ख़बरें

झारखण्ड में आदिवासियों को फारेस्ट राइट एक्ट के तहत नहीं मिल रही ज़मीन

तर्कसंगत

Image Credits: Facebook/Gladson Dungdung

February 5, 2020

SHARES

आदिवासी और उनके अधिकारों लेकर कई किताब लिख चुके एक्टिविस्ट ग्लैडसन डुंगडुंग ने अपनी नयी किताब में  वनाधिकार के मुद्दे पर झारखंड की पिछली सरकार पर कई सवाल खड़े किए हैं.

‘आदिवासिस एंड देयर फॉरेस्ट’ नामक इस किताब में झारखंड समेत अन्य आदिवासी राज्यों में वनाधिकार से जुड़े पूर्व और वर्तमान के आंकड़ों को बताया गया है. साथ ही साथ पूर्व की सरकार और वन अधिकार से संबंधित अधिकारियों व पदाधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए गए हैं. किताब में दावा किया गया है कि वन पट्टा के वितरण को लेकर गड़बड़ियां की गई. किताब के मुताबिक फॉरेस्ट राइट एक्ट के तहत मिलने वाले पट्टे के दावों के साथ छेड़छाड़ की भी बात कही गई है.

ऐसे तो किताब में भारत भर में रहने वाले आदिवासी और उनके वनाधिकार की बात लिखी गई है, लेकिन झारखंड के संदर्भ में जमीन के पट्टे के दावों के साथ छेड़छाड़ करने वाली बात लोगों का ध्यान ज्यादा खींचती है.


Image may contain: 2 people


आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ के उदाहरण

किताब के चैप्टर नंबर 13 व पेज नंबर 150 के मुताबिक, सिमडेगा जिला के बानो प्रखंड का इला गांव, साल 2015: यह मुंडा आदिवासी गांव हैं. यहां 227 परिवार और 1000 लोगों की संख्या है. ग्राम सभा ने यहां वेरीफिकेशन के बाद जमीन के पट्टे के लिए 32 परिवारों के दावों की सूची सर्किल ऑफिसर (सीओ) को भेजी. इसी में से एक परिवार उदय जोजो का है. जिनका 77 डिसमिल जमीन पर पट्टे का दावा शामिल था. रेवन्यू एंड लैंड रिफॉर्म्स डिपार्टमेंट के अधिकारी ने फिजिकल वेरिफिकेशन कर इनके कागजात को पर्याप्त नहीं माना. उदय जोजो के परिवार में उनकी पत्नी, दो बेटा और एक बहु हैं. अधिकारियों ने इनकी 77 डिसमिल जमीन को तीन जगह बांट दिया. उदय जोजो 30 डिसमिल, बेटा बिशराम जोजो को 27 डिसमिल और बहु खटरीना जोजो को 20 डिसमिल.

चैप्टर नंबर 16 व पेज नंबर 165-66 के मुताबिक, पश्चिमि सिंहभूम का मनोहरपुर प्रखंड, साल 2012:  यहां व्यक्कित पट्टे के लिए मनोहरपुर ब्लॉक के सर्किल ऑफिसर के समक्ष करीबन 17000 आवेदन किए गएं. आवेदन की फाइल अंचल कार्यलय से गायब कर दी गई. 2016 में मनोहपुर ब्लॉक के लोगों ने अपने वनधिकार के मुद्दों को लेकर रांची राजभवन के समीप विरोध प्रदर्शन किया. तब राज्यपाल ने संज्ञान लेते हुए सरकार को मामले को देखने का आदेश दिया. नतीजा मनोहरपुर के लोगों को फिर से पट्टा का दावा करने को कहा गया. 2017 में इनलोगों ने फिर से अंचल कार्यलय में दावा किया, लेकिन अबतक इन्हें पट्टा नहीं मिल पाया है.

चैप्टर नंबर 14 व पेज नंबर 154 के मुताबिक, रांची के नामकुम प्रखंड का कुदागड़ा गांव, साल 2012-13:  यह मुंडा आदिवासी बहुल्य गांव और 347 घरों की आबादी. यहां 700 एकड़ पर सामुदायिक दावा किया गया. सर्किल ऑफिसर ने इसे घटाकर 100 एकड़ करने को कहा. गांव वालों ने ऐसा करने से इंकार किया तो दावे की फाइल नामकुम अंचल कार्यलय से गायब कर दी गई. जबकि इसी गांव से ग्राम सभा की स्वीकृति मिलने के बाद 36 लोगों ने व्यक्तिगत पट्टे के दावे के लिए अंचल कार्यलय भेजा गया. जहां सिर्फ छह लोगों को छोड़कर सभी का दावा खारिज कर दिया गया. इसमें बांदो मुंडा के 8 एकड़ जमीन के दावे को घटाकर 7 डिसमिल कर दिया गया. इसी तरह सोमरा मुंडा और बुधराम मुंडा के दो-दो एकड़ के दावे को दो डिसमिल कर दिया गया.

