ख़बरें

महिला अधिकारियों से कमांड लेने में पूरी तरह सहज नहीं पुरुष जवान

तर्कसंगत

Image Credits: Wikipedia

February 5, 2020

SHARES

देश जहां महिलाओं को कमांड पोस्ट पर बैठा देखना चाहता है, वहीं सेना के पुरुष जवानों को ये बात नागवार गुजर रही है. केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि पुरुष सैनिक महिला अधिकारियों को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. केंद्र ने कहा, पुरुष सैनिकों की बात पर गौर करें तो महिलाएं सेना में कमांड पोस्ट के लिए उपयुक्त नहीं हो सकती हैं.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि सेना में महिलाओं को अभी कमांडर जैसे पद देना अभी ठीक नहीं होगा. उसके मुताबिक सेना में ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले पुरुषों की एक बड़ी संख्या है जो अभी किसी महिला की अगुवाई में चलने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होंगे. केंद्र ने परिवार के मोर्चे पर महिलाओं की ज्यादा जरूरत और युद्ध की स्थिति में उन्हें बंदी बनाए जाने के जोखिम का भी हवाला दिया.

 

महिलाएं अभी केवल सहायक पदों पर काम करती हैं

आर्मी में महिलाओं को कमांड पोस्ट नहीं दी जाती है. कॉम्बैट रोल में अभी भी महिलाएं नियुक्त नहीं की जातीं. फीमेल ऑफिसरों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया कि उन्हें भी कमांड पोस्ट दी जाए. परमानेंट कमीशन में उन्हें भी ऊंची पोस्ट पर नियुक्ति का मौका मिले. अभी उन्हें शॉर्ट सर्विस कमीशन में सपोर्ट रोल/स्टाफ रोल मिलते हैं. 14 साल बाद ही उन्हें रिटायर होना पड़ता है.

 

सरकार ने क्या दी दलील ?

सरकार की तरफ से वकील आर बालासुब्रह्मण्यम और नीला गोखले ने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डी वाई चंद्रचूड और अजय रस्तोगी की बेंच के सामने दलील पेश की. उन्होनें कहा कि महिला ऑफिसर्स के लिए कमांड पोस्ट में होना इसलिए भी मुश्किल है, क्योंकि उन्हें प्रेग्नेंसी के लिए लम्बी छुट्टी लेनी पड़ती है. परिवार की जिम्मेदारियां होती हैं उन पर, रैंक और फ़ाइल में मौजूद ट्रूप्स में पुरुष अधिक हैं. उनमें से भी अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं. समाज के जिन तौर-तरीकों के बीच वो बड़े हुए हैं, उनमें वो किसी महिला से कमांड लेने के आदी नहीं हैं. लड़ाई के दौरान अगर कोई महिला ऑफिसर युद्धबंदी बना ली जाती है, तो ये आर्मी और सरकार के लिए बेहद मुश्किल स्थिति होगी. सीधे-सीधे कॉम्बैट से उन्हें दूर रखना ही बेहतर होगा.

 

महिला ऑफिसर्स की तरफ़ से क्या थी दलील ?

महिला अधिकारियों की ओर से वकील मीनाक्षी लेखी और ऐश्वर्या भाटी ने अदालत में केंद्र की दलील का विरोध करते हुए कहा कि सेना में भर्ती कई महिलाओं ने विपरीत परिस्थितियों में असाधारण बहादुरी दिखाई. उन्होंने अदालत को मिंटी अग्रवाल का भी उदाहरण दिया. जिन्हें बालाकोट में एयरस्ट्राइक के बाद कश्मीर में पाक विमानों की घुसपैठ के दौरान फाइटर कंट्रोलर की जिम्मेदारी संभालने के लिए युद्ध सेवा मेडल दिया गया है. इससे पहले मिताली मधुमिता को काबुल में भारतीय दूतावास पर आतंकी हमले का बहादुरी से सामना करने के लिए सेना मेडल दिया गया है.

सरकार के वकील बालासुब्रह्मण्यम ने कहा कि सरकार उन महिला ऑफिसर्स को परमानेंट कमीशन देने को तैयार है, जिन्होंने आर्मी में 14 साल से ज्यादा अपनी सेवाएं दी हैं. जो महिलाएं 14 साल से ज्यादा सर्विस देती हैं, उन्हें परमानेंट कमीशन के बिना 20 साल तक सर्विस करने की अनुमति होगी. 20 साल से ज्यादा सर्विस देने वाली जो महिला ऑफिसर हैं, उन्हें पेंशन बेनिफिट देकर रिलीज किया जाएगा.

 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?

‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार, जजों की बेंच ने इस तरफ इशारा किया कि कमांड पोस्ट पर महिला ऑफिसर्स को न रखना गलत है. आर्मी को उन्हें इजाज़त देनी चाहिए सर्व करने की. उनकी कुव्वत और सेना की ज़रूरत के अनुसार. बेंच ने कहा कि जब पुलिस फ़ोर्स में महिलाओं की तैनाती हो रही थी, तब भी बहुत विरोध हुआ था. लेकिन अब वे फील्ड में बहुत अच्छा कर रही हैं.

सरकारी पक्ष के जवाब की ही तरह बिपिन रावत ने भी कहा था कि कॉम्बैट में महिलाएं मरेंगी, तो उनके घरवाले उनके शव देखना बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे. आर्मी महिलाओं को छः महीने की मैटरनिटी लीव नहीं दे पाएगी. और अगर नहीं दी, तो उस पर भी बवाल होगा. यही नहीं, बिपिन रावत ने ये भी कहा था कि अगर 100 जवानों के बीच कोई महिला ऑफिसर होगी, तो शिकायत करेंगी कि कोई उनके टेंट में झांक रहा है. फिर उनके लिए चारों तरफ चादर लगानी पड़ेगी. बिपिन रावत ने एक इंटरव्यू में ये भी कहा था कि पुरुष सैनिक या ऑफिसर महिला ऑफिसर से कमांड लेने के आदी नहीं हैं.

 

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...