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क्या लॉकडाउन और अनलॉक में हमारी महिलाओं के लिए चीज़ें आसान हुई है या उन्हें हमारी मदद की ज़रूरत है?

तर्कसंगत

Image Credits: retailtouchpoints

June 30, 2020

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कोरोना से लड़ने में हमने चार महीने गुज़ार दिए और लड़ाई अभी भी ज़ारी है. इस समय में हम काफी संयम और सुरक्षा के साथ आगे बढ़ रहे हैं. अपने आस पास हमने कोरोना वारियर्स को भी देखा जो अपनी जान की परवाह न करते हुए हम तक हमारे दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए दिन रात वचनबद्ध रहे और और अपने कर्तव्य को पूरा किया। मगर क्या कोई ऐसा भी वारियर है जिसकी योगदान को हमने नज़रअंदाज़ किया और उसे वो सहयोग और श्रेय नहीं दिया जितनी की उसे ज़रूरत है?

इस महामारी में हमने आने घर की महिलाओं को नजरअंदाज किया है जिन्होनें अपने परिवार को खतरे से बचाने का हर संभव प्रयास सब पहले किया है. इतना ही नहीं ये गलती लॉक डाउन और अनलॉक के समय भी हुई है.

आज हम सभी जानते हैं कि क्लोरोना के कारण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, इकनोमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय आबादी में कामकाजी महिलाओं की भागीदारी घटते जा रही है और यकीन मानिये इस समय हमारी माताएँ, बहने और भी मुश्किलों का सामना कर रही हैं.

एक तरफ कोरोना के कारण हुए लॉक डाउन में कामकाजी महिलाओं ने घर पर रहते हुए आने दफ्तर के काम को पूरा करने की कोशिश की साथ ही साथ अपनों की सुरक्षा के मद्देनज़र अपने हाउस हेल्पर को भी घर से दूर रखा मगर उनके वेतन उन्हें समय पर देती रही. इतना ही नहीं अपने दफ्तर के काम के साथ घर के बड़े बुज़ुर्गों की भी इस महामारी में अतिरिक्त ख्याल रखा. उन महिलाओं के लिए स्थिति और भी मुश्किल भरी रही जिनके नवजात छोटे बच्चे हैं. अपनी घर के खर्च को सँभालने में अपने पति की मदद के लिए उन्होनें न तो नौकरी चूड़ी और न ही काम का हवाला देते हुए अपने घर के फ़र्ज़ से मुंह मोड़ा, और इस तरह की तत्परता और त्याग सरकारी और निजी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं दोनों ही अपने स्तर पर दिखा रही हैं.

जयपुर में निगम कार्यालय में जूनियर इंजीनियर के पद पर काम करने वाली एक ऐसी ही कोरोना वारियर ने अपने नाम गोपनीय रखने के शर्त पर तर्कसंगत को बताया कि भले ही सरकार ने लॉक डाउन में हमें घर से काम करने की अनुमति थी मगर कोरोना के समय निगम बंद होने के कारण हमें कलेक्टर ऑफिस से अतरिक्त भार संभालने को मिला. उन्होनें बताया कि उन्हें लॉक डाउन के समय प्रतिदिन जयपुर में क्वारंटाइन किया गए लोगों की सूचि बना कर विभाग को भेजिनि होती थी, जब तक लॉक डाउन रहा तो पति भी घर पर थे इसलिए नवजात बच्चे की देख भल में दिक्कत नहीं हुई, मगर अनलॉक के पहले फेज से ही निगम से उन्हें काम पर बुलाया जाने लगा जबकि उनका घर कन्टेनमेंट जोन में आता था इतना ही नहीं कलेक्टर ऑफिस ने उस वक़्त भी उन्हें क्वारंटाइन लोगो की सूचि बनाने के काम से अलग नहीं किया बल्कि ये ज़ोर बना रहा कि वो प्रतिदिन की तरह उन हैं सूचि बनाकर सौंपती रहे.

