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छह महिलाओं से शुरू हुए अभियान का सफर छह हजार महिलाओं तक पहुंचा

Md. Asghar Khan

March 11, 2020

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“शादी के एक हफ्ते बाद ही गांव की महिलाओं के साथ जलावन के लिए लकड़ियां लाने जंगल जाने लगी थी. वहां ये महिलाएं झाड़, झाड़ियां कांटती, लेकिन बड़े बड़े पेड़ को कोई और काट कर ले जाया करता था. ये वही शहरी लोग थें, जिन्हें जंगल माफिया कहा जाता है. मैं तो उस घर आई थी जहां मेरे बाबा (पिता) ने पेड़ पौधा लगाना सिखाया था और यहां पेड़ को कटते देख रही थी.”

यह अनुभव 39 साल की एक आदिवासी महिला के हैं. बात दो दशक पहले की है, जब उसकी शादी को एक हफ्ते ही बीते थें. दूसरे हफ्ते में ही वो अपने गांव के जंगलों को कांटे जाने का विरोध करने लगती है. तीसरा से चौथा हफ्ता आते आते जंगल बचाने का अभियान चलाने लगती है. शुरूआत गांव की छह महिलाओं के साथ जंगलों की पहरेदारी से होती है. फिर ये पेड़-पौधे लगाने लगती हैं. धीरे धीरे लोगों का कारवां बनता गया. गांव दर गांव अभियान सघन होता गया. करीबन 20 साल के बाद इस महिला के साहसी कदम और उसके प्रयास को सफलता में बदलता देख भारत सरकार ने 2019 में देश के चौथे सबसे बड़े सम्मान पद्म श्री से नवाजा. फिर उस महिला के नाम के आगे पद्मश्री जुड़ गया. अब उस महिला का पूरा नाम पद्मश्री जमुना टुडू है.

लेडी टार्जन के नाम से मशहूर जमुना टुडू कहती हैं कि उपाधि और सम्मान तक का सफर काफी संघर्ष के साथ गुजरा है. ओडिशा मयुरभंज जिला के जामदा ब्लॉक के रोंगा मटिया गांव में बचपन बीतता है. 1998 में झारखंड के सुदूरवर्ती गांव में एक राजमिस्त्री का काम करने वाले मान सिंह टुडू से ब्याह होता है. जिला पूर्वी सिंहभूम, प्रखंड चाकुलिया और गांव मुटूरखंब. जंगलों से घिरे इसी गांव से जमुना टुडू के जंगल को बचाने का संघर्ष शुरु होता है.



पेड़-पौधे संतान और जंगल परिवार

अपने संघर्ष के दिन याद करते हुए जमुना टुडू बताती हैं, “जंगल की रक्षा के लिए पहले हम छह महिलाएं आगे आएं. तब विरोध घर और आस-पास के लोगों ने ही किया. उन्हें समझाया कि हमलोग को कोई पेड़ नहीं काटेंगे. यहां तक की झाड़-झाड़ियां भी नहीं काटेंगे. जलवान के लिए सूखे पत्ते, सूखकर झड़ गई झाड़ियों को जलाएंगे. इसके बाद गांव में ही 50 एकड़ के जंगलों पर सुबह, दोपहर, शाम कुल्हाड़, डंडे और साथ में पालतू कुत्तों को लेकर पारा पारी से तीन साल तक जंगलों की रखवाली की. पेड़ पौधे लगाएं. इसके बाद हमारी टीम में बीस लोग हो गएं.”

जमुना टुडू को कोई संतान नहीं है, लेकिन उनका कहना है कि जंगलों में उन्होंने जितने पेड़ लगाएं हैं वे सब उनके बच्चे और जंगल परिवार हैं.



