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300 वर्ष पुरानी प्रथा तोड़कर किन्नरों का भी मृत्यु पश्चात् किया जा रहा है कर्मकांड

तर्कसंगत

December 13, 2019

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पिंडदान संस्कार एक हिन्दू प्रथा है, जिसमें स्वर्ग सिधारे पूर्वजों को श्राद्ध अर्पित किया जाता है। सितम्बर महीने में पितृपक्ष जिसे पितरों का पक्ष (पखवारा) भी कहा जाता है, 17 दिनों का होता है। इन 17 दिनों के पितृपक्ष मे श्राद्ध एवं पिंडदान करने का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस पुण्य क्षेत्र में पिता का श्राद्ध करके पुत्र अपने पितृऋण (पितृदोष) से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है।

सैकड़ों वर्षों से किसी भी धर्म के किन्नरों का धार्मिक अंतिम संस्कार नहीं किया गया है। इतना ही नहीं ज्यादातर किन्नरों को कब्रिस्तान के बजाय कहीं सुनसान में जलाया जाता रहा है। हिन्दू पंडित उनके म्रत्यु बाद के कर्मकांड करने से मना कर देते हैं और इसीलिए हर साल पितृपक्ष में मृतक परिजनों को दिया जाने वाला श्राद्ध भी कभी नहीं होता। लेकिन पिछले कुछ वर्ष से मृतक किन्नरों को पिंडदान देने की शुरुआत हो चुकी है, जो उन्हें समाज में बराबरी का दर्जा मिलने के संघर्ष में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

किन्नर अखाडा के संस्थापक सदस्य ऋषि अजय ने ‘द एशियन एज‘ को बताया कि, हिन्दू धर्म में जन्मा प्रत्येक मनुष्य 16 कर्मकांडो का अधिकारी हो जाता है, जिनमें जन्म के समय किये जाने वाले संस्कारों सहित नाम संस्कार, मुंडन संस्कार, जनेहू संस्कार, विवाह संस्कार और अंतिम संस्कार शामिल हैं। लेकिन किन्नरों को अब तक शुरू से लेकर अंतिम संस्कार तक हर अधिकार से दूर रखा गया। हम ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि अब ऐसा और न हो।”

इस नई प्रथा के बारे में किन्नर अखाडा की महामंडलेश्वर लक्ष्मी त्रिपाठी कहती हैं, “हम तीन सौ वर्ष पुरानी कुप्रथा को तोड़ रहे हैं, जिसमें किन्नरों को म्रत्यु पश्चात कर्मकांड करने की इजाजत नहीं है। हम अब से किन्नरों के अंतिम संस्कार की परंपरा भी शुरू करेंगे। “

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