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कफील खान की ज़मानत के आदेश के तुरंत बाद रिहाई के बदले लगा दी गयी NSA

तर्कसंगत

Image Credits: Facebook/Drafeelkhanofficial/Png

February 14, 2020

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गोरखपुर के डॉ. कफील खान के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धाराएं लगाई गईं हैं। 12 दिसंबर, 2019 को नागरिकता संशोधन संशोधन (CAA) के विरोध प्रदर्शन के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में उनके कथित भड़काऊ भाषण को लेकर ये कार्रवाई की गई है। उन्हें FIR दर्ज होने के बाद 29 जनवरी को मुंबई से गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सोमवार को उन्हें जमानत दे दी गई। जमानत के आदेश देर से पहुंचने के कारण गुरुवार को मथुरा जिला कारागार से रिहाई नहीं हो पाई थी। अब जमानत मिलने के कुछ दिन बाद उन पर NSA लगाया गया है। इसका मतलब उनका मथुरा जेल से बाहर आना मुश्किल है।

कफील खान के भाई आदिल खान ने आरोप लगाया, ‘हमें आज सुबह पता चला कि डॉ. कफील के खिलाफ एनएसए लगाया गया है और अब वो जल्द ही जेल से बाहर नहीं आ पाएंगे। यह अस्वीकार्य है। उन्हें राज्य सरकार के इशारे पर निशाना बनाया जा रहा है।’

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल से निलंबित बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. खान को 29 जनवरी को मुंबई से भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। दोबारा अपराध न करने की शर्त के साथ 60,000 रुपए के जमानती बांड को प्रस्तुत करने के बाद उन्हें सोमवार को जमानत दी गई।

मथुरा जिला कारागार के जेलर अरुण पाण्डेय ने बताया था, ‘चूंकि कफील खान की रिहाई का आदेश देर शाम मिला है इसलिए उनकी रिहाई गुरुवार न होकर शुक्रवार की सुबह हो पाएगी।’ लेकिन उनकी रिहाई से पहले ही यूपी पुलिस ने उन पर रासुका लगा दिया। जिससे उनकी मुश्किलें और ज्यादा बढ़ गई है।

उनके खिलाफ विभिन्न धर्मों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने का मामला दर्ज किया गया था। मुंबई में गिरफ्तारी के बाद खान को अलीगढ़ लाया गया, जहां से उन्हें मथुरा की जिला जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। पुलिस ने कहा कि अलीगढ़ जेल में डॉ. खान की मौजूदगी से शहर की कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है।

 

क्या है राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA )?

रासुका यानी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम-1980 देश की सुरक्षा के लिए सरकार को किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने की शक्ति देता है। यह अधिकार केंद्र और राज्य सरकार दोनों को समान रूप से मिले हैं। रासुका लगाकर किसी भी व्यक्ति को एक साल तक जेल में रखा जा सकता है। हालांकि तीन महीने से ज्यादा समय तक जेल में रखने के लिए एडवाइजरी बोर्ड की मंजूरी लेनी पड़ती है। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा होने और कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के आधार पर रासुका लगाया जा सकता है।

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