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बिहार : लॉकडाउन के बीच भूख, इलाज, सुविधा के अभाव में बच्चों की मौत

तर्कसंगत

April 15, 2020

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कोरोना को हराने में सरकार हर जुगत लगा रही है. मगर बांद्रा स्टेशन पर प्रवासी मज़दूरों का जमावड़ा मात्र  एक उदाहरण भर है कि अभी भी इस लॉकडाउन में कई सारी गुंजाईश बाकी है जिसके मद्देनज़र गरीब प्रवासी मज़दूरों के साथ साथ उन मज़दूरों के राज्य में केंद्र सरकार को ध्यान देना ज़रूरी है. 

ताज़ा मामला बिहार का है जहाँ पूरी तरह से लॉकडाउन है. निकट के राज्यों से प्रवासी मजदूर लॉक डाउन की अनिश्चितता से भयभीत हो कर पैदल ही सैकड़ों मिलो का सफर तय कर अपने गांवों की तरफ़ भागे. अपनों की तरफ़ भागे लेकिन अब गांवों में भूख का असर दिखने लगा है. मौक़े पर इलाज के ना मिल पाने का असर दिख रहा है. गांवों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी हमेशा से रही है, कोरोना की वजह से जो थोड़े-बहुत इंतज़ाम थे वो भी चरमराते दिख रहे हैं. 

 

क्या है मामला ?

बिहार के बांका जिले में एक 12 वर्षीय बच्चे की मौत हो गई है. घटना 10 अप्रैल की है. बच्चा अपने ननिहाल में रहता था. बच्चे की मृत्यु पर परिवार का आरोप है कि लड़के को पेट दर्द हुआ वो अस्पताल ले गए लेकिन किसी ने देखा नहीं. इलाज नहीं मिला और इस वजह से उसकी मौत हो गई. 

बांका जिले के बाराहाट प्रखंड अंतर्गत लौढिया खुर्द पंचायत के दुबराजपुर गांव का मामला है. 09 अप्रैल की शाम महावीर लैया के 12 वर्षीय नाती राकेश को पेट में अचानक दर्द होने के बाद उसे पंजवारा स्थित हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर लाया गया. मगर वहां न कोई डॉक्टर था न कोई नर्स निराश हो कर पेट दर्द की दवा ले कर वो घर लौट आये, मगर अगले ही दिन बच्चे की पेट दर्द से मौत हो गयी. 

 

लॉकडाउन में नहीं है कमाई     

मृतक के नाना और परिवार के मुखिया और मृतक के नाना महावीर लैया ने बताया, “लड़का पास की नदी में दूसरे लड़कों के साथ मछली पकड़ने गया था. वहां से लौटा तो पेट दर्द की शिकायत करने लगा. मैं ही एक कमाने वाला हूं. बंदी की वजह से कई दिनों से मज़दूरी नहीं मिली है. बैठा-बैठी है.” 

 

डॉक्टर ने इलाज नहीं किया था

स्थानीय पत्रकार आनंद झा के अनुसार स्थानीय मुखिया की मौजूदगी में मृतक के नाना और नानी ने कहा कि जिस रात राकेश के पेट में दर्द हुआ था उस रात भी घर में खाना नहीं बना था. कुछ था ही नहीं. बाराहाट प्रखंड के BDO के मुताबिक़ इस बच्चे की मौत भूख से नहीं हुई है. एशियाविल हिंदी से बात करते हुए वो कहते हैं, “मुझे तो पता ही नहीं चला. बाद में पता चला. परिवार का राशन कार्ड है. उन्होंने तो मार्च का राशन भी उठया है” इसी बातचीत में BDO साहब ने स्थानीय आयुष डॉक्टर दिनेश कुमार का नंबर देते हुए ये भी दावा किया कि बच्चे की जांच इन्हीं डॉक्टर ने की थी. लेकिन जब डॉक्टर साहब से पुछा गया तो डॉक्टर साहब साफ़ नकार गए और मीडिया को ये भी बताया कि चूँकि उन्होनें उस मरीज़ को देखा ही नहीं तो बच्चे की मौत का कारण वो नहीं बता सकते. 

 

ऐसी ही और घटनाएं

लॉकडाउन के समय में पूरे तंत्र का ध्यान कोरोना पर केंद्रित है मगर इसी बीच आरा के जवाहर टोला मुसहर टोली में 26 मार्च को 11 वर्षीय राहुल मुसहर की मौत हुई. परिवार ने कहा कि मौक़े पर इलाज नहीं मिला. घर में कुछ खाने को नहीं था. 10 अप्रैल को जहानाबाद एक तीन वर्षीय बच्चे की मौत हो गई क्योंकि उसे ऐंबुलेंस नहीं मिल पाया था. इन तीनों मामले में परिवार ग़रीब है. आरा और बांका के मामले में परिवार ने साफ़-साफ़ कहा है कि उनके पास खाने की दिक्कत है. मगर प्रशासन सुशासन का दम भर रहा है.

 

तर्कसंगत का तर्क

इस स्थिति को कोरोना की आपात स्थति का हवाल दे कर नहीं टाला जा सकता, क्यूंकि जब कुछ प्रवासी मजदूर महानगरों से अपने गाँव पहुंचे हैं तो उनमें से कोई कोरोना पीड़ित है या नहीं ये ऐसे चोट मोठे गाँव में मात्र एक आयुष डॉक्टर के भरोसे प्रशासन कैसे मान सकता है? सवाल है व्यवस्था बहाली की. सवाल है कि लॉकडाउन में गरीब दिहाड़ी मजदूरों के परिवार का ख्याल कैसे रखा जा रहा है? सवाल ये भी है कि कोरोना से लड़ने के चक्कर में पूरे ब्लॉक को एक आयुष डॉक्टर के भरोसे कैसे छोड़ दिया जा रहा है? सवाल ये भी है कि बीमार बच्चे को समय पर एंबुलेंस क्यों नहीं मिला? सवाल ये भी है कि बिहार कब तक अपने बच्चों की मासूम लाशें अपने कंधों पर उठाता रहेगा? सवाल ये भी है कि राज्य की राजधानी से जो कहा जा रहा है वो जमीन पर कितना और किस रूप में उतर रहा है?

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