सप्रेक

देव कुमार, जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान झारखंड में लोगो की मदद के लिए अपनी जमा पूँजी खर्च कर दी

तर्कसंगत

June 16, 2020

SHARES

कोरोनावायरस महामारी के मद्देनजर, 24 मार्च से भारत में तालाबंदी जारी थी. अब हम सब अनलॉक के घड़ी से गुज़र  रहे हैं और कामना कर  हैं कि सब कुछ जल्द से जल्द ठीक हो जाए. मगर उस समय जब लॉकडाउन चरम पर थी, तब हमारे देश में ऐसे कई लोग थे जो केवल अपने ठीक होने की जुगत में नहीं बल्कि उन लोगों की सेवा में लगे थे जिन तक सरकारी मदद की पहुँच नहीं थी.

ऐसे ही एक शख्स हैं झारखण्ड के BCCL में कार्यरत देव कुमार जो लॉकडाउन के शुरू होने के साथ ही, अपने क्षेत्र में उन लोगों  की मदद के लिए आगे आये जो लॉकडाउन में सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए.

 



 

तर्कसंगत से बात करते हुए देव कुमार बताते हैं कि वो कोल इंडिया में कार्यरत होने के साथ साथ अपने क्षेत्र के उपेक्षित लोगों के लिए भी काम करने में रूचि रखते है. तालाबंदी से पहले भी वो अपने क्षेत्र के गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए काम करते उन्होंने पाठशाला नाम से स्कूल की शुरुआत की है जिसकी धनबाद जिले में तीन शाखाएं हैं.

उस स्कूल में कोयला उद्योग से जुड़े गरीब मजदूर के बच्चों को पढ़ाया जाता है जो अपनी पढाई पूरी नहीं कर पाते या तो शुरू ही नहीं , और वो इस नेक काम को अपने बलबूते पर चला रहे हैं.

तर्कसंगत को देव कुमार वर्मा ने बताया कि तालाबंदी के बाद से इन बच्चों के खान पान से जुडी और भी समस्याएं इनके सामने आयी, क्यों कि अधिकांश बच्चों के माता पिता कोयला क्षेत्र में दिहाड़ी मजदूरी का काम करते हैं, फ़लस्वरुप तालाबंदी में उनके खानी की दिक्क्तें बढ़ गयीं, जिसके बाद इन्होनें अपने स्तर पर लोगो की मदद करने की ठानी.

 


Image may contain: one or more people and outdoor

 

 

शुरूआती दिनों में देव कुमार वर्मा ने लोगों को अपने खर्च पर दाल, चावल और कुछ जरुरी राशन बांटे मगर उसके बाद आस पास के और गाँव से उन तक मदद की गुहार आने लगी, और देव कुमार ने उन लोगों को भी निराश नहीं किया.

उन्होंने अभी तक जरूरतमंदों को 5 लाख से ज़्यादा फूड किट मुहैया कराई हैं। उनका संगठन 37 सामुदायिक रसोई भी चला रहा है जो हर दिन लगभग 12,000 लोगों को खिलाने में मदद करता है. अब तक, वर्मा ने झारखंड के 85 गांवों में लगभग 3 लाख भोजन परोसने में मदद की है.


Image may contain: one or more people, people standing and outdoor


 

केवल इतना ही नहीं इस्कॉन धनबाद के सहयोग से, पाठशाला धनबाद रेलवे स्टेशन, हीरापुर और गोल्फ ग्राउंड में प्रवासी मजदूरों को 1000 पकाया हुआ भोजन परोस रहा है.

तर्कसंगत से बात करते हुए देव कुमार ने बताया कि तालाबंदी के दौरान उन्होनें पांच साल के कम उम्र के बच्चों को 1000 लीटर से ज़्यादा दूध बांटे हैं.

कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए संगठन ने झारखंड पुलिस सामुदायिक रसोई के लिए 40,000 से अधिक साबुन, 1,00,000 से अधिक हैंड सैनिटाइज़र और मास्क और 5,000 किलोग्राम किराने का सामान उपलब्ध कराया है.

इसके साथ साथ उनका संगठन स्थानीय महिलाओं के सहयोग से कपड़े का मास्क भी बनवा कर ग्रामीण क्षेत्र और प्रवासी मजदूरों के बीच बाँट रहे हैं.

 


Image may contain: one or more people, people sitting and indoor


 

हर दिन, राहत कार्य के लिए खर्च लगभग 1 लाख रुपये आता है। अब तक, कई एनजीओ और व्यक्ति संगठन को 40 लाख रुपये से अधिक की मदद करने के लिए आगे आए हैं. हालांकि, इस राशि का एक बड़ा हिस्सा खुद वर्मा अपनी ओर से दे रहे हैं, इस कार्य के लिए उन्हें अपने एक दूसरे सपने को रोकना पड़ रहा है, उन्होनें बताया कि बच्चों के लिए एक हाई स्कूल शुरू करने के अपने सपने को पूरा करने के लिए लगभग 20 लाख रुपये बचाए थे मगर अब चूँकि इस आपदा में उनके ये पैसे खर्च हो रहे हैं.

तर्कसंगत उम्मीद करता है कि जन कल्याण और समाज के उपेक्षित वर्ग के बच्चों के भविष्य के लिए देव कुमार का अभियान कभी रुके नहीं मगर यह हम सब की सहायता के बगैर अपने मंज़िल तक नहीं पहुँच सकता, हम में से कोई भी इनके मदद करना चाहे तो इनकी   पाठशाला के फेसबुक पेज पर जा कर इनसे संपर्क कर सकता है, या 9470595075 पर समपर्क कर सकते हैं.

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...