मेरी कहानी

मेरी कहानी : CAA के पक्ष और विपक्ष वाले इस तनावपूर्ण माहौल में एक औसत भारतीय की गुहार

तर्कसंगत

January 16, 2020

SHARES

जब से कुछ राजनीतिक समझ आयी तब बीजेपी के अटल बिहारी जी की सत्ता थी। लगा कि वाक़ई इंडिया शाइनिंग हो रहा है। 2004 में अटल जी की सरकार जाने के साथ और कांग्रेस की UPA सरकार आने के वक़्त कुछ धक्का सा लगा पर सच बात बतायें तो किसी भी राजनीतिक दल के धुर विरोधी या सम्पूर्ण पक्ष में हो जाने की आदत ना हम में तब थी ना अब है।

या यूँ कहूँ कि पढ़ाई, नौकरी फ़िर बीवी बच्चों से उतनी फ़ुरसत ही नहीं मिली। यक़ीन नहीं करेंगे, अन्ना आंदोलन के वक़्त हमें ज़रूर लगा था कि कुछ करना चाहिए, देश को बदलना चाहिए। पर तब भी हम कुछ ना कर सके और लगे रहे अपनी उसी घिसी पिटी ज़िंदगी की रोज़ी रोटी की जुगत में।

मोदी जी को मन ही मन बहुत पसंद करते थे और सच बोलूँ तो आज भी करते हैं। उनकी सभी बातों को ना भी माने, पर कहीं ना कहीं  विपक्ष वाले हमें जनता के सामने नाटक करते प्रतीत होते हैं। हम आज भी उनके सभी फ़ैसलों को सही मानते हैं और धीरे से ही सही, कभी कभार बस या ट्रेन में सहयात्रियों से उनके पक्ष में जिरह भी कर लेते हैं।

पर आज CAA के पक्ष और विपक्ष के इस तनावपूर्ण माहौल में मन घबराता है। हमें वाक़ई नहीं पता कि कौन सा पक्ष सही है और कौन सा पक्ष ग़लत? हमें इसकी परवाह भी नहीं। चाहे आप हमें देश के लिए ग़ैर ज़िम्मेदार कहें या अनपढ़ रोटी कमाने की मशीन…हमें वाक़ई हमारी दिनभर की भागदौड़ से इस फ़जूल सी लगने वाली बात के लिए फ़ुरसत ही नहीं है।

हमें इस बात से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कौन देश में रहेगा या कौन निकाला जाएगा? सच तो ये है कि हमें तो ये भी नहीं पता कि शाम तक या कल सुबह तक ट्रेन के दरवाज़े पर लटके लटके ज़िंदा भी बचेंगे या नहीं।

 

पर इतने सारे बुद्धिजीवी लोगों को जब बहस करते सुनते है और जो प्रोटेस्ट प्रोटेस्ट का खेल चल रहा है, असल में हम ही पिस रहे हैं। कभी चौराहे पर धरने के कारण लगने वाले ट्रेफ़िक में, तो कभी ज़बरदस्ती राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी होने में।

जो भी हो फ़ैसला कुछ बुद्धिजीवी लोगों को ही करना है, हमारे बहस करने या एक दूसरे का सिर फोड़ देने से कुछ भी बदलने वाला है नहीं, सो उन बुद्धिजीवियों से विनम्र अनुरोध है कि भाई! एक दूसरे की बात सुन लो। जो भी सही ग़लत हो मिलजुल कर फ़ैसला कर लो। लोकतंत्र को सच में लोगों का तंत्र बनाओ।

और जनता से भी यह अपील करेंगे कि वे समझें कि ये तो राजनेता हैं फ़िर एक दूसरे को गालियाँ निकाल कर एक हो जाएँगे। पर हम शायद इस फ़ेसबुकिया दौर में कुछ बचे हुए वर्चुअल दोस्त भी दूर हो जाएँगे। बशीर बद्र साहब की ये दो लाइनें हमेशा ज़हन में रखें: 

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों।
 

 

लेखक : सुलभ जैन

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...