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पिता को गुरुग्राम से बिहार साइकिल पर ले जाने वाली ज्योति का साइकिलिंग के लिए होगा ट्रायल

तर्कसंगत

Image Credits: newindianexpress

May 22, 2020

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कई बार इंसान के सामने ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं कि वह असंभव से लगने वाले काम को भी कर ले जाता है.

कुछ ऐसा ही बिहार की 15 वर्षीया ज्योती कुमारी के साथ हुआ, जिन्होंने लॉकडाउन में फंसे होने के कारण 1,200 किलोमीटर का सफर साइकिल से सात दिन में तय किया.

अब उनकी इस दृढ़ता से प्रभावित साइकिलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (CFI) ने उन्हें ट्रायल के लिए बुलाने का फैसला लिया है.

ज्योति के पिता गुरुग्राम में ऑटोरिक्शा चलाते हैं और लॉकडाउन के दौरान वह चोटिल हो गए थे. चोटिल होने और आमदनी बंद हो जाने के बाद उन्हें किराए पर ली गई ऑटोरिक्शा को उसके मालिक को लौटा देनी पड़ी.

10 मई को साइकिल खरीदने के बाद दोनों ने अपना सफर शुरु किया और 16 मई को वे अपने घर बिहार पहुंचे. पूरे सफर के दौरान ज्योति ने अपने चोटिल पिता को बैठाकर साइकिल चलाई.

ज्योति जिस साइकिल से गांव लौटी हैं, वो साइकिल 8 मई को खरीदी थी. वह बताती हैं, ‘जहां रहती थी, वहीं के एक पहचान वाले से साइकिल खरीदी थी. वह 1,600 रुपये मांग रहा था. केंद्र सरकार की तरफ से 1,000 रुपये बैंक अकाउंट में भेजे गए थे. उसे निकाल कर 500 रुपये साइकिल वाले को दिया और कहा कि बाकी बाद में दे देंगे, तो वह मान गया. बचे 500 रुपये लेकर मैं, पापा को लेकर निकल गई.’

CFI के चेयरमैन ओंकार सिंह ने PTI से कहा कि यदि ज्योती ट्रायल में पास हो जाती हैं तो उन्हें स्टेट ऑफ द आर्ट नेशनल साइकिलिंग अकादमी में ट्रेनी के तौर पर रखा जाएगा.

उन्होंने आगे कहा, “यदि वह घर से किसी को साथ लाना चाहेंगी तो हम उन्हें इसकी भी इजाजत देंगे. हमे अपनी बिहार स्टेट यूनिट से बात करेंगे कि कैसे उन्हें दिल्ली ट्रायल के लिए लाया जा सके.”

ट्रायल का ऑफर देने के बारे में पूछे जाने पर सिंह ने कहा कि जरूर उनमें कुछ बेहतरीन प्रतिभा है. उन्होंने आगे कहा कि उनके ख्याल से 1,200 किलोमीटर साइकिल चलाना आसान काम नहीं है. जरूर उनके पास दृढ़ता और मजबूती है और हम इसे परखना चाहते हैं. सिंह ने बताया, “हम उन्हें अकादमी में मौजूद कम्प्यूटराइज्ड साइकिल पर बैठाएंगे और देखेंगे कि वह सिलेक्ट होने के लिए सात-आठ पैमानों पर खरी उतरेंगी या नहीं.”

सदर SDO राकेश गुप्ता ने भी ज्योति की तारीफ़ करते हुए उसे श्रवण कुमार की संज्ञा देते हुए कहा कि बच्ची ने अपने अस्वस्थ पिता को जिस तरह साइकिल पर बिठाकर गुड़गांंव से दरभंगा लेकर आ गई यह हैरान करनेवाली बात है. ऐसे बच्चे का मनोबल बढ़ाने की जरूरत है. बच्ची ने आठवीं तक की पढ़ाई की है और  इसने आगे पढ़ने की इच्छा जाहिर ही है. जल्द ही इसके लिखने-पढ़ने का इंतिजाम किया जाएगा. साथ ही इन परिवार को फिलहाल कुछ सरकारी लाभ का फायदा मिल रहा है इसके बाद भी जरूरत के हिसाब से सभी सरकारी सुविधा उपलब्ध करायी जाएगी.

दरभंगा केDM ने छोटी बच्ची के बुलंद हौसले को देखते हुए उसे निकट भविष्य में कुछ न कुछ करने का अश्वासन दिया है. पिता और उनकी बेटी को क्वारंटााइन  में रखा गया है. जैसे ही उनकी 14 दिनों का क्वारंटाइन अवधि समाप्त होगी उन्हें कुछ न कुछ सरकारी तौर पर अलग से मदद पहुंचाई जायेगी.

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