तर्कसंगत से आगे वो कहती हैं, “2003 में जब हमलोगों ने ‘वन सुरक्षा समिति’बनाकर अपने गांव से बाहर अभियान तेज किया तो दुश्मन बढ़ते गएं. जिन्हें पेड़ काटने से रोकते वे लोग हमसे झगड़ा करते, गालियां देते हैं. यहां तक मेरे घर में एक बजे रात में घुसकर लोगों ने डकैती की. मेरे पति को बांधकर पीटा. मुझे जान से मारने की धमकी दी. लेकिन हम डटे रहे हैं. फिर जब मैंने (2011) पास के ही कोकपरा स्टेशन के पास लकड़ी की तस्करी रोकनी चाही तो मुझे पीट-पीटकर लहूलुहान कर दिया गया.”

जमुना टुडू के मुताबिक पूर्वी सिंहभूम के विभिन्न प्रखंडों के दौ से भी अधिक गांव में वो ‘वन सुरक्षा समिति’ के जरिए जंगलों को बचाने का अभियान चला रही हैं. हर गांव में 20-25 लोगों की टीम है, जो पारा पारी सुबह, दोपहर, शाम जंगलों की पहरेदारी करती है. यही टीम पेड़-पौधे भी लगाती है. जमुना टुडू कहती हैं उनका अभियान छह महिलाओं से शुरू हुआ और अब छह हजार महिलाएं उनकी टीम हैं.

जंगल का प्रतिशत बढ़ा

जमुना टुडू की मेहनत और मशक्कत को वन विभाग के पदाधिकारी भी मानते हैं. ज्योग्राफिकल सर्वे 2019 की रिपोर्ट में झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले को सर्वाधिक जंगलों वाला क्षेत्र बताया गया. रिपोर्ट के मुताबिक 2018 से 2019 में जिले में जंगल 29.5 प्रतिशत भू-भाग से बढ़कर 30.21 प्रतिशत हो गया. जिला के डीएफओ अभिषेक कुमार ने कहा, “जंगल का प्रतिशत बढ़ने का श्रेय पद्म श्री जमुना टुडू समेत उन सभी को जाता है जो जंगल और पर्यावरण के संरक्षण के लिए लगे हुए हैं.”

लेकिन जमुना टुडू सिस्टम और सरकार से नाराजगी भी जाहिर करती हैं. वो कहती हैं, “जंगल तभी सुरक्षित है जब वहां आदिवासी सुरक्षित हैं. जंगलों को शहरों में रहने वाला माफिया काट कर ले जाता है और जंगलों में रहने वाला बेचारा आदिवासी सजा पाता है. उन्हें अतिक्रमणकारी कहकर बेदखल किया जाता है. मैंने बीस जंगल को बचाने में लगाया. गाली, मार खायें. क्या मैं आपको अतिक्रमणकारी दिखती हूं?”



जमुना टुडू का कहना है कि जिन आदिवासियों के पास जमीन नहीं है उन्हें जंगलों का पट्टा दिया जाए, ताकि वे लोग जंगलों की रक्षा भी कर सके हैं और जीवन यापन भी.

सिंहभूम जिला आदिवासी आबादी के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. 2019 के फरवरी-मार्च में जारी झारखंड वन अधिकार मंच और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस हैदराबाद (आईएसबी) के संयुक्त अध्ययन की रिपोर्ट  मुताबिक सिंहभूम संसदीय क्षेत्र में 1123 ऐसे गांव हैं जो जंगलों से लगे हुए हैं. इस गांव की 123779 एकड़ भूमि वन अधिकार कानून 2006 (एफआरए) के दायरे में आती है. इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि इस संसदीय क्षेत्र की कुल आबादी का 818876 लोग वन अधिकार कानून 2006 के लाभार्थी हैं. इसमें से 507703 लाभार्थी मतदाता हैं, जिसमें से 392152 आदिवासी हैं.

जमुना टुडू की नाराजगी सरकार से इस बात को लेकर भी है कि उन्हें सम्मान  तो ढेरों मिलें, मगर सरकार से कोई सहयोग नहीं मिलता है. उन्हें जैसे पहले संघर्ष करना पड़ता था, वैसा ही हाल आज भी है.

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