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स्त्रियों के लिए एक बेहतर समाज बनाने की चुनौती को स्वीकारे पुरुष समाज

तर्कसंगत

Image Credits: SCMP

December 3, 2019

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बीते 27 नवंबर की रात हैदराबाद में जिस प्रकार एक संभ्रांत लेडी वेटेनरी डॉक्टर के साथ हैवानियत की गई उसे सुनकर हर किसी की रूह कांप गई…इस नृशंस घटना ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया…

देश में बहुत कुछ बदला लेकिन लड़कियों के लिए असुरक्षा का वातावरण नहीं बदला…देश में भौतिक विकास के आंकड़ों पर गौर किया गया पर समाज में पनपते मनोरोगियों की वृद्धि पर चिंता नहीं की गई…

2012 की निर्भया गैंगरेप की दिल दहला देनेवाली घटना को हम शायद ही भूल पाए हों…दिल्ली की उस वारदात ने भी पूरे देश को हिला दिया था… देश के हर हिस्से में इस घटना को लेकर गुस्सा देखने को मिला…लोग सड़क पर उतरे…अपने अपने तरीके से अपना दुःख और आक्रोश व्यक्त किया और उस लड़की की सलामती की दुआएं मांगी… थोड़े दिनों के लिए उस लड़की का दर्द मानो हरेक देशवासी का दर्द बन गया… लगा कि इस देश में अब लड़कियों के लिए असुरक्षा का वातावरण खत्म हो जाएगा…लेकिन कुछ नहीं बदला…

इस घटना के साथ भी हम सबों ने जुड़ाव महसूस किया था क्योंकि यह खबर लगातार सोशल मीडिया में छायी रही…जबकि ऐसी कितनी ही घटनाएं हर रोज घटित होती हैं जो इस तरह चर्चा में नहीं आतीं… जिनकी खबर नहीं बनती…लेकिन यह आंकड़े भयभीत करते हैं…

छेड़छाड़, जबरदस्ती, घरेलू हिंसा और बलात्कार के अधिकांश मामले लोकलाज और समाज के भय के कारण दबा दिए जाते हैं…हमारा सामाजिक परिवेश और कानून व्यवस्था के प्रति अविश्वास ऐसी घटनाओं को चुपचाप सहन करने के लिए मजबूर कर देता है…

इस घटना के 6 साल बाद आसिफा को लेकर भी फिर शोरशराबा हुआ… इस बार यह जघन्य घटना एक मासूम बच्ची के साथ हुई जिसे जाति, बिरादरी और धर्म में फर्क तक पता नहीं था… एक बार फिर टीवी पर लोग बहस में उलझे… कुछ लोगों ने गुनहगारों को बचाने के लिए आवाज उठाई… कुछ लोगों ने उस मासूम के लिए इंसाफ की मांग की…  यह सब भी कुछ दिन चला… कुछ ही दिनों में कोई दूसरी सनसनीखेज खबर आ गई और ये लोग नई बहस में उलझ गए…

दो हफ्ते तक जिंदगी से जंग लड़ने के बाद निर्भया की मौत हो गई थी…आशिफा को भी निर्मम तरीके से मार दिया गया…और अब प्रियंका भी इंसानी जानवरों की भेंट चढ़ गई…

ऐसी मौत किसी एक बेबस इंसान की मौत नहीं बल्कि व्यवस्था पर देश के भरोसे और विश्वास की मौत होती है… सभ्य समाज में जीने का दावा करनेवाले हरेक इंसान की मौत होती है…मानवता को तार तार करने वाली ऐसी घटनायें सरकार और पुलिस प्रशासन के साथ समाज को भी कठघरे में खड़ा करती हैं…

प्रताड़ना से जुड़े ऐसे अपराधों के लिए सख्त कानून बनाये जाने, नाबालिग के साथ दुष्कर्म पर फांसी की सजा का प्रावधान किये जाने, फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ाकर पीड़िता को शीघ्र न्याय और अपराधी को सजा दिलाये जाने, ऐसे मामलों की सुनवाई महिला जज द्वारा कराये जाने, पीड़ित महिला के बयान के एफिडेविट को प्रामाणिक सबूत मानकर क्रास एग्जामिनेशन की प्रक्रिया को खत्म करने और ऐसी घटनाओं में संलिप्त व्यक्तियों की पहचान सार्वजनिक किये जाने की दिशा में कुछ कदम तो सरकार ने उठाये लेकिन बहुत कुछ है जो करना बाकी है…और वह सब कुछ समाज के लोगों को मिलकर करना होगा…

पुरुष समाज को स्त्रियों के लिए एक बेहतर समाज बनाने की चुनौती को स्वीकारना करना ही होगा…जब तक देश के किसी भी कोने में किसी भी बेटी के सामने भय का यह साया बना रहेगा तब तक हम एक सभ्य समाज में जीने का दावा नहीं कर सकते…

बेटियों के लिए भी यह जरूरी हो गया है कि वे आत्मरक्षा के तरीके को सीखें…इसके लिए माँ बाप बचपन से ही उन्हें प्रोत्साहित करें…

आज जरूरत कैंडल मार्च निकलने की नहीं बल्कि कुछ ऐसा काम करने की है जो बेटियों और महिलाओं को तन और मन से मजबूत बनाये… उनका आत्मसम्मान बढ़ाये …और यही उन दिवंगत बेटियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी…

डा. स्वयंभू शलभ

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