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PM मोदी के गैरज़िम्मेदाराना बयान पर IMA ने जताई आपत्ति, कहा- माफी मांगे प्रधानमंत्री

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Image Credits: Seek Logo/City Post

January 16, 2020

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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक कथित बयान पर आपत्ति जताई है. साथ ही उनसे कहा है कि या तो वह अपने आरोप से इनकार करें, या साबित करें या माफी मांगें.
आईएमए ने विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि मीडिया रिपोट्र्स के मुताबिक प्रधानमंत्री ने एक बयान में कहा है कि शीर्ष कंपनियां रिश्वत के तौर पर लड़कियां उपलब्ध कराती हैं. अगर प्रधानमंत्री ने ऐसा कहा है तो उन्हें अपनी बात साबित करनी चाहिए, अन्यथा वह इस गलत बयान के लिए माफी मांगें.

नए साल के शुरू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की शीर्ष फार्मा कंपनियों के साथ बैठक की थी. कहा जाता है कि इस बैठक के दौरान ही प्रधानमंत्री ने अनएथिकल मार्केटिंग प्रैक्टिस का जिक्र किया था. इस संबंध में 13 जनवरी को मीडिया के हिस्से में रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी कि प्रधानमंत्री ने शीर्ष फार्मा कंपनियों को चेतावनी दी है कि वे डॉक्टरों को घूस के रूप में महिलाएं, विदेश यात्राएं और गेजेट देना बंद करें.

 

 



 

आईएमए ने कहा, ”हम जानना चाहते हैं कि क्या सरकार के पास उन कंपनियों की जानकारी थी जो डॉक्टरों को लड़कियां उपलब्ध कराती हैं, और अगर थी तो उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठक में बुलाने के बजाय आपराधिक मामला दर्ज क्यों नहीं कराया गया.”

आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजन शर्मा और सेक्रेटरी जनरल डॉ. आरवी असोकन के हस्ताक्षर वाली विज्ञप्ति में यह भी कहा गया है कि पीएमओ ऐसे डॉक्टरों के नाम भी जारी करे. साथ ही राज्यों की मेडिकल काउंसिल ऐसे डॉक्टरों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करे.

नवंबर महीने में पुणे की संस्था सपोर्ट फॉर एडवोकेसी एंड ट्रेनिंग टू हेल्थ इनीशिएटिव्स ने अपनी स्टडी में दावा किया था कि डॉक्टर फ़ार्मा कंपनियों से रिश्वत के तौर पर महंगी यात्राएं, टैबलेट, चांदी के सामान, सोने के गहने और पेट्रोल कार्ड तक लेते हैं.आईएमए ने यह भी कहा कि इस तरह के बयानों का मक़सद देश में लोगों के स्वास्थ्य और मेडिकल शिक्षा को बेहतर बनाने के अनसुलझे मुद्दों से भटकाना है.

आईएमए के महासचिव डॉ. आरवी असोकन ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि अगर प्रधानमंत्री का दावा सही है तो उन डॉक्टरों और कंपनियों पर कार्रवाई की जाए. लेकिन अगर इसमें सत्यता नहीं है तो उन्हें माफ़ी मांगनी चाहिए.

एसोसिएशन ने कहा कि पिछले कई साल में स्वास्थ्य के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे या मानव संसाधन को बेहतर बनाने के लिए कोई नया निवेश नहीं हुआ है. स्वास्थ्य बजट जीडीपी का महज 1% से 1.3% है. डॉक्टरों पर हमले और अस्पतालों में हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हुई है. सरकार चिकित्सा संस्थानों की हिफाजत करने में नाकाम रही है. एंबुलेंस तक सुरक्षित नहीं हैं. सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में उस केंद्रीय कानून को भी लागू नहीं किया, जिसका वादा खुद उन्होंने किया था. ऐसे हालात में आईएमए यह मानता है कि इस तरह की क्रूर रणनीति के जरिए स्वास्थ्य क्षेत्र में वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है.

 

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