सप्रेक

अपनी स्टार्ट अप कम्पनी जर्मन कम्पनी को बेच इन्होनें शुरू की बिना मिट्टी के की जाने वाली खेती

तर्कसंगत

November 29, 2019

SHARES

खेती की ओर लगातार युवाओं का रुझान बढ़ता रहा है और ये अच्छी बात भी है कि जितने लोग कृषि से जुड़ेंगे हम उतना ही अपने देश की क्षणों की  भी करेंगे और उससे निजात पाने की नयी तकनीक भी खोजेंगे. कभी मौसम की मार, कभी कम उपज तो कभी सही दाम न मिलने से किसान परेशान रहता है. वहीं दूसरी तरफ बहुत सारे ऐसे फल-सब्ज़ियाँ हैं जो विदेशों से आयात किये जाते हैं और ग्राहक उसे अच्छे-ख़ासे दामों में खरीदते भी हैं. आज ऐसे ही लड़के की कहानी बताने जा रहे हैं. जिन्होंने हाइड्रोपोनिक फार्मिंग करने के लिए अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी को बेच दिया.

 

पेशे से ये भी इंजीनियर!!!

अजय कर्नाटक के रहने वाले हैं. इंजीनियरिंग करने के बाद नौकरी की तलाश में वह गोवा पहुंच गए थे. जहां उन्होंने 2011 में अपनी मोबाइल एप्लीकेशन निर्माता कंपनी की शुरुआत की. जिसके बाद उनकी इस कंपनी ने काफी अच्छा बिजनेस किया. लेकिन एक सफल कंपनी के मालिक होने के बावजूद वे हमेशा रासायनिक तरीके से पैदा की गई सब्जियों को लेकर टेंशन में रहते थे. इसी उधेड़बुन में वो अलग अलग तकनीक की तलाश करते रहे. इसी क्रम में अजय को ‘स्वॉयललेस कल्टीवेशन’ के बारे में पता चला जिसे वैज्ञानिक तौर ‘हाइड्रोपोनिक्स’ और सामान्य तौर बिना मिट्टी की खेती या ‘जलकृषि’ भी कहा जाता है। इसमें मिट्टी का प्रयोग नहीं होता है, इसे केवल पानी में या लकड़ी का बुरादा, बालू अथवा कंकड़ों को पानी में डाली जाता है. पेड़-पौधे अपने आवश्यक पोषक तत्व ज़मीन से लेते हैं, लेकिन हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में पौधों के लिये आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने के लिये पौधों में एक विशेष प्रकार का घोल डाला जाता है. इस घोल में पौधों की बढ़वार के लिये आवश्यक खनिज एवं पोषक तत्व मिलाए जाते हैं. पानी, कंकड़ों या बालू आदि में उगाए जाने वाले पौधों में इस घोल की महीने में दो-एक बार केवल कुछ बूँदें ही डाली जाती है. इस घोल में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, मैग्नीशियम, कैल्शियम, सल्फर, जिंक और आयरन आदि तत्वों को एक खास अनुपात में मिलाया जाता है, ताकि पौधों को आवश्यक पोषक तत्व मिलते रहे.


Image may contain: plant


 

शौक से शुरू की खेती

अपने शौक की चीज़ को अच्छी तरह से देख समझ कर उन्होनें इस क्षेत्र में अपने पाँव ज़माने का मन बनाया. उन्हें इस बात की ख़ुशी भी थी की इस तकनीक से वो विदेश में उगाये जाने वाले सब्ज़ियां और पहल भी देश में ऊगा सकते हैं. फिर क्या था उन्होनें वर्ष 2016 में उन्होंने अपने 6 दोस्तों के साथ गोवा के करासवाडा में अपना फार्म शुरू किया. यहाँ उन्होंने सफलता पूर्वक स्वॉयललेस कल्टीवेशन’ यानि ‘हाइड्रोपोनिक्स’ तकनीक से फल-सब्जियों को उगाना शुरू किया. इस दौरान अजय ने इस तकनीक को बारीकी से समझा. वहां उन्होंने विदेशी सलाद में उपयोग होने वाले पत्ते जैसे लेट्स, सेलरी आदि उगाएं. इस सफलता को देखते हुए अजय ने इसका विस्तार करने का मन बनाया और विभिन्न प्रकार से विदेशी फलों के पैदावार की भी योजना बनाई. अजय ने स्टार्टअप अपनी दूसरी पारी की शुरुआत की और ‘लेटसेट्र’ नाम से बेंगलुरु में एक फार्म की शुरुआत की.


Image may contain: 3 people, people smiling, people standing, closeup and outdoor


अजय अब अपने फार्म में लेट्स, सेलरी, स्पिनिच आदि के अलावा शिमला मिर्च और स्ट्राबेरी भी उगा रहे है. उनके द्वारा उगाई गयी फल-सब्जियों को बाज़ारों में बेचा भी जा रहा है, सब्जियां और फलों की गुणवत्ता भी अधिक होने के कारण उनको मुनाफ़ा भी अच्छा मिल रहा है. अजय आज उन लोगों के लिए एक उदाहरण हैं जो खेती को मुनाफ़े का सौदा नहीं समझते. अगर सूझ-बूझ और आधुनिक तकनीक अपना कर हम खेती करे तो निश्चित रूप से हमें सफलता मिल सकती है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अजय ने बताया कि खेती की इस तकनीक में शुरुआती समय में लागत काफी ज्यादा आती है, लेकिन बाद में फायदा जरूर होता है. उन्होंने कहा देश में खाना सब चाहते हैं, लेकिन उगाना कोई नहीं चाहता.

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...