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इनकी वजह से कभी सड़क पर भीख मांगने वाले बच्चे आज डॉक्टर और पायलट बन रहे हैं

तर्कसंगत

December 2, 2019

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उन बच्चों की कल्पना किसने की होगी जो ज़िंदा रहने के लिए सड़कों पर भीख मांगते थे और अब एविएशन, मेडिसिन और आईआईआईटी में पढ़ रहे हैं। दशरथन और धनराज ईंट भट्टों में काम करने वाले बाल मजदूर थे। वर्तमान में, उनमें से एक क्रीमिया स्टेट यूनिवर्सिटी में मेडिसिन की पढ़ाई कर रहा है और दूसरा आईआईआईटी जबलपुर में डिजाइन पाठ्यक्रम में ग्रेजुएशन कर रहा है। न केवल उन्हें, बल्कि गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) श्रेणी के लगभग 50 छात्र सफलतापूर्वक आज इनकी वजह से उच्च शिक्षा में दाखिला पा चुके हैं। उनके सपनों को डॉ. उमा, एमबीए, पीएचडी और उनके दोस्तों ने एक वास्तविकता बना दिया। उन्होंने सुयम चैरिटेबल ट्रस्ट शुरू किया और वर्तमान में 500+ बच्चों को एक अच्छी शिक्षा प्राप्त करने में मदद कर रहे हैं।

 

उमा और मुथुराम

बीस साल पहले, उमा और मुथुराम भारत में सड़क पर रहने वाले बच्चों के जीवन का दस्तावेजीकरण कर रहे थे, जब वे 3 वर्षीय जयावेल के सम्पर्क में आये उसकी माँ शराब की आदि थीं। हर दिन, वह अपनी तीन बहनों और एक भाई के साथ, जीवित रहने के लिए सड़कों पर भीख माँगता था।

उमा और मुथुराम इन बच्चों की मदद करना चाहते थे। उन्होंने उनकी मदद करने के लिए सुयम चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की और जायवल को वहां ले गए। वह 2003 में सुयम चैरिटेबल ट्रस्ट-स्थापित सिरगू मोंटेसरी स्कूल का पहला छात्र था। जयावेल ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली है और अब वे फिलीपींस में एविएशन में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर रहे हैं।

मुथुराम ने कहा, “हमने अपने छात्रों की उच्च शिक्षा के लिए अपनी संपत्तियों को गिरवी रख दिया था और साथ ही कुछ लोगों ने हमें ब्याज मुक्त ऋण भी दिया है।”

जब हम किसी बच्चे को सड़क पर भीख मांगते देखते हैं, तो हममें से बहुतों को दया आती है और हममें से कुछ लोग पैसे दान करके आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन हममें से बहुत से लोग उन बच्चों की ज़िंदगी बदलना चाहते हैं। 12 साल पहले , उमा और मुथुराम ने झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को गणित पढ़ाना शुरू किया। इसके अलावा, वह बुज़ुर्गों के लिए स्वास्थ्य शिविरों में रक्तदान शिविर लगाती थीं और दुर्घटना पीड़ितों की मदद करती थीं।


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अपने मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान, उमा को महालिंगम के बारे में पता चला जो एक कारखाने में काम करता था, जहां कांसे का लैंप बनाया जाता था। एक कंप्रेसर की सफाई करते समय, किसी ने गलती से इसे चालू कर दिया और पिघला हुआ कांस्य उसमें से निकल कर महालिंगम के चेहरे को जला दिया और उसकी हवा और भोजन नली में प्रवेश कर गया। उसे एक सरकारी अस्पताल, तिरुनेलवेली में भर्ती कराया गया जहाँ डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार किया।

उमा को उनके एक पत्रकार मित्र के माध्यम से उसके बारे में पता चला, जो चेन्नई में महालिंगम के संपर्क में थीं। उसे RIGID अस्पताल में भर्ती कराया। किलपुक में RIGID हॉस्पिटल्स के चेयरमैन डॉ. जेएस राज कुमार ने लड़के का मुफ्त में ऑपरेशन किया। अस्पताल में रहने के दौरान, उमा ने उसे इंटरमीडिएट गणित में पास होने उसकी मदद की। बाद में, महालिंगम ने अर्थशास्त्र में मास्टर्स पूरा किया, अपने परिवार के साथ फिर से जुड़ गया, शादी कर ली और अब एक परिवार के साथ ख़ुशी ख़ुशी ज़िंदगी जी रहा है।

डॉ. उमा ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर 1999 में सुयम चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की। प्रारंभ में, ट्रस्ट ने केवल बाल भिखारियों की मदद करते थे , लेकिन बाद में, बाल श्रमिकों की भी मदद करने लगे।

