ख़बरें

सेना प्रमुख ने भी माना की फौज में अफसरों की कमी है, क्या है इसके कारण और किन बदलाव की है ज़रूरत?

तर्कसंगत

Image Credits: Hindustan

January 14, 2020

SHARES

भारतीय सेना के पास अधिकारियों की बेहद कमी है और ये पद भर नही पा रहे. ये बात भारत के नए सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने पद ग्रहण करने के बाद अपनी पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा. उन्होनें कहा कि भारतीय फ़ौज में अफ़सरों की कमी बरक़रार है.भारतीय सेना में अफ़सरों की कमी इसलिए नहीं है कि लोग आवेदन नहीं कर रहे हैंबल्कि इसलिए है कि सेना ने अफ़सर चुनने के अपने मानकों को अब तक नीचे नहीं किया है. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार नरवणे ने कहा कि ‘वे भारतीय फ़ौज में संख्या से ज़्यादा गुणवत्ता को अहमियत देंगे’. भारतीय सेना प्रमुख के इस बयान की सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चा हुई और कई रिटायर्ड अफ़सरों ने उनके इस बयान की जमकर तारीफ भी की है.

 

भारतीय सेना

 

अफसरों की कमी

बता दें कि अगस्त 2018 में प्रेस सूचना विभाग ने भारतीय रक्षा मंत्रालय के हवाले से बताया था कि 1 जनवरी 2018 तक भारतीय सेना के पास 42 हज़ार से अधिक अफ़सर थे और 7298 सैन्य अफ़सरों की कमी थी. इसके एक साल बाद समाचार एजेंसी पीटीआई ने बताया कि यह संख्या बढ़कर 7399 हो गई है. यानी भारतीय फ़ौज में लेफ़्टिनेंट या उससे ऊपर के पद के जितने अफ़सरों की ज़रूरत है, उसमें 100 अधिकारी और कम हो गए हैं. भारतीय नौसेना और वायुसेना में भी अफ़सरों की कमी है. पर थल सेना में अफ़सरों की कमी उनसे कई गुना ज़्यादा है.

 

क्या केवल शारीरिक और मानसिक मापदंड ही काफी है ?

भारतीय सेना में अफ़सर लेवल पर एंट्री पाने में असफल रहे अभ्यर्थी बताते हैं कि ‘जब एसएसबी (सर्विस सलेक्शन बोर्ड) द्वारा रिज़ल्ट की घोषणा की जाती है तो उन्हें बोर्ड के सदस्य कहते हैं कि अमिताभ बच्चन, राहुल द्रविड और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी यह परीक्षा दी थी, पर वे इसे नहीं क्लियर कर पाए, इसलिए सिलेक्शन न होने पर दिल छोटा ना करें.’

बताया जाता है कि एसएसबी हर अभ्यर्थी के अकादमिक रिकॉर्ड के अलावा उसकी लेखन क्षमता, डिबेट करने के तरीक़े, टीम में काम करने की क्षमता, तार्किक क्षमता और फ़ैसले लेने की क्षमता को परखता है.

बोर्ड के अनुसार हर अभ्यर्थी का मूल्यांकन OLQ (Officer Like Qualities) के मापदण्ड पर किया जाता है. यानी एक अभ्यर्थी में सैन्य अफ़सर बनने की ख़ूबियाँ हैं या नहीं, चयन प्रक्रिया में इसका ख़ास ध्यान रखा जाता है.

भारतीय सेना के रिटायर्ड अधिकारी और कारगिल युद्ध के ‘हीरो’ कहे जाने वाले मेजर डीपी सिंह ने सेना प्रमुख के बयान के बाद ट्वीट किया था कि “SSB में अधिकतम अभ्यर्थी इसलिए सफल नहीं हो पाते क्योंकि उनमें ‘ज़िम्मेदारी की भावना’ का अभाव है.” तो क्या ये समझना सही होगा कि भारत में सेना के लिए क़ाबिल लोगों की संख्या घट गई है या इसके साथ ही साथ कुछ और भी वजहें हैं?

