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ग्रामीण भारत की आम लड़कियों को ‘गर्ल चैंपियंस’ में बदल रही है ‘दसरा’ की टीम

तर्कसंगत

November 28, 2019

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भारत के 1.3 अरब की आबादी में 30% लोग युवा हैं. इन्ही के कंधों पर देश का भविष्य आगे की राह देख सकता हैहिन्दुस्तान टाइम्स के एक रिपोर्ट के हिसाब से 2011 की जनगणना ने किशोरों की गिनती 243 लाख बताई हुई हैभविष्य की ओर अग्रसर होने के लिए हमारे भविष्य के पीढ़ी का सकुशल होना बहुत महत्त्वपूर्ण हैपरन्तु, ऐसा संभव नहीं हो पाया है. एक संगठन के रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में तकरीबन 27% लड़कियां  जो  20 – 24 साल  की  उम्र वर्ग  में आती हैं, उनका बाल विवाह  हो  चुका है, 18 – 19 साल के वर्ग में  54% लड़कियां  और  48% लड़के अभी भी अनपढ़ हैं.  

यह रिपोर्ट Dasra नामक एक संगठन की है. 2007 से इनका ढृढ़ निश्चय यह रहा है कि वह युवाओं के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण बनाये जहां पर इनकी काबिलियत का सही इस्तेमाल हो और देश के भविष्य  में एक अच्छा योगदान दे सकें



शुरू से हमारे संगठन  के यह महत्वपूर्ण मकसद रहे हैं : बाल विवाह को रोकनाबच्चों को पढाई पूरी करने की तरफ प्रोत्साहित करना और एक ऐसा वातावरण बनाना जहां पर इन बच्चों को अपने आप को साबित करने  का मौका मिले,” दसरा में कम्युनिकेशन एक्सपर्ट के रूप में काम कर रहीं ऋचा पटेल का तर्कसंगत से यह कहना था. इसी मक़सद को पूरा करने के लिए एक पहल जारी हुई जिसका नाम “अब मेरी बारीहै.

अब मेरी बारीकिशोर और किशोरियों के ज़रूरतों को एक आवाज़ देता है और उनकी कई चुनौतियों को अच्छे से सामना करने का प्रोत्साहन देता है. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान, राजस्थान और झारखण्ड के गाँव में इन बच्चों के बीच मतदान और चुनाव के बारे में जागरूकता और उनके अधिकारों के बारे में उन्हें अवगत भी किया.



 अब मेरी बारीकी पहल कई हिस्सों से अपने मुकाम पर पहुँचती है जिसमे में से कुछ हैं : ‘किशोरकिशोरी’ समूह जहां पर हफ्ते के एक दिन स्थानीय लड़के और लडकियां एक जानकारीपूर्ण फिल्म देखकर अपने  विचार व्यक्त करते हैं, बस टूर कार्यक्रम है जहां पर गाँवगाँव जाके कई ज़रूरी विषयों पर जागरूकता बढ़ाया जाता है, सोशल ऑडिट लेना सिखाते हैं और जिला प्रशासन को पत्र लिखकर अपनी ज़रूरत उनके सामने रखना भी सिखाते हैं

इस  पहल का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा “गर्ल  चैंपियंसहै. राजस्थान, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश के चंद जिलों कुछ लड़कियों को चुना जाता है जो अपने गाँव को जागरूक करती हैं और वहाँ की लड़कियों के लिए एक प्रेरणा का स्त्रोत भी हैं.



गर्ल चैंपियंस को सामाजिक ऑडिट करना सिखाया जाता है जिससे की वह अपने गाँव की सुविधाएं की सारी जानकारी उनके पास और वह जिला परिषद् के सामने अपना प्रस्ताव रख सकें. माहवारी से संभंदित स्वस्थ्य परेशानियों में 20 वर्षीय सीमा ने अजमेर जिले के  गाँव में जागरूकता बढ़ाई. उनके प्रस्ताव के बाद आंगनवाड़ी में आयरन की गोलियां बांटना शुरू हुआजिले  में बाल विवाह को कम करने में भी इनका योगदान रहाधौलपुर जिले की राजकुमारी का योगदान गर्भवती महिलाओं के लिए एक आशा की किरण बनी। उन्ही के प्रस्ताव से  “ममता कार्डबना जिससे यह महिलाएं अपना टीकाकरण समय से करा सकें

इसके अलावा  वह वहाँ की लड़कियों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करतीं हैं और उनको अपनी विद्या पूरी करने में प्रोत्साहन देतीं हैंआज का ज़माना युवाओं के ही नाम है. उन्ही के कन्धों पर देश का भविष्य चलेगा. ऐसे में उनका अपने अधिकारों के बारे में जागरूक होना, अपने समस्याओं को प्रशासन के सामने रखना और देश की प्रगति में योगदान देना एक बहुत ही बड़ा संकल्प है जिसकी तरफ  Dasra Adolescent Collaborative अग्रसर है

तर्कसंगत को आशा है कि उनका ये काम और भी ऊंचाइयां छुए. अपने इस नेक पहल से ये ग्रामीण भारत में रह रही महिलाओं तक पहुँच कर उनके जीवन को बदल सकें उन्हें उनके हक़ और स्वास्थ्य के लिए जागरूक कर सकें, शिक्षा के माध्यम से उन्हें अपने जीवन को सँवारने का मौका दें ताकि इतने सालों के पिछड़ेपन और गुमनामी में जी रही महिलाएं आगे आ कर हम सब से कंधे से कंधा मिला कर कहें कि ‘अब मेरी बारी‘  

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