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उत्तराखंड के 13 आयुर्वेदिक कॉलेज के छात्रों की कौन सुनेगा?

तर्कसंगत

Image Credits: Khabar Uttarakhand/News18

December 2, 2019

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भारत आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का विश्व गुरु है इससे कोई नकार नहीं सकता. मगर अभी के समय में भारत में आयुर्वेदिक कॉलेज की स्थिति देखरक ‘चिराग तले अँधेरा’ वाली कहावत सही उतरती दिख रही है. एक तरफ देश के योग गुरु योग सिखाते सिखाते करोड़ो के टर्नओवर की आयुर्वेदिक कम्पनी खोले बैठे हैं. दूसरी ओर भारत के प्राकृतिक और आयुर्वेदिक सम्पदा से भरपूर्ण उत्तराखंड में हज़ारों छात्र अपनी महंगी फीस पर हाई कोर्ट के फैसले का पालन करने के लिए कॉलजों के सामने गुहार लगाते हुए धरना दिए बैठे हैं.

देहरादून स्थित परेड ग्राउंड के बाहर एक टेंट के नीचे कुछ छात्र छोटी-बड़ी तख़्तियां थामें बैठे रहते हैं . उत्तराखंड के निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों के बीएएमस कोर्स के ये छात्र फ़ीस वृद्धि का विरोध जताने के लिए बीते दो महीने से अधिक समय से इसी टेंट के नीचे बैठे हैं.

इन छात्रों का कहना है कि इनकी फ़ीस 80 हज़ार रुपये थी जिसे कॉलेज प्रशासन बढ़ाकर अब दो लाख 15 हज़ार कर रहे हैं. छात्रों का ये भी दावा है कि वो इस मामले को हाईकोर्ट तक ले गए जहां से उन्हें सफलता हाथ लगी है, फिर भी सरकार और प्रशासन उनकी सुनने को तैयार नहीं है.

 

छात्र भूख हड़ताल पर

ऐसा नहीं कि छात्रों ने इस विषय पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर नहीं की या क़ानूनी रास्ता इख्तियार नहीं किया। छात्रों की तरफ से अपने पक्ष को रखते हुए ललित तिवारी ने फ़ीस वृद्धि के इस मामले को नैनीताल हाइकोर्ट तक लेकर गए. वो इसी विरोध प्रदर्शन में भूख हड़ताल पर भी बैठे थे. अपनी मांगों के बारे में बीबीसी को बताया, “सरकार ने असंवैधानिक तरीक़े से शासनादेश जारी कर तक़रीबन तीन गुना फ़ीस बढ़ा दी थी. मैं इस मामले को लेकर हाईकोर्ट गया. जहां हाईकोर्ट की सिंगल बेंच और फिर डबल बेंच ने हमारे पक्ष में फ़ैसला सुनाया और कॉलेजों को पुरानी फ़ीस लेने और बढ़ाई गई फ़ीस वापस करने के आदेश दिए. लेकिन कॉलेज इसे नहीं मान रहे हैं.” ललित ने आगे बताया, “हम चाहते हैं कि छात्रों से बीते हुए सालों की बढ़ी हुई फ़ीस ना ली जाए. इसके साथ ही जिस फ़ीस के साथ छात्रों ने एडमिशन लिया था, वही फ़ीस आगे भी जारी रहे.”

आंदोलन पर बैठे छात्रों का कहना है कि नए नियम के नौसार अगर आप चौथे साल में हैं तो बाक़ी तीन साल की फ़ीस का भी अंतर देना होगा. फ़ीस बढ़ाने का यह खेल अजीब है. चौथे साल में फ़ीस बढ़ी है तो पहले साल के हिसाब का अंतर क्यों दे?

 

कॉलेज का पक्ष

बीती सरकार ने 2015 में ही आदेश जारी कर निजी आयुर्वेदिक कॉलेजों में फ़ीस बढ़ाकर 80 हज़ार से सीधे 2 लाख 15 हज़ार रुपए कर दी थी. ये फ़ीस वृद्धि एक फ़ीस निर्धारण समिति के ज़रिए तय की गई थी.इस कदम के पीछे का तर्क ये दिया गया कि साल 2004 से इन कॉलेजों की फ़ीस में एक बार भी बदलाव नहीं किया गया था जबकि तय नियमों के अनुसार हर तीन साल में फ़ीस निर्धारण समिति को इन्हें दोबारा नए सिरे से तय करना था. उत्तराखंड आयुर्वेद यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध इन निजी कॉलेजों का कहना है कि उन्होंने सरकार के आदेश के आधार पर ही फ़ीस बढ़ाई है. निजी आयुष कॉलेज एसोसिएशन के चेयरमैन अश्विनी कम्बोज हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करने की बात कहते हैं लेकिन साथ ही वो यह भी बताते हैं कि 80 हज़ार की फ़ीस में वो एक मेडिकल कॉलेज नहीं चला सकते.