सुयम स्कूल, सिरगु, मोंटेसरी में, एलकेजी से 12 वीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है। इकोनो राइट एक ऐसी अभिनव पद्धति है जहां बच्चे जल्दी और रचनात्मक तरीके से स्पेलिंग को समझना लिखना और याद रखना सीखते हैं। सरगुजा में स्कूली बच्चों को स्वतंत्र रूप से अपनी राय और विचारों को सीखने और आवाज देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।



पैसे की कमी

पैसे की कमी के कारण, स्कूल एक टूटी दीवार की मरम्मत करने में असमर्थ था। स्कूल के छात्रों में से एक ने पूछा कि वे बेकार प्लास्टिक की बोतलों का उपयोग करके दीवार क्यों नहीं बना सकते हैं? डॉ. उमा के प्रोत्साहन और प्रेरणा से, छात्रों ने प्लास्टिक की बोतलों के साथ एक दीवार बनाई। बाद में छात्रों, माता-पिता और स्वयंसेवकों ने शादी के हॉल और होटलों से प्लास्टिक की बोतलों को एकत्र किया, उन्हें धोया और उन्हें रेत से भर दिया और 47,000 रुपये में 47 फीट की चारदीवारी का निर्माण किया, जो पहले 1 लाख 50 हजार रुपये का था।



“अब नौ कक्षा की दीवारें पानी की बोतलों के इस्तेमाल से बनी हैं। ग्रीन हॉल में बिजली उपलब्ध नहीं है। हम पारदर्शी शीट से कक्षाओं की छत बनाने में उपयोग कर रहे हैं। हर कक्षा की खिड़की में विभिन्न गणित और विज्ञान मॉडल दर्शाए गए हैं।” मुथुराम ने कहा।

उमा खुद एक शिक्षाविद् और डॉक्टरेट से सम्मानित हैं, जो कक्षाओं को कुशलतापूर्वक संभालने के लिए शिक्षकों को नियमित अभ्यास पर प्रशिक्षित करती हैं। शिक्षकों को विभिन्न स्कूल यात्राओं में ले जाया जाता है जहाँ वे अनुभवी शिक्षकों से सीखते हैं। मुथुराम ने कहा, “शिक्षक देश भर में विभिन्न रचनात्मक परियोजनाओं के संपर्क में हैं। उन्हें अखिल भारतीय दौरों पर ले जाया जाता है और वे विभिन्न संस्थानों का दौरा करते हैं और अनुभवी शिक्षकों के साथ बातचीत करते हैं और अपनी कक्षाओं में उसी सिस्टम को अपनाने का प्रयास करते हैं।”

उमा नियमित रूप से कक्षाओं का दौरा करती हैं, शिक्षकों के साथ बातचीत करती हैं और मुश्किल बच्चों और विषयों को संभालने के बारे में सुझाव देती हैं।

 

चुनौतियां

अपने इस सपने और नेक कोशिश को पूरा करना इन दोनों के लिए एक आसान काम नहीं था। उन्होंने बच्चों को शिक्षित करने के लिए कई चुनौतियों का सामना किया है। ट्रस्ट ज्यादातर उन छात्रों के फीस का भुगतान कर रहा है जो स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। उमा और मुथुराम छात्रों की उच्च शिक्षा के लिए धन के साधन खोजने में गंभीर वित्तीय समस्याओं से गुज़रे हैं। इनके काम को देखते हुए एक डोनेशन देने वाले व्यक्ति ने दो छात्रों की एमबीबीएस शिक्षा के लिए ऋण प्राप्त करने के लिए अपनी संपत्ति भी गिरवी रख दी है।

उन्हें यह भी लगता है कि वित्तीय संकट का समाधान “पे बैक मॉडल” है, जहाँ ट्रस्ट से सहायता प्राप्त करने वाले छात्र ट्रस्ट में अन्य छात्रों की मदद करने के लिए पैसा वापस भेजते है ताकि उनकी ही तरह ही दूसरे बच्चे भी ज़िन्दगी में सफल हो पाएं। अपने सपनों को साकार करने के लिए सुयम का समर्थन करें और उन सैकड़ों बच्चों को शिक्षित करें। एक स्वयंसेवक, शुभचिंतक, एक संरक्षक बनें। समय पर समर्थन सैकड़ों बच्चों के जीवन में सार्थक प्रभाव लाता है।

आप श्री मुथुराम से 9840365819 या [email protected] पर समपर्क कर उनकी मदद कर सकते हैं.

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