीं है, अगर इस गाँव के बूढ़े इस बीमारी से ग्रसित होकर आज दिव्यांगता से जूझ रहे हैं तो आप ये भली भांति समझ सकते हैं कि ये बीमारी कितनी पुरानी होगी. इस बीमारी के बारे में बात करते हुए 69 वर्षीय बुजुर्ग राजेश्वर पाल कहते हैं कि हम बीते 25 सालों से इस समस्या का सामना कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि हमारे गांव में लोगों की अकाल मृत्यु आम बात हो गयी है. राजेश्वर पाल का कहना है कि गांव में कोई भी व्यक्ति 50 साल से ऊपर का नहीं है. उन्होंने कहा कि केवल मैं ही हूं जिसने 69 साल की जिंदगी पाई है.


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इस पर सबसे ज़्यादा उदसीनता की बात ये कि सरकार तथा प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें गांव छोड़ने का सुझाव दिया था. जिनके गाँव घर वहां हैं जिनकी खेती आजीविका उस गाँव के ज़मीन से होती है वो भला अपना गाँव छोड़ कर जाएँ भी तो जाएँ कहाँ? उम्र की ढलान में एक स्वस्थ आदमी भी कई सारी दिक्क्तों का सामना करता है, फिर तो ये सब दिव्यांग है. करोड़ों की लागत से चुकरू पेयजलापूर्ति योजना चालू की गई. बावजूद साल भर से शुद्ध पेयजल नसीब नहीं है. योजना बनने के एक-दो वर्ष तक पानी मिला। इसके बाद से हाल बदहाल है. विवशता के कारण चापाकल व कुआं का फ्लोराइडयुक्त पानी पीना पड़ रहा है.

गाँव छोड़ना हमारी भूजल के दूषित होने से रोकने का उपाय कतई नहीं है. सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों को इस विषय पर गहन जांच करनी होगी कि इतने सालों में इन गाँव के पानी की गुणवत्ता के स्तर में गिरावट का कारण क्या है? और क्या इस गाँव के अलावे और भी गाँव हैं जो इस बीमारी की चपेट में अगले कुछ सालों में आ सकते हैं और अगर ऐसा है तो उस स्थिति से निपटने के लिए हम आज क्या कर रहे हैं या कर सकते हैं?

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