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‘बिची भाई’ दसवीं पास व्यक्ति जिसने अब तक लाखों लुप्तप्राय कछुओं की ज़िंदगी बचाई है

तर्कसंगत

February 13, 2020

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शांत समुद्र तटों पर घूमने का सपना हम सभी का होता है, ओडिशा के बिचित्रानंद बिस्वाल मगर ये सपना अपने बचपन से हर दिन जीते आ रहे थे समुद्र के साथ मानो उनका एक नियमित संबंध रहा है। ओडिशा के एक सुदूर गाँव से गुंडाबला के रहने वाले बिस्वाल का घर समुद्र के किनारे से मुश्किल से 100 मीटर की दूरी पर स्थित था, इसलिए समुद्र और उसके अंदर के समुद्री प्राणियों से बिस्वाल का केक तरह से नाता जुड़ चूका था, वो भी कुछ इस हद तक कि जब एक बार उन्होनें उसी समुद्री किनारे पर लगभग 2000 की संख्या में मृत कछुओं को देखा तो वो उस भयावह मंज़र ने उन्हें अंदर से झकझोर दिया और उस दिन के बाद से उन्होनें कछुओं की जान बचाने की ठान ली। 1996 से, बिचित्रानंद बिस्वाल, जिन्हें बिची भाई के नाम से जाना जाता है, ने लगभग लाखों कछुए बचाए हैं और अपना संपूर्ण जीवन उन्हें संरक्षित करने के लिए समर्पित करना चाहते हैं। वह इस महत्वपूर्ण कारण के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए स्थानीय ग्रामीणों के साथ सक्रिय रूप से संलग्न है। पिछले साल अक्टूबर में, उन्हें वन्यजीव संरक्षण के लिए प्रतिष्ठित बीजू पटनायक पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

 



 

लुप्तप्राय ओलिव कछुए के लिए हिन्द और प्रशांत महासागर का गर्म पानी काफी सही है। उन्हीं स्थानों में गुंडाबाला भी उनमें से एक है और इस वजह से यह जगह शिकारियों को भी आकर्षित करता है जो इन कछुओं को मारकर तस्क्टरी करते हैं। उनकी स्थिति का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि  इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) द्वारा तैयार सूचि में इन कछुओं को एक लाल सूची में डाल दिया है, जिससे वे इस कछुओं को कमजोर प्रजाति घोषित कर रहे हैं। बिची भाई मानते हैं कि तट रक्षकों द्वारा किए गए समुद्र तट पर गश्त करना, एक प्रभावी तरीका हो सकता है जिससे इन काचों की स्नाख्या को बढ़ाया जा सकता है। सरकारी अधिकारियों का हस्तक्षेप, स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग के साथ-साथ, उनके अनुसार अपने पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए बहुत आवश्यक है।

 



 

तर्कसंगत के साथ बातचीत में बिचित्रानंद बिस्वाल कहते हैं, “जब मैंने इतनी बड़ी तादाद में मर रहे कछुओं पर ध्यान दिया, तो मुझे यह सोचकर गहरा दुख हुआ कि हम इंसान इन जीवों को किस हद तक नुकसान पहुंचा रहे हैं, उसके लिए समुद्री प्रदूषण भी जिम्मेदार है। स्थिति बिगड़ती जा रही है। अपने शुरुआती दिनों के दौरान, मैंने अपने पड़ोसियों और दोस्तों को इस कारण के बारे में बताना शुरू किया और फिर बाद में ग्रामीणों के साथ बातचीत   कर उन्हें भी अपने साथ जोड़ लिया। युवाओं ने इसके बारे में जागरूकता फैलाने के लिए जबरदस्त समर्थन दिया। 1990 के दशक में तस्करी और समुद्री कछुओं से संबंधित कड़े कानून नहीं थे हालांकि अब कानूनों की स्थिति बेहतर है। ”

 



 

