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पैरालिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित तैराक हैं शरथ गायकवाड़

तर्कसंगत

Image Credits: Lang Img

January 17, 2020

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कहते हैं इस दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी दुर्बलता और कमज़ोरी होती है। जब व्यक्ति अपनी बेजोड़ मेहनत, दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास से अपनी दुर्बलता को अपनी कमजोरी न मान कर उसे अपना हथियार बना लेता है और निरंतर प्रयास करना शुरू कर देता है तो सफलताएँ उसके कदम चूमने लगती हैं। ऐसे व्यक्ति को सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। वो अपनी दुर्बलता से सफ़लता तक का सराहनीय सफर तय करता है और दूसरों के लिए प्रेरणा देने का काम करता है। ऐसे ही एक पैरा-एथलीट हैं जो अपने बाएं हाथ में जन्मजात विकृति के साथ पैदा हुए थे।

वो साल 2012 में हुए लंदन में पैरालिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उनके खेल प्रदर्शन को देखते हुए भारत सरकार उन्हें साल 2015 में अर्जुन पुरस्कार से नवाज़ चुकी है। दक्षिण कोरिया स्थित इंचियोन में साल 2014 में खेले गये एशियाई पैरा खेलों में उन्होंने 6 पदकों को अपने नाम किया था। अब तक आपकी सोच सरहदे पार कर चुकी होंगी। हम आपको बता दें वो शख्स कोई और नहीं बल्कि बेंगलुरु में जन्मे शरथ गायकवाड़ है जिन्होंने अपनी अथक मेहनत से अनहोनी को होनी में बदल दिया। शरथ आज के युवाओं के लिए एक ऐसे रोल मॉडल हैं जिन्होंने अपनी कमजोरी को अपने सफलता के आगे रोड़ा बनने नहीं दिया।

शरथ को अपने स्कूल के दिनों के दौरान तैराकी के बारे में जानकारी मिली। पूल के साथ शरथ का परिचय तब हुआ जब तैराकी उनके स्कूल के सभी छात्रों के लिए अनिवार्य कर दी गई थी। स्विमिंग के बारे में अपने अनुभवों को साझा करते हुए शरथ कहते हैं कि “पूल मेरे लिए एक अलग तरह की दुनिया थी। मैं शुरू में थोड़ा डर गया था क्योंकि मेरे लिए यह पूरी तरह से नया था। मैं इन सब चीजों से अनजान था। स्विमिंग सेंटर के कोच ने मेरा हौसला बढ़ाया और मुझे स्विमिंग करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने इस बात को आसानी से भांप लिया कि पानी के प्रति मैं असहज था। मेरे कोच ने मुझे धीरज बंधाया और इसका मुकाबला करने के लिए मेरा मनोबल बढ़ाने लगे।” कहते है न कि सही मार्गदर्शन आपको सफलता के करीब पहुंचा सकता है। शरथ के साथ भी हुआ यही। कोच से प्रेरणा पाकर जल्द ही शरथ के भीतर से पानी का डर समाप्त हो गया। अब तो मानो पानी उनके लिए एक खिलौना हो। इस पर शरथ का कहना है कि “समय के साथ, मुझे पानी से प्यार होने लगा था। मुझे अब इसमें मजा आने लगा था।”

हालाँकि उनके लिए तैराकी एक फिटनेस गतिविधि के रूप में शुरू हुई थी। प्रशिक्षकों और शिक्षकों के प्रोत्साहन के बाद शरथ ने मानो स्विमिंग पूल को ही अपनी दुनिया बना ली थी। शुरू में उन्होंने इंटर-क्लास, स्कूल और क्लब प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू कर दिया था। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए वो कहते हैं कि “जन्म से बाएं हाथ के पूर्णरूप से विकसित न होने के चलते कई समस्याओं का सामना करना पड़ा।” पानी देखकर डरने वाले शरथ को इस बात का कत्तई अंदाज़ा था ही नहीं कि उनका यही डर उन्हें बुलदियों की ऊँचाई पर ले जाएगा।

शरथ आगे बताते हैं कि “साल 2002 में मुझे तैराकी प्रतियोगिताओं के बारे में बताया गया। इसके बारे में पता चलते ही मैं इन प्रतियोगिताओं के लिए खुद को तैयार करने लगा। साल 2003 में हुई एक प्रतियोगिता में मैंने चार स्वर्ण पदक जीते।” चार स्वर्ण पदक जीतने के बाद मानो शरथ को सोने के पदकों से लगाव हो गया। उनकी इस जीत ने उन्हें कड़ी ट्रेनिंग करने के लिए प्रेरित किया। अपनी इस उपलब्धि पर शरथ कहते हैं कि “15-16 साल की उम्र में चार पदक जीतने के बाद मैंने इस खेल में अपना करियर बनाने की ठानी। अब मुझे खुशी है कि मैं अब भी इस पेशे में हूँ।”

एक पैरा-तैराक चैंपियन और कोच, शरथ की यात्रा पूरी तरह से शुरू हो गई। इस दौरान उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। उनके साहस और धैर्य ने उन्हें साल 2012 में लंदन में पैरालंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने का सुनहरा मौक़ा दिया। 5 बार के ओलिंपिक चैंपियन, ऑस्ट्रेलियाई तैराक इयान थोर्पे को अपनी प्रेरणा मानने वाले शरथ कहते हैं कि “वर्तमान में, मैं लगभग 60 बच्चों को कोचिंग दे रहा हूं, जिसमें 14 पैरा तैराक शामिल हैं।  हम साल 2020 में  टोक्यो में होने वाले पैरा-ओलिंपिक की तैयारी कर रहे हैं। शरथ के संघर्ष को देखकर यही कहा जा सकता है कि शारीरिक दुर्बलता आपको सफलता से दूर नहीं रख सकती।

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