मेरी कहानी

मेरी कहानी : कौन कमा रहा है और कौन घर पर रहता है ये मायने क्यों रखता है?

तर्कसंगत

Image Credits: Humans Of Bombay

January 27, 2020

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2015 में मैं और मेरी पत्नी ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए बचत कर रहे थे… हमें नहीं पता था कि हमारी सेविंग्स जल्द ही निगल ली जायेगी और मेरे अनुभव के हिसाब से तो अचानक हुए आगमन ने लगभग सच में निगल लीं! हमें प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में पता चला कि हम दोनों माता-पिता बनने वाले हैं. पहली सोनोग्राफ़ी में ये पता चला कि हम एक नहीं दो बच्चों के माता-पिता बनने वाले हैं.

इसके बाद मैंने घर पर रहने का निर्णय लिया और मेरी पत्नी काम पर जाती रही क्योंकि वो ज़्यादा कमाती थी और अब हमारे यहां खाने वालों की तादाद बढ़ने वाली थी. जब मैं पहली बार अपने पापा को मेरे घर पर रहने के निर्णय के बारे में बताया उन्होंने सिर्फ़ मुझ से एक बार पूछा कि क्या मुझे पूरा यक़ीन है- जब मैंने हां कहा उसके बाद उन्होंने कभी दूसरा सवाल नहीं किया. बाहर के लोग अक्सर मेरे दफ़्तर ना जाने से परेशां दीखते थे जैसे कोई बहुत बड़ी बात हो गई हो. वो मुझसे कुछ इस तरह के सवाल पूछते, ‘लहर, क्या तुम अपनी पत्नी से पैसे मांगने को लेकर सहज हो?’ या ‘क्या तुम सच में घर का काम करोगे?’ और न जाने किस किस तरह के सवाल जिस पर माने कभी ध्यान ही नहीं दिया। उन सवालों का मेरे पास एक ही जवाब हुआ करता था “और नहीं तो क्या… मैं काम नहीं कर रहा था, और किससे मांगूंगा? मैं ऐसे सवालों का सही, सटीक और सच्चे जवाब देने में हमेशा माहिर था.

मेरा ये सोचना है कि मेरी पत्नी ने उन्हें 9 महीने गर्भ में रखा, उसका बच्चों के साथ एक ऐसा अनोखा रिश्ता है जो किसी और के साथ कभी नहीं होगा. तो सही तो यही होगा न कि मुझे भी उनसे बॉन्डिंग का वक़्त मिले. पर ये बच्चे आपको हमेशा नचाते हैं और ये तो दो थे… मैं बस भागता था… खाना, पॉटी कराना, सुलाना लाइफ़ का मंत्र बन गया था.

दूसरे बच्चों की तरह मेरे बच्चे भी 18 घंटे सोते थे लेकिन दोनों बच्चों के सोने के अलग शिड्यूल थे. मेरी नींद पूरी नहीं होती थी. मैं और मेरी पत्नी ने फ़ीडिंग शिड्यूल बनाकर रखा था और वो दिवार पर टंगा रहता था. इससे किसने किस बच्चे को खिला दिया है ये पता रहता था.

कई बार ऐसा होता भी था कि कोई शिड्यूल अपडेट करना भूल जाता था और दूसरा उसी बच्चे को खिला देता था जिसे पहले ही खिलाया जा चुका है, दूसरा भूखा ही रह जाता था…ये मेरे और मेरी पत्नी के बीच में जोक की तरह हो गया है और में मार्च और अप्रैल 2016 के महीने ढंग से याद भी नहीं है. इन दोनों की वजह से वो 2 महीने की यादें कतई धुंधली हैं.

जब मैंने काम पर वापस लौटने का निर्णय लिया तो ये बदलाव भी काफ़ी सहज था. मैं और मेरी पत्नी दोनों ही नौकरी करते हैं और अपने बच्चों का पालन करते हैं, हम दोनों के लिए फ़ैमिली पहले आती है. कौन कमा रहा है और कौन घर पर रहता है ये मायने क्यों रखता है? पत्नी ख़ुश है, मैं ख़ुश हूं और दोनों रास्कल (बच्चे) निश्चित तौर पर ख़ुश हैं… मुझे नहीं लगता कुछ और मायने रखता है.

“In 2015, my wife and I were saving up to go on a peaceful and ‘just us’ holiday to Australia … little did we know…

Posted by Humans of Bombay on Wednesday, 1 January 2020

सोर्स : Humans Of Bombay

 

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