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बजट समीक्षा : टैक्स बचाने के लिए कौन सी सिस्टम है फायदेमंद? नई टैक्स सिस्टम या पुरानी वाली सिस्टम?

तर्कसंगत

Image Credits: Himachal Abhi Abhi

February 3, 2020

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केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को अपना दूसरा आम बजट पेश करते हुए एक नई आयकर प्रणाली की घोषणा की. उन्होंने कहा कि वो आयकर दाता जो इस नई प्रणाली का लाभ लेना चाहते हैं, उन्हें 100 छूटों में से 70 को छोड़ना होगा.

 

-सेक्शन 80सी (पीएफ़, नेशनल पेंशन सिस्टम, जीवन बीमा प्रीमियम में निवेश पर छूट है)

-सेक्शन 80डी (मेडिकल इंश्योरेंस प्रीमियम, हाउसिंग रेंट अलाउंस पर टैक्स की दरों में बदलाव और हाउसिंग लोन पर इंटरेस्ट देना)

-सेक्शन 80ई के तहत एजुकेशन लोन में दिए जाने वाले इंटरेस्ट पर टैक्स में छूट नहीं ली जा सकती.

-चार सालों में दो बार कर्मचारी को मिलने वाला लीव ट्रेवल अलाउंस.

-चैरिटेबस संस्थानों को सेक्शन 80जी के तहत दिए जाने वाले दान पर मिलने वाली टैक्स छूट.

-विकलांग और धर्मार्थ दान पर मिलने वाली टैक्स छूट.

-वेतनभोगी करदाताओं को वर्तमान में मिलने वाली 50000 रुपये की मानक छूट.

-सेक्शन 16 के तहत मनोरंजन भत्ते और रोज़गार/पेशेवर कर में छूट.

-पारिवारिक पेंशन के लिए 15000 रुपये तक मिलने वाली छूट.

 

 

नई आयकर प्रणाली में कोई अगर 5-7.5 लाख रुपये सालाना कमाता है तो उसे 20 फ़ीसदी की जगह केवल 10 फ़ीसदी टैक्स देना होगा. 7.5-10 लाख रुपये सालाना कमाने वाले शख़्स को 20 फ़ीसदी की जगह सिर्फ़ 15 फ़ीसदी टैक्स देना होगा. जिनकी सालाना आय 10-12.5 लाख रुपये है, वो 30 की जगह 20 फ़ीसदी टैक्स देंगे और जो 15 लाख से अधिक कमा रहे हैं उन्हें वर्तमान दर से 30 फ़ीसदी टैक्स देना होगा.

नई टैक्स प्रणाली में पांच लाख रुपये सालाना कमाने वालों के लिए कोई बदलाव नहीं है. उनकी आय टैक्स फ़्री रहेगी.

इस पूरे बदलाव के पीछे वित्त मंत्री का तर्क ये है कि उनके लिए है जो ज़्यादा लिखत-पढ़त नहीं करना चाहते हैं, चार्टर्ड एकाउंटेंट के पास नहीं जाना चाहते हैं. वैसे इस बात से सहमत होना मुश्किल है. सवाल ये है कि करदाताओं को टैक्स का लाभ मिलना चाहिए चाहिए वो किसी के पास जाकर मिले या बगैर जाए मिले.

एक उदाहरण के रूप में इसे हम समझते हैं कि अगर आपकी सालाना आय आठ लाख रुपये है तो आपका पुरानी टैक्स प्रणाली के तहत 39000 रुपये टैक्स बनता है और अगर आप नई टैक्स प्रणाली के साथ जाते हैं तो आपको 46000 रुपये टैक्स देना होगा. यानी नई प्रणाली में 7000 रुपये अधिक टैक्स देना होगा.

नए प्रणाली को लेकर एक सवाल ये भी उठाया जा रहा है कि यह वित्तीय बचत और भविष्य की सुरक्षा के लिए किस तरह से प्रेरित करता है. जैसा की पुरानी प्रणाली में पीएफ़, मेडिकल इंश्योरेंस और पेंशन स्कीम में निवेश करने से छूट मिलती थी. इसके साथ ही सेक्शन 80सीसीडी (पेंशन स्कीम में नियोक्ता की ओर से कर्मचारी के खाते में दिए जाने वाली राशि) के सब-सेक्शन (2) और सेक्शन 80जेजेएए (नए रोज़गार के लिए) में छूट के लिए अभी भी दावा किया जा सकता है. 80सी के वैकल्पिक होने से लोग पीपीएफ़/ईपीएफ़ में निवेश करना छोड़ सकते हैं और लंबे समय तक अर्थव्यवस्था के लिए यह अच्छा नहीं है.

सरकार का यह भी साफ़ संकेत है कि वो पीपीएफ़ पर टैक्स फ़्री इंटरेस्ट देने के पक्ष में नहीं है और सभी करदाताओं को नेशनल पेंशन स्कीम (एनपीएस) की ओर ले जाना चाहती है.

 

अगर छूट चाहिए तो पुरानी व्यवस्था ही अच्छी

अगर किसी को थोड़ी सी फीस देकर कर का लाभ मिल सकता है और ये छूट कोई ऐसी छूट नहीं है जिसमें बहुत ज़्यादा जटिलताएं हों. आप ट्यूशन फीस देते हैं, आप वेतनभोगी कर्मचारी हैं तो आपका प्रोविडेंड फंड कटता है.आपने घर बनाने के लिए लोन लिया हुआ है तो आप उसकी हर महीने किस्त भरते ही हैं, इसका कोई कैलकुलेशन नहीं है, आपको बैंक से एक इंटरेस्ट सर्टिफिकेट मिल जाता है. इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80(सी) में ये सारी छूट करदाताओं को पहले से ही मिलती रही थी. अब आपको ये छूट छोड़नी होगी.

इसी तरह से पहले बैंक से मिलने वाले 10 हज़ार रुपये तक के ब्याज पर छूट मिलती थी, वरिष्ठ नागरिकों को और ज़्यादा छूट मिलती है. नई व्यवस्था अपनाने के लिए अब ये छूट छोड़नी होंगी. इसमें व्यक्तिगत टैक्स की जिम्मेदारी तय करने के लिए कोई बहुत ज्यादा हिसाब किताब नहीं करना पड़ता था.

नई व्यवस्था में कर दाताओं को टैक्स बचाने के विकल्प छोड़ने होंगे. जो लोग निवेश करते थे, या जिनका निवेश पहले से चला आ रहा है, वो चाहेंगे कि उनका निवेश चलता रहे और उन्हें इस नई व्यवस्था में कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है.

अभी जो अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि शायद नई कर व्यवस्था अपनाने से कुछ लोगों को नुक़सान ही हो जाए.

 

कोई बचत नहीं करते तो नयी प्रणाली सही है

अगर किसी की साढ़े सात लाख रुपये की आमदनी है तो पुरानी स्कीम और नई स्कीम के तहत उसकी बचत पर क्या असर पड़ेगा?

अगर ये मान लें कि पुरानी व्यवस्था में व्यक्ति कोई बचत नहीं करता था, तो उसे ढ़ाई लाख की आमदनी पर 20 प्रतिशत की दर से तकरीबन 50 हज़ार रुपये टैक्स भरता था. अब क्योंकि वो टैक्स दस प्रतिशत कर दिया गया है तो उस ढ़ाई लाख की आमदनी पर उसे 25 हज़ार रुपये कर देने होंगे. इस मतलब ये हुआ कि उस कर दाता की अब 25 हज़ार रुपये की बचत होगी.

शर्त ये है कि वो कोई निवेश नहीं करता हो.

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