इनकी एक ही दरख्वास्त है कि जब सरकार 10 ये 20 प्रतिशत कर्मचारियों को दफ्तर बुलाकर काम करवा रही है तो उस वक़्त उन्हें महिला कर्मचारियों को अतिरिक्त भार से मुक्त करना चाहिए और हो सके तो उन्हें घर से काम करने की सुविधा दी जाए.

मुंबई की एक प्रसिद्ध इंजीनियरिंग कॉलेज की प्रोफेसर सोनम ने तर्कसंगत से बात करते हुए बताया कि उन्हें इस लॉक डाउन के समय ऑनलाइन क्लासेज लेने पड़ रहे हैं. उनकी भी एक छोटी बच्ची है, जिसकी देखभाल उन्हें घर में रहते हुए करनी है होउस मेड पहले से ही काम पर नहीं आ रही, और बच्चों के प्ले हाउस पहले से ही बंद हैं इस बीच घर में रहकर बच्चे की देखभाल और कॉलेज के रूटीन के मुताबिक ऑनलाइन क्लास लेना इतना आसान नहीं है जितना कहने या सोचने ये सुनने में लग रहा है.

ये कुछ ऐसी मुशीलें हैं जो हमारी महिलाएं बीते चार से पांच महीन में झेलती आ रही हैं, मगर घर की चार दीवारी में रह कर घर और भारत की शिक्षा, अर्थव्यवस्था में इनका योगदान नज़रअंदा हुआ जा रहा है.

दिल्ली की एक प्राइवेट बैंक में काम करने वाली रंजना बताती हैं कि उनके पति और वो दोनों ही बैंक कर्मचारी हैं उनका एक एक साल से छोटा बच्चा है. बैंक में काम करने के कारण उनके पति को छुट्टी तो लॉक डाउन में भी नहीं थी मगर चूँकि उस समय उनकी नौकरी नहीं लगी थी तो घर पर वो बच्चे का देख भाल कर लेती थी, सौभाग्यवश कुछ दिनों में उनकी नौकरी लग गयी और घर से काम करने की सहूलियत भी थी मगर अब बैंक की और से दफ्तर आने का ज़ोर बढ़ता जा रहा है, काम वाली आती नहीं है, प्ले ग्रुप बंद हैं और खुलने पर भी बच्चे को बाहर छोड़ने का खतरा वो नहीं ले सकती, ऐसे में उनके बिल्डिंग में मकान मालिक कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं जिसके बारे में बैंक में बताने पर उनके सीनियर का कहना है कि किसी को इस बारे में न बताएं और बैंक आना शुर कर दें. मगर  जब उन्होनें ऐसा करने में असमर्थता बताई तो उन्हें पंद्रह दिन की सैलरी कटौती पर घर पर रहने की अनुमति मिली.

कुल मिलाकर देखा जाए तो हमारे कामकाजी, घरेलु महिलाएं इस समय काफी मुश्किलों  से गुज़र रही हैं, इस बाच सरकार कम से कम अपने नीति में बदलाव कर महिलाओं को दफ्तर आने से छूट मिले तो इनके लिए भी ज़िंदगी आसान हो जाए. इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि आम समय में भी हमारी घर,  समाज की महिलाएं घर और दफ्तर के अपने  कर्तव्यों को पूरा करने में कोई कस्र नहीं छोड़ती और न ही उसके लिए कोई स्पेशल ट्रीटमेंट चाहती हैं. तो कम से कम इस महामारी के दौरान भी वो अपने कर्त्वयों से मुंह नहीं मोड़ रही हैं तो सरकार और हमें उनके द्वारा झेली जा रही मुश्किलों पर ध्यान दे कर उन्हें राहत देनी चाहिए.

इस परेशानी को देखते हुए अनिल धेनवाल आजाद समाज पार्टी भीम आर्मी के प्रदेश अध्यक्ष ने Change.Org पर एक पेटिशन शुरू की है जिसके मार्फत वो सरकार का ध्यान महिलाओं की इन्हीं मुश्किलों पर खींचना चाहते हैं. आप उस पेटिशन पर यहाँ क्लिक कर के अपने सिग्नचर कर ज़रिये महिलाओं की इन मुश्किलों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करने में मदद कर सकते हैं.

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