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बच्चे को घर पहुँचाने के लिए चुराई साइकिल, ख़त में लिखा ‘आपका कसूरवार एक यात्री मजदूर और मजबूर’

तर्कसंगत

Image Credits: indiatoday

May 17, 2020

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कहते हैं कि मजबूरी इंसान से सब कुछ करा देती है। कोरोनावायरस लॉकडाउन के कारण इस वक्त प्रवासी मजदूरों  से ज्यादा मजबूर शायद ही कोई हो। तभी तो एक मजदूर को अपने घर जाने के लिए किसी की साइकिल चोरी करनी पड़ी और चोरी के बाद उसने वहां माफीनामा भी लिख कर रखा, जिसमें उसने चोरी करने का कारण बताया।

इस  लॉकडाउन में एक दिव्यांग बच्चे के पिता को उसे घर ले जाने के लिए साइकिल चोरी करने पर मजबूर कर दिया। साइकिल चुराने के बाद मजबूर पिता ने चिट्ठी के जरिए मालिक से माफी भी मांगी है।

चिट्ठी में लिखे पते के अनुसार बरेली निवासी इकबाल खान राजस्थान के भरतपुर में मजदूरी करता था, लेकिन लॉकडाउन में नौकरी जाने के कारण वह परिवार सहित वापस बरेली जाने को मजबूर हो गया।

उसका एक दिव्यांग बेटा भी है। ऐसे में उसे पैदल ले जाना मुश्किल था। इसके चलते उसने मजबूरी में रारह के निकट सहनावली गांव से साहबसिंह की साइकिल चुरा ली। इसके जरिए वह अपने दिव्यांग बेटे को लेकर बेरली के लिए रवाना हो गया।

साइकिल चुराते समय शायद इकबाल का ईमान गवाही नहीं दे रहा था। उसने साइकिल उठाते हुए उसके मालिक के नाम एक चिट्ठी लिखी और माफी मांगी।

उसने चिट्ठी में लिखा, ‘मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं। हो सके तो मुझे माफ कर देना जी। क्योंकि मेरे पास कोई साधन नहीं है और मेरा एक बेटा है उसके लिए मुझे ऐसा करना पड़ा क्योंकि वो विकलांग है, चल नहीं सकता। हमें बरेली तक जाना है। आपका कसूरवार एक यात्री मजदूर और मजबूर’

इंडिया टुडे के अनुसार, साइकिल मालिक साहिब सिंह ने बताया कि उसने रात को साइकिल बहुत ढूंढा, लेकिन नहीं मिली। अगली सुबह बरामदे में झाड़ू लगाते हुए समय कागज का एक छोटा सा टुकड़ा मिला।

इसमें एक मजबूर पिता की मजबूरी के रूप में लिखे शब्दों को पढ़कर उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसने बताया कि वह पहले अपनी साइकिल चोरी होने को लेकर बहुत गुस्से में था, लेकिन चिट्ठी पढ़ने के बाद गुस्सा संतोष में बदल गया है।

तर्कसंगत का तर्क

सोचिये कि हम और आप जब अपने घरों में अपनों के बीच रह रहे हैं जहाँ सारे सुख संसाधन कमोबेश हमारे पास हैं तब लॉकडाउन का पालन करना करना इतना आसान और ज़रूरी लगता है, मगर इस मजबूर और मजदूर बाप के लिए कितना मुश्किल काम होता है कि इस समय अपनों का पेट भरना। कहने को सरकार सारे इन्तंज़ाम कर रही है मगर सरकारी इंतज़ाम अपने देश में कैसे होते हैं उसकी ज़मीनी हकीकत और पहुँच का दायरा कितना सिमित है ये जगजाहिर है। इस समय हम ये दोष नहीं दे सकते कि मजदूर ट्रैन से क्यों नहीं जा रहे ? कुछ ट्रैन से जा रहे रहे हैं कुछ साधन ये पैसे की कमी या और भी किसी मजबूरी के कारण पैदल ही निकल पड़े हैं।  हम कम से कम इतना ज़रूर करें कि अपने शहर, कस्बों से गुज़र रहे इन मजदूरों को आराम के लिए जगह दें रास्ते के लिए खाना, पानी दवा, आदि साथ दें ताकि ये देर से ही सही धीरे ही सही मगर इस गर्मी जब अपने घर के आँगन में पहुंचे तो वहां आपके किये मदद की याद इनके दिलोदिमाग को ठंढक पहुंचाए।

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