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देखिये लॉकडाउन में बिहार के मजदूर रामपुकार के वायरल तस्वीर के पीछे की कहानी

तर्कसंगत

Image Credits: Facebook/Salma Francis/Atul Yadav/Twitter

May 19, 2020

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राम पुकार पंडित 38 वर्षीय प्रवासी मजदूर हैं, उनकी फोन पर रोती हुई तस्वीर वायरल हो रही है, जिसे पीटीआई के फोटोग्राफर अतुल यादव ने खिंचा था. तर्कसंगत से बात करते हुए राम पुकार ने कहा, “मैं खड़मपुर ब्लॉक के एक अस्पताल में हूं। मैं अभी तक घर नहीं पहुंचा हूं।”

अपने एकलौते बेटे की मौत से टूट चुके राम पुकार कहते हैं ‘क्या करें मैडम रोज कमा रहे हैं रोज़ खा रहे हैं अब इतना दिन लॉकडाउन बढ़ गया कुछ काम नहीं चल रहा, बेटा नहीं रहा तो पागल ही हो गए थे अब कुछ होश नहीं रहा”

 

 

अपने साथ बीती घटना के बारे में रामपुकार तर्कसंगत को बताते हैं कि जब लॉकडाउन का समय बढ़ता गया  हुआ तो वो 11 मई को   पैदल ही अपने गाँव बेगूसराय जाने के लिए निकल पड़े. दिल्ली से बेगूसराय की दूरी कुछ नहीं तो 1000 किलोमीटर है.

कोरोनोवायरस लॉकडाउन के बीच पंडित ने अपनी यात्रा के बारे में बताया कि कैसे एक अधिकारी ने घर जाने के लिए टिकट बुक करने के नाम पर पैसे लेकर उन्हें धोखा दिया। वो इस धोखे से उबार कर घर पहुँचने का कोई रास्ता खोज ही रहे थे कि उन्हें उनकी पत्नी का फोन आया  जिन्होंने उन्हें बताया था कि उनके एक साल के बच्चे की मौत हो गई है। जब पंडित को एहसास हुआ कि इस लॉकडाउन में न केवल उनके पेट पर लात पड़ी बल्कि उनके जिगर का टुकड़ा भी उनसे दूर हो गया तो वो फूट-फूट कर रोने लगे,और शयद उसी वक़्त उनकी ये तस्वीरर खींची गयी।

 

 

इस दुःख की खबर को झेलने के बाद वह दिल्ली के एक सब्जी बाजार में सलमा फ्रांसिस से मिले। तर्कसंगत को रामपुकार ने बताया कि लॉकडाउन के बीच उनकी अंतर-राज्य यात्रा के लिए कानूनी अनुमति और दस्तावेज के लिए सलमा ने उनकी काफी मदद की। “उन्होनें मुझे दो दिनों के लिए खाना खिलाया, मेरे लिए टिकट बुक किया, मेरा वायरल टेस्ट करवाया और मुझे यात्रा के लिए कुछ नकद भी दिए,” उन्होंने कहा। सलमा ने तर्कसंगत से बात करते हुए कहा  “हजारों की तादाद में दिल्ली-यूपी सीमा पर गाजीपुर में प्रवासी मजदूरों इकठ्ठा हो रहे थे। मैंने इस आदमी को देखा और उसे खाना दिया। वह बोला, वह जल्द से जल्द घर लौटना चाहता था क्योंकि उसका इकलौता बेटा मर गया था”।

 

Posted by Salma Francis on Wednesday, 13 May 2020

 

रामपुकार की दुर्दशा सुनकर सलमा हिल गई। सलमा दिल्ली स्थित एक गैर सरकारी संगठन विजन फॉर ओएसिस वेव्स सोसाइटी (VOWS) की अध्यक्ष हैं, जो तालाबंदी के बीच शहर में फंसे लोगों और जरूरतमंदों को राहत सामग्री, राशन और भोजन उपलब्ध कराने में लगी हुई है।

उन्होनें बताया “प्रतिबंधों के बीच उनकी यात्रा परमिट प्राप्त करना बहुत मुश्किल था। इसके अलावा, प्रवासी श्रमिकों की एक बड़ी संख्या इस पैसे इकठ्ठा कर रेल या बस टिकट या भाड़े की गाडी से घर पहुँचने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मैंने उसे हौसला दिलाया मैं उसे घर भेजने में पूरी मदद करुँगी”।

 

“रामपुकार के बेटे की मौत 11 मई को हुई थी हमने उसकी यात्रा का इंतज़ाम 13 तारीख को कर दिया था, अब घर पहुंचे उसे पांच दिन से भी ज़्यादा हो गए हैं उसे हॉस्पिटल में क्वारंटाइन करके रखा गया है। वो अभी तक अपने परिवार वालों से मिल नहीं सका है।” सलमा ने तर्कसंगत को बताया।

“मैं समझती हूँ कि कोरोना बीमारी के वक़्त हमें कई कड़े नियमों का पालन करना ज़रूरी है मगर इसका पालन करने के समय हमें कुछ अपवादों पर भी ध्यान देना चाहिए, मैं उम्मीद करती हूँ कि राम पुकार अपने परिवार वालों से जल्द ही मिले”। रामपुकार से लगातार संपर्क बनाये हुए सलमा तर्कसंगत से कहती हैं।

सलमा ने अपने एनजीओ द्वारा रामपुकार की बेटी के भी पढाई का खर्च उठाने का मन बना लिया है।

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