बिची भाई ने दूसरों को भी अपने काम में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया है। वन्यजीवों के बारे में अपनी स्फूर्तिदायक चर्चा के साथ, उन्होंने गाँव की महिलाओं को भी संरक्षण की दिशा में सक्रिय रूप से काम करने के लिए जोड़ लिया है। उनके काम से प्रेरित होकर, दो युवा – सौम्य रंजन बिस्वाल और दिलीप कुमार बिस्वाल ने ओडिशा में 800 किमी तक साइकिल चलाई और दूसरों को इस इन कछुओं के संरक्षण के महत्व के बारे में बताया। इस दौरान उनका नाम प्रसिद्ध लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया। दोनों बिची भाई को अपने रोल मॉडल के रूप में देखते हैं और वे चाहते हैं कि उन्हें अपने निस्वार्थ काम के लिए एक संरक्षणवादी का कद भी दिया जाए। लकवा का दौरा पड़ने के बाद भी बिची भाई ने अपने मिशन पर काम करना बंद नहीं किया है। यद्यपि नियमित फिजियोथेरेपी सेशन के बाद वह पहले से बेहतर हो गए हैं और प्रकृति के संरक्षण के लिए काम करने में सुकून पाते हैं।

 



 

तर्कसंगत से बात करते हुए बिस्वाल कहते हैं  “जैसे एक माँ अपने नवजात शिशु को उसके शुरूआती दिनों में खतरों से बचाती है, वैसे ही इन कछुओं के बच्चों की भी देखभाल करना महत्वपूर्ण है। हैचिंग प्रक्रिया जुलाई से दिसंबर के बीच होती है, उस समय मैं इन छोटे बच्चे पर करीब से निगरानी रखता हूँ जब तक वो समुद्र में तैरने लायक न हो जाएं। इन शिशु कछुओं की देखभाल करना बहुत अच्छा लगता है। हमने इनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय समूहों की मदद से समुद्र तट की सफाई भी की है। हमारे लिए यह महसूस करना महत्वपूर्ण है कि हम हमें अपने आराम या लालच के लिए जानवरों के प्राकृतिक आवास को गंदा नहीं करना चाहिए। यदि हम समुद्र तटों पर गंदगी फैलाते हैं तो एक तरह से पूरा वातावरण दूषित हो जाता है। आप खुद सोचिये अगर कोई हमारे घर के साथ ऐसा करेगा तो हमें कैसा महसूस होगा ?”

 



 

रिडले कछुओं के संरक्षण के अलावा, उन्होंने पर्यावरण पर और भी काम किया है। ओडिशा में चक्रवात के बर्बादी के बाद, उन्होंने कैसुरिना जंगलों के संरक्षण के लिए काम करना शुरू कर दिया था।  इतना ही नहीं उन्होनें कई सांपों को बचाया है और जब भी उनके आस-पास के इलाकों में सांप पाए जाते हैं तो वो उन्हें सुरक्षित जगह पर पहुँचाने में मदद करते हैं। अब तक, उन्होंने लगभग 2000 साँपों को बचाने में मदद की है। उन्होंने तटीय क्षेत्रों में गौरैया के लिए कृत्रिम घर भी बनाए हैं और उन्हें देखकर उन्हें अपने बचपन के दिनों की यादों से भर देता है।

 



 

भले ही उन्होंने 10 वीं कक्षा तक स्कूल में पढ़ाई की हो, लेकिन उन्हें लगता है कि वे प्रकृति और वन्य जीवन को देखकर बहुत कुछ सीखते हैं। वह कई समुदाय-आधारित समूहों जैसे सी टर्टल एक्शन प्रोग्राम, अस्तारंगा, ओडिशा समुद्री संरक्षण कंसोर्टियम और अन्य समुदायों के सदस्य है जो वन्यजीवों विशेषकर समुद्री कछुओं के संरक्षण के लिए काम करता है। वह अपने संचित ज्ञान का उपयोग उस सर्वोत्तम तरीके से करना चाहते है जिससे दूसरों को इसके बारे में शिक्षित करने के लिए कर सकता है। वह नहीं चाहते कि अगली पीढ़ी उन्हें केवल तस्वीरों में याद रखे या केवल किताबों में उनके बारे में पढ़े। वह समुदाय के अन्य लोगों से संरक्षण के लिए सक्रिय रूप से काम करने की अपील करते है।

 

तर्कसंगत कछुओं के संरक्षण की दिशा में सक्रिय रूप से काम करने और उसी के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए तार्किक भारतीय बिची भाई के प्रयासों को सलाम करता है।

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