 

फ्रंट लाइन अफसरों की है ज़्यादा कमी

फ़ौज में अफ़सरों की कमी की जो बात है, उस पर अब नहीं, बल्कि एक दशक से अधिक समय से चर्चा हो रही है. फ़ौज में मूल रूप से ये कमी जूनियर अफ़सरों के स्तर पर है, जैसे लेफ़्टिनेंट, कैप्टन और मेजर. यही वो लोग हैं जो भारतीय फ़ौज में ‘फ़्रंट लाइन’ की ताक़त कहे जाते हैं और किसी भी युद्ध के दौरान मोर्चा संभालते हैं और कठिन से कठिन टास्क को पूरा कर देश को गौरवान्वित करते हैं. हम इसके उद्धरण को कारगिल में शहीद हुए अफसरों से समझ सकते हैं.

अब सवाल है की इन अफसरों की कमी से फौज के मौजूदा अफसरों पर कैसे प्रभाव पड़ता है? उद्धरण के लिए अगर फौज के किसी बटालियन में 15 अफसरों की नियुक्ति अधिकृत है मगर उपलब्ध अफसर केवल 10 ही हैं तो तो उन 10 अफसरों को उन 5 अफसरों के बराबर का भी काम करना पड़ता है क्यूंकि किसी भी बटालियन के लिए अधिकृत अफसरों की संख्या बटालियन के सुचारु रूप से काम करने के हिसाब से तय की जाती है. उदाहरण के लिए, कश्मीर, सियाचीन और पूर्वोत्तर भारत के तनावपूर्ण इलाक़ों में एक सैन्य अफ़सर के बिना रात की पेट्रोलिंग नहीं होती. नियम है कि उसे एक अफ़सर ही लीड करेगा. अब उसे एक ऐसे अफ़सर की ड्यूटी भी करनी है जो उनकी बटालियन में कम है.

 

देश में युवाओं की कमी नहीं

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में फौज के लायक युवाओं की कमी है, हमारे राजनेता और फ़िल्मी सितारे फौज को लेकर कई सारे ब्यान देते हैं.  हालिया समय में चुनावी राजनीती हमारे फौज के बगैर पूरी नहीं होती. फिर ऐसा क्यों है कि फौज में भर्ती घट रही है? असल बात ये है कि जो अच्छे लड़के हैं, वो फ़ौज में आना ही नहीं चाह रहे. वे आईआईएम में जा रहे हैं, अन्य प्रोफ़ेशनल कोर्स कर रहे हैं. और इसकी कुछ वजहें हैं. सबसे बड़ी वजह है कि फ़ौज की नौकरी में शारीरिक परिश्रम बहुत है. दूसरी बड़ी वजह ये है कि फ़ौज की नौकरी से जुड़ा स्टेटस दिन प्रतिदिन कम हो रहा है, सुविधाएं और सैलरी कम रह गई हैं.

क्लास-वन सेवाओं में सबसे कम वेतन पाने वाली नौकरी आर्मी की है. प्रमोशन होने की संभावनाएं फ़ौज में सबसे कम होती हैं क्योंकि हमारे पदों का ढाँचा बड़ा अलग है. सिविल सर्विस में तक़रीबन सभी जॉइंट सेक्रेट्री या एडिश्नल सेक्रेट्री तो कम से कम बन ही जाते हैं. पर आर्मी में 80-90 परसेंट लोग मेजर या लेफ़्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुँचकर ही रिटायर हो जाते हैं.

अगर प्राइवेट जॉब में भी देखें तो इंजीनियरिंग कर के ऑन साईट जाने की ललक आज भी कम नहीं है, भले ही काम 16 घंटे करना पड़े मगर ऐरकण्डीशन कमरे में काम करना बॉर्डर पर खड़े होने से कहीं ज़्यादा बेहतर माना  जाता है. जान का खतरा अलग और शहीद होने के बाद परिवार को मुआवज़ों के लिए दर दर भटकने की ज़ेहमत कोई नहीं देना चाहता.

