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दिल्ली हिंसाः ओमप्रकाश ने बीस साल के रिश्ते पर नहीं आने दी आंच, आफाक ने कहा, फरिश्ते की तरह बचाई परिवार की जान

Md. Asghar Khan

March 15, 2020

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भाईजान, हमलोग नहीं बचेंगे. बच्चों को ओमप्रकाश शर्मा जी के यहां से ले जाइएगा….

48 वर्षीय आफाक अहमद बिहार के गया शेरघाटी में रह रहे अपने रिश्तेदार को फोन पर यह तब बताते हैं जब उन्हें और उनकी बीवी जीनत जहां (35 वर्ष) को यह मुकम्मल एहसास हो जाता है कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा की आग से वे अब नहीं बचेंगे. तभ यह मुस्लिम दंपत्ति अपने बच्चों को बचाने की जुगत में लगता है.

दिल्ली हिंसा में मौत के मुंह से बचकर निकला यह परिवार उस मंजर के बारे बताता है, “मैंने मौत को सामने से देखा है. पांच सौ की भीड़ हमारे घर तक आ गई थी. जयश्री राम का नारा लगाते हुए घर पर हथौड़े मार रहे थें. तभी ओमप्रकाश शर्मा जी का परिवार पहले मेरे दोनों बेटे (फरहान 12 वर्ष, अलमास 6 वर्ष) को अपने घर में (ओमप्रकाश और आफाक के घर की दिवार एक दूसरे के घर लगी हुई है.) खींचते हैं.”



इसी के बाद आफाक अपने रिश्तेदारों को फोन करते हैं और ऊपर लिखी वो बात बोलते हैं, जिसका जिक्र मैंने स्टोरी की पहली लाइन में किया है. चूंकि इस दंपत्ति को पकड़ कर खींच पाना मुश्किल था इसीलिए उन्होंने मान लिया था कि वे अब बचने वाले नहीं हैं. लेकिन कुछ ही देर में ओमप्रकाश शर्मा (55 वर्ष), उनकी पत्नी सवित्री देवी(45 वर्ष), बेटा कपिल शर्मा(28 वर्ष) अपने घर से आफाक अहमद के घर की तरफ सीढ़ी लगाते हैं.

फिर सुनिए आगे, “फिर कुछ देर के बाद सीढ़ी लगा कर हम दोनों को अपने घर में खींचते हैं. शर्मा जी कहते रहे हैं कि यहां से आपलोग (दंगाई) जाइए. यह घर मुस्लिम का नहीं, मेरा घर है. लेकिन वे नहीं मान रहे थें. फिर पास के ही राहुल, पंकज, टंडू, अरुण, सन्नी (एक गुर्जर परिवार के सदस्य) भाई आकर उनलोगों को हटाते हैं.

25 फरवरी को आफाक अहमद के परिवार ने जो देखा वह पहले कभी न देखा था, और कभी ऐसा होगा यह सोचा भी नहीं था. दो से तीन घंटे के अंतराल में और क्या क्या हुआ उसे बताते हुए आफाक बिलखने लगते हैं.

उत्तर- पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा में अब तक 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई है और 200 से ज़्यादा लोग घयाल है.

जान बचाई, खाना खिलाया, फिर बस स्टैंड छोड़ा

ओखला के अफुल फजल स्थित रिश्तेदार के फ्लैट में एक कमरे में जमीन पर बिछी दरी पर अपने परिवार के साथ बैठे आफाक दिल्ली के उत्तर पूर्वी घोंडा विधानसभा के गांवड़ी एक्सटेंशन, पांचवा पुस्ता में अपने मकान का नंबर बताते हुए कहते हैं, “मेरा मकान नंबर सी-24, गली नंबर 11. वहीं पर अजिजिया मस्सिद है. 25 फरवरी को मंगल था. सुबह दस बजे तक सब ठीक था. लेकिन 11 बजे तक मस्जिद का गेट तोड़ दिया गया था. उसमें आग लगाया जा चुका था. उसके बगल में फिरोज भाई की मेडिकल दुकान भी जल चुकी थी. उनलोगों (दंगाई) ने दस नंबर गली से आग लगाते हुए 11 नंबर में आ चुके थें. मैं और मेरी बीवी बच्चे यह सब देखकर अंदर से हिल चुके थें. बस अपनी बारी का इंतेजार था.  लेकिन ओमप्रकाश शर्मा ने जी हमारी जान बचा ली. उन्हें अल्लाह ने फरिश्ता बनाकर हमलोगों की जान बचाने के लिए भेजा था.”

आफाक, उनकी बीवी जीनत जहां और 12 साल का बेटा फरहान पूरी बातचीत में 20-25 बार ओमप्रकाश शर्मा और उनकी पत्नी सावित्री देवी का का नाम लेते हैं. उन्हें कभी भगवान का रूप तो कभी अल्लाह का फरिश्ता बतातें. इसके अलावा उन गुर्जर परिवार (राहुल, पंकज, टंडू, अरुण, सन्नी) का भी शुक्रिया करते नहीं थकते हैं जहां उन्होंने अपने गली, मोहल्ले को छोड़ने से पहले आखिरी के बिताए तीन घंटे गुजारे थें.