 

सरकार और कॉलेज के बीच पिस रहे छात्र

सरकार इस इस पूरे विवाद पर आपको कहीं से भी नजरिया छात्रों के विरुद्ध नहीं दिखेगा, तो फिर सवाल है कि हाई कोर्ट द्वारा दिए आदेशों के बावजूद भी छात्र आज दो महीने से धरने पर क्यों बैठे हैं?

वहीं सरकार का कहना है कि वह हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करवाने के लिए प्रतिबद्ध है. बुधवार यानी 20 नवंबर को मुख्यमंत्री की तरफ़ से आंदोलन कर रहे छात्रों के एक प्रतिनिधिमंडल को वार्ता के लिए भी बुलाया गया था. इस बैठक के बाद लौटे छात्रों के प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि सरकार ने जल्दी से जल्दी से इस पूरी समस्या का हल निकालने का आश्वासन दिया है. मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रमेश भट्ट ने बीबीसी से कहा, ” साल 2015 में कांग्रेस सरकार के वक़्त इन कॉलेजों की फ़ीस बढ़ाने के आदेश दिए गए थे जो कि ग़लत थे. फ़ीस बढ़ाने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ फ़ीस निर्धारण समिति के पास है, इसी वजह से हाईकोर्ट ने उस आदेश को निरस्त कर दिया.” उन्होनें इस बात पर भी ज़ोर दिया कि साल 2004 के बाद से इन कॉलेजों की फ़ीस नहीं बढ़ाई गई थी.

“अब जो फ़ीस बढ़ाई गई है सिर्फ़ वही लागू होगी और सिर्फ़ आने वाले कोर्स से ही बढ़ी हुई फ़ीस ली जाएगी, पीछे या बीते हुए साल से फ़ीस नहीं ली जाएगी.”

हालांकि गुरुवार (21 नवंबर) को प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इसी मामले पर एक बैठक आयोजित की तो उसमें आयुष मंत्री हरक सिंह रावत भी मौजूद रहे.

इस बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर लिखा, “आयुष छात्रों के हितों का सरकार द्वारा पूरा ख्याल रखा जाएगा. माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों का अनुश्रवण कर शीघ्र ही उच्च न्यायालय के न्यायधीश की अध्यक्षता में स्थाई शुल्क निर्धारण समिति गठित की जाएगी.”

 

आयुष छात्रों के हितों का सरकार द्वारा पूरा ख्याल रखा जाएगा। माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों का अनुश्रवण कर शीघ्र ही उच्च…

Posted by Harak Singh Rawat on Thursday, 21 November 2019

 

हालंकि इस पूरे विवाद पर कुछ लोग दबे जुबां में इस बात से भी इंकार नहीं कर रहे कि बिना सरकारी सांठ गाँठ के कोर्ट के आदेश की अवमानना करना संभव नहीं है. उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत का ये भी कहना है कि राज्य में 16 आयुर्वेदिक कॉलेज खोले गए जिनमें से केवल 3 ही सरकारी हैं, बाकी सब प्राइवेट. जो किसी भी तर्क पर खरा नहीं उतरता.

कुल मिलाकर उत्तराखंड में आयुर्वेदिक छात्र, फ़िलहाल कॉलेज प्रशासन, सरकारी कामकाज और हाईकोर्ट के आदेश के बीच फंसकर रह गए हैं. मुख्यमंत्री ने जिस दिन इस मामले पर बैठक की उसी शाम भूख हड़ताल पर बैठे ललित तिवारी की तबियत ज़्यादा ख़राब होने पर उन्हें अस्तपताल ले जाया गया था. छात्रों का कहना है कि वो तब तक आंदोलन जारी रखेंगे जब तक सरकार लिखित में उन्हें फ़ीस वापसी का आश्वासन नहीं देती, क्योंकि अब किसी के बोले हुए शब्दों पर उन्हें भरोसा नहीं रह गया है.

 

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