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2002 दंगा मामले में नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रियों को क्लीनचिट, संजीव भट्ट सहित तीन अफसरों पर अब होगी करवाई

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Image Credits: PlusPng/India Speaks

December 12, 2019

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गुजरात में 2002 में गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों की जांच के लिए गठित नानावटी आयोग की रिपोर्ट का दूसरा और आखिरी हिस्सा बुधवार को विधानसभा में पेश किया गया. वर्ष 2002 में हुए गुजरात दंगों की जाँच के लिए गठित नानावती आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी है. पाँच साल पहले ये रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी गई थी. लेकिन ये रिपोर्ट अब विधानसभा में रखी गई है.

तीन पुलिस अधिकारियों संजीव भट्ट, आरबी श्रीकुमार और राहुल शर्मा के खिलाफ जांच की सिफारिश की गई है. नानावटी आयोग का गठन 6 मार्च 2002 को उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। इस रिपोर्ट का पहला हिस्सा सितंबर 2008 में पेश किया जा चुका है, जिसमें भी मोदी को क्लीनचिट मिल गई थी. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार बुधवार को विधानसभा में पेश आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो यह दिखाए कि यह हमले राज्य के किसी मंत्री द्वारा उकसाए या भड़काए गए थे.’

 

नानावटी आयोग

वर्ष 2002 में नरेंद्र मोदी ने नानावती आयोग का गठन किया था. 27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 डिब्बे को जला दिया गया. इसमें अयोध्या से लौट रहे 59 कारसेवकों की मौत हो गई. घटना के बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे, जिसमें 1,044 लोग मारे गए। इनमें 790 मुसलमान और 254 हिंदू थे. आयोग की रिपोर्ट का पहला हिस्सा सितंबर 2008 में पेश किया गया. रिपोर्ट में गोधरा कांड को सोची-समझी साजिश बताया गया. इसके साथ ही इसमें नरेंद्र मोदी, उनके मंत्रियों और वरिष्ठ अफसरों को भी क्लीन चिट दी गई. लगभग 3000 पन्नों की इस रिपोर्ट में तीन पुलिस अधिकारियों आरबी श्रीकुमार, संजीव भट्ट और राहुल शर्मा की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं और इनकी भूमिका की जाँच की सिफ़ारिश की गई है.

रिपोर्ट का दूसरा हिस्सा नवंबर 2014 को गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को दे दिया था. लेकिन इस रिपोर्ट को 5 साल बाद 11 दिसंबर 2019 को विधानसभा में पेश किया गया. इस रिपोर्ट में भी गोधरा कांड को सोची-समझी साजिश बताया गया. इसके साथ ही इन दंगों में नरेंद्र मोदी या उनके तत्कालीन मंत्रियों अशोक भट्ट, भरत बारोट और हरेन पंड्या की भूमिका को भी नकारा गया. आयोग ने पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए हैं. आयोग ने कहा है कि पुलिस कई जगहों पर भीड़ को काबू करने में नाकाम रही क्योंकि उनके पास या तो पर्याप्त पुलिसकर्मी नहीं थे या उचित हथियार नहीं थे.

आरबी श्रीकुमार ने गुजरात हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करके सरकारी जाँच आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की थी. पहले इस आयोग को गोधरा में ट्रेन में लगी आग की जाँच करनी थी और फिर गुजरात दंगों की.

 

गुजरात दंगा

गोधरा कांड में 59 हिंदू मारे गए थे. 2002 में गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 डिब्बे में लगी आग में कई कार सेवकों की मौत हुई थी. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ डिब्बे में कुल 59 लोग मौजूद थे. इनमें से ज़्यादातर वो लोग थे, जो अयोध्या से लौट रहे थे. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, इन दंगों में कुल 1044 लोग मारे गए, जिनमें 790 मुसलमान और 254 हिंदू थे. गुजरात के दंगों के मामले में 450 से ज़्यादा लोगों को अदालतों ने दोषी ठहराया है. इनमें से लगभग 350 हिंदू और 100 मुसलमान हैं. मुसलमानों में 31 को गोधरा कांड के लिए और बाक़ियों को उसके बाद भड़के दंगों के लिए दोषी पाया गया है. 5 अगस्त 2004 में गुजरात सरकार ने आयोग के टर्म्स ऑफ रिफरेन्स में संशोधन करते हुए आयोग को साबरमती एक्सप्रेस आगजनी और इसके बाद हुए दंगों को लेकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, कैबिनेट के मंत्रियों और नौकरशाहों की भूमिका जांचने की अनुमति दी थी. मार्च 2008 में जस्टिस केजी शाह का निधन होने के बाद जस्टिस अक्षय मेहता को आयोग में नियुक्त किया गया. आयोग को जांच पूरी करने के लिए करीब छह-छह महीने का 24 बार विस्तार दिया गया था.

 

अब किनकी जांच होगी ?

संजीव भट्ट, निलंबित डीआईजी: गुजरात दंगों की जांच करने वाली एसआईटी और नानावटी आयोग से कहा था कि वे उस मीटिंग में मौजूद थे जिसमें गोधरा कांड के बाद नरेंद्र मोदी ने कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों से दंगाईयों से नरमी से निपटने को कहा था. उनके इस बयान के बाद से वो लगातार ही सुर्ख़ियों में रहे और जून 2019 में भट्ट को 1990 के एक मामले में निचली अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

आरबी श्रीकुमार, रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक:  एसआईटी के सामने गुजरात सरकार के खिलाफ दस्तावेज सौंपे थे. पहले पुलिस अधिकारी थे, जिन्होंने नानावटी-शाह आयोग के सामने मोदी के खिलाफ गवाही दी. इसके बाद गुजरात सरकार ने उनका प्रमोशन रोक दिया.

राहुल शर्मा, पूर्व डीआईजी: इन्होनें जांच एजेंसियों को गुजरात दंगों के दौरान कुछ भाजपा नेताओं की फोन पर हुई बातचीत की सीडी दी थी. फरवरी 2015 में राहुल शर्मा ने पुलिस की नौकरी छोड़ दी और अब वे गुजरात हाईकोर्ट में वकालत कर रहे हैं.

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