जीनत जहां उस परिवार के बारे में बताती हैं, “पहले दो घंटा हमने जान बचाने के लिए भैया, भाभी(ओम प्रकाश और उनकी पत्नी) के यहां के बिताया. जब भीड़ हमारे घर से आगे बढ़ गई तो हमें पास में ही रहने वाले गुर्जर परिवार अपने यहां ले गएं. वहां करीब तीन घंटा हमलोग रहें. उन्होंने हमें खाना-पीना खिलाया. फिर हमलोगों को पांच बजे लाकर बस स्टैंड छोड़ा. यहां से हमारे रिश्तेदार हमें लेकर ओखला के अबुल फजल कॉलोनी आएं.”

आफाक दो दशक से भी अधिक समय से दिल्ली के इस क्षेत्र में कंप्यूटर एंब्रॉयडरी काम करते आ रहे हैं. मूल रूप से वो बिहार के जहानाबाद काको प्रखंड के रहने वाले हैं. उनकी शादी बिहार के ही गया शेरघाटी में हुई है. वो बताते हैं कि दिल्ली में उनका कोई बड़ा भाई तो नहीं है रहता है, लेकिन ओमप्रकाश शर्मा को बड़े भाई से कम नहीं मानते हैं.



11 बजे से हिंसा भड़की, चार बजे पुलिस पहुंची

आफाक की बीवी जीनत जहां कहतीं हैं कि वे (शर्मा जी, गुर्जर परिवार) सब लोग भगवान का रूप का थें. वो उनका अहसान जिंदगी के कोई जन्म में भी नहीं उतार सकेंगी.  लेकिन ओमप्रकाश शर्मा फोन पर कहते हैं, “आफाक भाई हमें भगवान का रूप ना दें, क्योंकि इंसान होना बड़ा मुश्किल हो गया है भगवान तो बहुत ऊंची चीज है. हमने बस इंसानी कर्तव्य को पूरा किया है. उनसे 20 साल का लगाव है जो आगे भी जारी रहेगा.

ओमप्रकाश उस घटना के बारे में बताते हैं, “आफाक भाई का परिवार बहुत खौफ में था. जब मस्जिद में पेट्रोल बम फेंक कर आग लगाई गई. घरों, दुकानों को भी उसी तरह जलाया जा रहा था. यह सब देखकर आफाक भाई और भाभी जी की आवाज नहीं निकल रही थी. मैंने उन्हें थोड़ा पानी पिलाया तो वो कुछ बोल पाएं.”

ओमप्रकाश शर्मा ने आफाक के परिवार की सिर्फ जान ही नहीं बचाई, बल्कि उनके घरों को भी जलने से बचाया. अफसोस की बात यह रही कि उन्हें इस नके काम के बदले कुछ लोगों ने हरामजादा और देशद्रोही जैसी उपाधि दी.

20 साल के आपसी भाईचारे में जो पांच घंटे के सांप्रदायिक सीन को उन्होंने देखा है, उसे बताते बताते आफाक का परिवार कई बार रो पड़ा.

आफाक कहते हैं, “गांवड़ी में 1998 से रहते आ रहे हैं. कभी किसी से कोई झगड़ा नहीं हुआ. सबके साथ रहें. ईद, बकरीद, होली,दशहरा, दिवाली में हमलोग एक दूसरे के यहां आया जाया करते. लेकिन 25 फरवरी के बाद सब बदल गया.”

जीनत जहां बताती हैं कि 11 बजे से तीन बजे तक हमारे मोहल्ले की भयानक तस्वीर हो गई थी. चार बजे पुलिस आती है. लेकिन तबतक  मेरे घर को छोड़ दें तो गली के लगभग-लगभग मुस्लिम घरों में (25) आग लगाई जा चुकी थी. मुझे नहीं पता कि उनमें कितने लोग बचे होंगे, कितने मरे.”



बाहरी थी भीड़

आपने ने पुलिस को कॉल किया था, इस सवाल के जवाब में आफाक कहते हैं, “मेरी हिम्मत नहीं थी. जब वे लोग मेरे दरवाजे को हथौड़े से पीट रहे थें. तब ओमप्रकाश जी और भाभी(ओमप्रकाश जी पत्नी) मेरे बच्चे को अपने घर की तरफ खींच रही थीं. क्या मैं उस समय पुलिस को फोन करता? इसके बाद मुझे गुर्जर परिवार अपने घर ले जाते हैं. खाना खिलाते हैं. क्या मैं उस समय फोन करता? फिर वे मुझे स्टेशन तक छोड़ने आते हैं. क्या मैं उस समय फोन करता.? लेकिन ऐसा तो नहीं है कि किसी ने पुलिस को फोन नहीं किया होगा.”

आफाक के परिवार की नरागजी इस बात को लेकर भी है कि अगर पुलिस समय पर आ जाती तो शायद ये नौबत नहीं आती. वो कहते हैं कि जो भी दंगाई लोग दिख रहे थें, उसमें उनके गली या आसपास का कोई नहीं था. सब बाहरी लोग मालूम पड़ रहे थें.

यही बात ओम प्रकाश शर्मा भी दोहराते हैं कि भीड़ का चेहरा जाना पहचाना नहीं था. वे बाहरी लोग थें, जिनकी उम्र 20-22 साल की होगी.

जाहिर तब सवाल है उठता है कि वे कौन थें, कहां से आएं, कहां गएं,किसके भड़काने और उकसाने पर खून के प्यासे हुएं… ऐसे हीं कई सवाल उन हजारों सवालों की तरह है जो आजतक जवाब ढ़ूढ़ रहे हैं.

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