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मुकेश की याचिका का हाई कोर्ट ने किया निपटारा, ट्रायल कोर्ट जाने की दी मंजूरी, चारों दोषियों की नींद उड़ी

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Image Credits: News18

January 15, 2020

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दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 को 23 वर्षीय छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के मामले में दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को चारों दोषियों को 22 जनवरी को तिहाड़ जेल में सुबह सात बजे फांसी दिये जाने का आदेश सुनाया था। निर्भया केस के दोषी मुकेश की डेथ वॉरंट को चुनौती देने वाली याचिका का दिल्ली हाईकोर्ट ने निपटारा कर दिया है.एनडीटीवी के अनुसार हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान दोषी मुकेश को ट्रायल कोर्ट में जाने को कहा है. इसके पहले  हिंदुस्तान टाइम्स  के रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार ने बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि दया याचिका दाखिल होने की वजह से निर्भया गैंगरेप केस के 4 दोषियों को 22 जनवरी को फांसी नहीं हो सकेगी। तिहाड़ जेल की तरफ से पेश हुए एक वकील ने कहा, “दया याचिका खारिज होने के 14 दिनों के बाद ही फांसी की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।”

क्यूरेटिव याचिका ख़ारिज किये जाने के तुरंत बाद, मुकेश ने राष्ट्रपति के समक्ष अपनी दया याचिका दायर की। उसने अडिशनल सेशन न्यायाधीश द्वारा डेथ वारंट जारी करने के फैसले को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसमें कहा गया कि उनकी दया याचिका राष्ट्रपति के समक्ष लंबित थी। अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर के माध्यम से दायर याचिका में यह भी मांग की गई थी कि अगर राष्ट्रपति की दया याचिका खारिज कर दी जाए,तो उनके मुवक्किल को न्यूनतम 14 दिनों का नोटिस दिया जाएगा ताकि वह खुद को मानसिक रूप से तैयार कर सके।

 डेथ वारंट जारी होने के बाद निर्भया के चारों दोषियों की नींद उड़ी हुई है।  तिहाड़ जेल के अधिकारियों ने निर्भया गैंग रेप के चारों दोषियों से पूछा है कि वो फांसी से पहले आख़िरी बार अपने परिवार से कब मिलना चाहेंगे।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने जेल के सूत्रों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि  फांसी की तारीख़ से दो दिन पहले दोषियों को किसी से मिलने की इजाज़त नहीं होगी।  जेल के अधिकारी ने बताया, “तारीख़ तय होने पर चारों को बारी-बारी से अपने परिवार के सदस्यों से मिलने दिया जाएगा।”

जेल सूत्रों का कहना है कि उसके चेहरे पर मौत का खौफ साफ नजर आता है। उसे मामूली बात पर भी गुस्सा आ जाता है। जेल प्रशासन विनय के व्यवहार पर नजर रख रहा है। जेल अधिकारी व कर्मचारी बातचीत के दौरान उसे सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले दिनों में विशेषज्ञों से उसकी काउंसिलिंग भी कराई जा सकती है।

चारो दोषियों मुकेश कुमार, अक्षय सिंह, विनय शर्मा और पवन गुप्ता को फांसी से पहले अपने परिजनों से मिलने की इजाज़त मिली है।  जेल के अधिकारियों ने बताया कि वो फांसी से पहले उन पैसों का हिसाब भी करेंगे जो चारों ने जेल में काम करके कमाए हैं. ये पैसे उनके परिवार को दिए जाएंगे।

अक्षय सिंह ने जेल में रहने के दौरान काम करके 69,00 रुपए, विनय शर्मा ने 39,000 और पवन गुप्ता ने 29,000 रुपए कमाए हैं। मुकेश कुमार ने जेल में काम करने से इनकार कर दिया था। दोषियों ने इस बात की अभी तक जानकारी नहीं दी है कि उनके दैनिक आय उनकी मौत के बाद किसे दी जाएगी।

अदालत विनय शर्मा और मुकेश कुमार की क्यूरिटिव पिटिशन ख़ारिज कर चुकी है। क्यूरिटिव पिटिशन ख़ारिज होने के बाद विनय शर्मा के पिता उससे मिलने आए थे और पिता से बातचीत के दौरान विनय कई बार रो पड़ा था। दोनों की मुलाकात जेल अधीक्षक कार्यालय परिसर में कराई गई। करीब एक घंटे तक दोनों मिले। मुलाकात के बाद विनय पहले की तुलना में कुछ कम परेशान दिख रहा था।

इससे पहले मुकेश से मुलाकात के लिए उसकी मां शुक्रवार को जेल संख्या दो में आई थी। यह मुलाकात करीब आधे घंटे तक चली। पवन से भी समय समय पर उसके रिश्तेदार मिलने आते रहते हैं। जेल सूत्रों के अनुसार जेल संख्या दो में बंद दोषी अक्षय से नवंबर के बाद से अब तक किसी ने मुलाकात नहीं की है। हालांकि अक्षय ने जेल प्रशासन को अपने परिवार से अब तक किसी को बुलाने की बात नहीं कही है।

जेल सूत्रों के अनुसार, 2016 में मुकेश, पवन व अक्षय ने ओपन स्कूल में दसवीं कक्षा में दाखिला लिया था। परीक्षा भी दी थी, लेकिन ये उत्तीर्ण नहीं हो सके। इसी तरह विनय ने बीए में दाखिला कराया, लेकिन इसकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई।

निर्भया मामले के बाद देश में बलात्कार की परिभाषा में काफी बदलाव हुए. इससे पहले सेक्सुएल पेनिट्रेशन को रेप माना जाता था, लेकिन इस घटना के बाद छेड़छाड़ और दूसरे तरीकों से यौन शोषण को भी बलात्कार में शामिल किया गया।

पार्लियामेंट में नया जुवेनाइल जस्टिस बिल पास हुआ, जिसमें बलात्कार, हत्या और एसिड अटैक जैसे क्रूरतम अपराधों में 16 से 18 साल के नाबालिग आरोपियों पर भी वयस्क कानून के तहत आम अदालतों में केस चलता है।नए कानून के तहत 16 से 18 साल के नाबालिग को इन अपराधों के लिए बाल संरक्षण गृह में रखा जाने की बजाए सजा हो सकती है, हालांकि ये सजा अधिकतम 10 साल की ही हो सकती है और फांसी या उम्रकैद नहीं दिया जा सकेगा।

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