भारत में अगर क्लास-ए की 10-12 सेवाएं हैं, तो सेना में अफ़सर होना उनमें सबसे अंत में आता है. दिखावे का ज़माना है, बच्चे बहुत होशियार हो गए हैं, सब यह देखते हैं कि इतनी मेहनत और वक़्त देने के बदले उन्हें क्या मिलेगा? पहले 80-90 फ़ीसद बच्चे, जो एनडीए जाते थे, वे अच्छे पब्लिक स्कूलों से होते थे. जब तक ब्रिटिश शासन था, फ़ौज के अफ़सर को आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विस) वालों से 10 फ़ीसद अधिक पैसा मिलता था. तब बड़े-बड़े लोग फ़ौज में जाते थे.

 

किन बात पर सरकार ध्यान दे ?

एक उदाहरण से समझिए कि जो फ़ौजी अफ़सर सियाचीन में दस फीट बर्फ़ के बीच बैठा है, उसे जितना हार्ड एरिया अलावेंस मिलता है, श्रीनगर के हीटर वाले कमरे में बैठे आईएएस अफ़सर को भी मिलता है. तो बच्चा किसे चुनेगा? तो ये जो बारीकियाँ हैं, उन्हें सरकार समझ नहीं पाती है. अगर समझ पाते हैं तो वे कुछ करना नहीं चाहते. और हमने देखा है कि राजनीतिक दल कुछ करना भी चाहे तो ब्यूरोक्रेसी उसे होने नहीं देती. सरकार नहीं समझती है कि एक मेजर या लेफ़्टिनेंट कर्नल 50-60 साल की उम्र में वो ग्राउंड ड्यूटी नहीं कर सकता, उसकी शारीरिक क्षमता इतनी नहीं रह जाती. और अगर वो 45 की उम्र में रिटायरमेंट ले ले, तो वो कहाँ जाए.

फ़ौज में ‘शॉर्ट सर्विस कमीशन’ पहले से है, लेकिन इसे बढ़ाना पड़ेगा. अभी ग्रेजुएशन लेवल के बाद ‘शॉर्ट सर्विस कमीशन’ से लोग चुने जाते हैं, वे नौ महीने ट्रेनिंग करते हैं, फिर दस साल नौकरी करते हैं जिसे चार साल बढ़ाया जा सकता है. ‘शॉर्ट सर्विस कमीशन’ से आये लोगों ने बढ़िया प्रदर्शन किया है और काफ़ी लोग शॉर्ट सर्विस पूरी करने के बाद दोबारा परमानेंट नौकरी के लिए चुने गए हैं. जबकि कुछ लोगों ने बड़े जोश के साथ अपनी शॉर्ट सर्विस पूरी की और उसके बाद वे बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों में नौकरी करने चले गए.

 

इन सबके बावजूद गुणवत्ता में कमी नहीं होगी

सेना प्रमुख ने इस कमी का ज़िक्र एक बार फिर किया है. इसका मतलब ये नहीं है कि तत्काल कोई समस्या आ खड़ी हुई है. ये समस्या अफसरों के स्तर पर है न कि सैनिकों के स्तर पर. सेना का हमेशा से ये रुख़ रहा है कि वो कम अफ़सरों में काम चला लेंगे, पर ख़राब अफ़सर उन्हें नहीं चाहिए, भले ही 10 अफ़सरों को सौ का काम करना पड़े. इसके पीछे की वजह को समझना होगा. जिस आदमी को सेना ने बंदूक़ देकर खड़ा किया है और उसके पीछे हथियारबंद सैनिकों की एक टुकड़ी है, उसकी निर्णय करने की क्षमता कैसी है, यह पता होना बहुत ज़रूरी है. उसमें एक लीडर की कुछ बुनियादी ख़ूबियाँ होनी ज़रूरी हैं और सलेक्शन के समय सेना इस बात को सुनिश्चित करती है, वरना सैन्य ऑपरेशन के दौरान कई लोगों की जान को ख़तरा हो सकता है.

अगर आज के युवा बड़े बैंकों में, सिविल सर्विस में, डॉक्टरी-इंजीनियरिंग को लेकर ज़्यादा उत्साहित हैं और फ़ौज में भर्ती होने के लिए उनके पास पर्याप्त कारण नहीं है, तो अफ़सरों की ये कमी पूरी होना भविष्य में बड़ी मुश्किल है.

 

 

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...