छेड़-छाड़ पर तर्क और पक्ष

जिस केस स्टडी का ग्लैडसन डुंगडुंग ने अपनी किताब में उदाहरण दिया है, उसपर संबंधित अधिकारियों के अलग अलग पक्ष हैं.

कुदागाड़ा गांव के मामले पर नामकुम अंचल ऑफिसर शुभ्रा रानी तर्कसंगत से बात करते हुए कहती हैं, “इस पूरे मामले को देखना होगा. जैसा कि आप बता रहे हैं, यह बहुत पहले का मामला है. जो दावे खारिज हुए हैं, वो क्यों हुए हैं, किस प्रक्रिया के तहत हुए. एक एक क्लेम को देखकर ही कुछ कहा जा सकता है.”

लेकिन फाइल गायब वाली बात पर शुभ्रा रानी ने कहा, “दावे की फाइल तीन सेट में तैयार होती है. एक अगर अंचल के पास होती है तो दूसरा अनुमंडल और तीसरा ग्राम सभा के अधीन संचालित होने वाली फॉरेस्ट राइट कमेटी के पास. किसी ना किसी के पास होनी चाहिए. इसे भी देखना होगा.”

इधर सिमडेगा जिला के बानो अंचल ऑफिसर का नंबर नॉट अवेलेबल बताता है. इसी तरह काफी कोशिशों के बाद भी पश्चिमि सिंहभूम के मनोहरपुर के अंचल अधिकारी से संपर्क नहीं हो पाया. इसीलिए इस पूरे मामले पर हमने किताब में किए दावों पर, अनुसूचित जनजाती, अनुसूचित जाती, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग समाज कल्याण विभाग का कहना है कि कई विवादित मामले उसके संज्ञान में आए हैं.  लेकिन विभाग पट्टा देने वाली प्रक्रिया या आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ वाली बात को सही नहीं मानता है.



ग्लैडसन डुंगडुंग ने तर्कसंगत के सहयोगी रिपोर्टर से बात करते हुए कहा कि अनुमंडल और जिला लेवल कमेटी का काम वन अधिकार कानून 2006  के तहत  दावेदारी सही है या नहीं, इस बात को सत्यापन करना होता है न कि वो तय करें कि किसकी कितनी जमीन पर दावा होगा. उनके मुताबिक जमीन पर दावा संबंधित की प्रक्रिया ग्राम सभा और इसके अधीन फॉरेस्ट राइट कमेटी तय करती है.

यही मानना झारखंड वन-अधिकार मंच के संयोजक सुधीर पाल का भी है. वो कहते हैं, “यह आम तौर पर देखा गया. ऐसी शिकायतें काफी मिली हैं जहां जायज दावों में अधिकारियों के द्वारा कांट-छांट किया गया है. कानूनन ग्रामसभा तय करता है, किसका कितनी जमीन पर और किस नेचर की जमीन पर दावा बनता. यह ग्रामसभा की प्रक्रिया है. अगर ग्रामसभा किसी को पांच एकड़ जमीन पर दावे की सिफारिश करता और उसे दो एकड़ दिया जा रहा है, तो यह यह गलत है.

सुधीर पाल को उम्मीद है कि जो त्रुटियां, या गड़बड़ियां पिछली सरकार में हुई हैं उसे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की नेतृत्व वाली सरकार ठीक कर लेगी.

गौरतलब है कि गड़बड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी ने भी कहा है कि कई राज्य ने पट्टे के दावों को खारिज करते समय तय प्रक्रिया ने पालन नहीं किया है.

इधर ग्लैडसन डुंगडुंग का दावा है कि उन्होंने जो बातें किताब में लिखी है उसका उनके पास पुख्ता प्रमाण है. उनका कहना है कि राज्य में कहीं आंकड़ों को बढ़ाने के लिए अधिकारियों ने फॉरेस्ट राइट एक्ट (एफआरए) के डाटा से छेड़छाड़ किया है, तो कहीं बड़ी संख्या में कार्यलय से दावा पत्रों की फाइल गायब कर दी गई.

(यह स्टोरी एनएफआई मीडिया फेलोशिप प्रोग्राम 2019-20 के तहत प्रकाशित की गई है)

लेखक: मो. असग़र खान

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...