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ईरान ने चाबहार प्रोजेक्ट से भारत को किया बाहर, क्या अब चीन के हाथ में जायेगा प्रोजेक्ट?

तर्कसंगत

Image Credits: Navjivanindia/Naidunia

July 15, 2020

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ईरान ने चाबहार पोर्ट को अफगानिस्तान से सटी अपनी सीमा के नजदीक जाहेदान को जोड़ने वाले बेहद अहम रेल लाइन प्रॉजेक्ट (Chabahar-Zahedan Rail Project) से भारत को अलग करने का ऐलान किया है। नवभारत टाइम के अनुसार नई दिल्ली की तरफ से फंडिंग में देरी का हवाला देते हुए तेहरान ने इस प्रॉजेक्ट को अब अकेले पूरा करने का फैसला किया है। भारत के लिए यह तगड़ा झटका है लेकिन सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि रेल लाइन चाबहार पोर्ट प्रॉजेक्ट का ही हिस्सा है और भारत फंडिंग और इसे पूरा करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

माना जा रहा है कि अमेरिकी दबाव में जब से भारत ने ईरान से तेल खरीदना बंद किया है उसी समय से दोनो देशों के रिश्तों में तनाव घुलने लगा था। अब ईरान ने इसका जवाब चाबहार से जाहेदान तक की महत्वपूर्ण रेल परियोजना से भारत को बाहर करके दिया है। इससे भारत की परेशानी की दो वजहें हैं। एक तो अफगानिस्तान के रास्ते मध्य एशियाई देशों तक कारोबार करने की भारत की रणनीति को गहरा धक्का लगा है।

अख़बार द हिंदू की एक ख़बर के मुताबिक़ ईरान ने अपने आप ही इस प्रोजेक्ट को पूरा करने का फ़ैसला लिया है और इस पर काम शुरू भी कर दिया है। 628 किलोमीटर लंबे इस रेल मार्ग को बिछाने का काम बीते हफ्ते शुरू हो गया है।

ईरान के यातायात और शहरी विकास मंत्री मोहम्मद इस्लामी ने इसका उद्घाटन किया है। ईरानी अधिकारियों ने द हिंदू अख़बार को बताया है कि ये पूरा प्रोजेक्ट मार्च 2022 तक पूरा कर लिया जाएगा। इसके लिए अब ईरान के नेशनल डेवलपमेंट फंड का इस्तेमाल किया जाएगा।

चाबहार परियोजना भारत के लिए रणनीतिक तौर पर एक महत्वपूर्ण परियोजना रही है जिसके तहत भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय यातायात मार्ग स्थापित करना चाहता है।

2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तेहरान दौरे के वक्त इंडियन रेलवे कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (IRCON) और ईरानी रेलवे ने इस रेल लाइन को बनाने के लिए एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर दस्तखत किए थे। इसे भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच त्रिपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के मकसद से किया गया था।

 

भारत के लिए क्या थी अहमियत

चाबहार पोर्ट से भारत ईरान का व्यापारिक रिश्ता जोर पकड़ रहा है। 2017 में भारत ने इसी पोर्ट के लिए अफगानिस्तान को मदद के तौर पर गेहूं की खेप भेजी थी। पिछले साल अफगानिस्तान ने भी चाबहार के जरिए पहली बार सूखे फलों, कॉटन, कार्पेट आदि की 570 टन की खेप भारत भेजी थी। रेलवे लाइन बन जाने से माल की आवाजाही और ज्यादा आसान हो जाएगी और इसमें तेजी आएगी। चाबहार पोर्ट सिर्फ भारत की अफगानिस्तान नीति और अफगान में पाकिस्तान की घुसपैठ को कम करने के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि जिस रेल प्रोजेक्ट से भारत को अलग किया गया है वह भविष्य में भारतीय उत्पादों को रेल मार्ग से यूरोप तक बहुत ही कम समय में और कम लागत पर भेजने का काम करने वाला था।

 

अमरीकी प्रतिबंध का डर

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की तरफ से इंडियन रेलवेज़ कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (इरकॉन) को इस रेल ट्रेक के निर्माण में शामिल होना था. ये भारत-अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के बीच हुआ समझौता था।

इरकॉन ने ईरानी रेल मंत्रालय के साथ एमओयू साइन किया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, इरकॉन ने इस रेल प्रोजेक्ट के लिए सभी सेवाएं, सुपरस्ट्रक्टर वर्क और आर्थिक सहयोग (करीब $1.6 अरब) देने का वादा किया था।

जानकारों के मुताबिक़ इरकॉन के इंजीनियर कई बार साइट पर गए और ईरानी रेलवे ने तैयारी भी कर ली थी, लेकिन भारत ने कभी काम शुरू नहीं किया। जानकारों का मानना है कि इसके पीछे ज़ाहिर तौर पर अमरीका की ओर से प्रतिबंध लगाए जाने का डर था।

प्रॉजेक्ट के लिए भारत को स्टील चाहिए लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से इसमें देरी हो रही है। चाबहार पोर्ट को तो भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों से छूट दिला दी है लेकिन रेल प्रॉजेक्ट में ऐसा नहीं हो पाया है। ईरान ने पिछले हफ्ते ट्रैक बिछाने के काम का उद्घाटन किया और प्रॉजेक्ट को मार्च 2022 तक पूरा करने की उसकी योजना है। अब उसने भारत से फंडिंग के बिना अकेले ही प्रॉजेक्ट पर आगे बढ़ने का फैसला किया है।

 

ईरान की चीन से नज़दीकी

ईरान ने संकेत दिए है कि समूचे चाबहार सेक्टर में चीन की कंपनियों को बड़ी भागीदारी निभाने का रास्ता साफ किया जा सकता है। ईरान ने कुछ दिन पहले ही चीन के साथ एक समझौता किया है जिसके तहत वहां चीनी कंपनियां अगले 25 वर्षो में 400 अरब डॉलर का भारी-भरकम निवेश करेंगी। इसके बदले में चीन ईरान में एयरपोर्टों, हाई-स्पीड रेलवेज, सबवेज, बैंकिंग और 5 G टेलिकम्यूनिकेशन को विकसित करने में मदद करेगा। ईरान ने खुद ही पिछले साल चीनी द्वारा चलाए जा रहे पाकिस्तानी ग्वादर पोर्ट और चाबहार के बीच टाई-अप का प्रस्ताव दिया था। साथ ही चाबहार ड्यूटी फ्री ज़ोन के लिए भी ऑफर दिया था।

बीबीसी से बात करते हुए ईरान के लिए पूर्व राजदूत के सी सिंह कहते हैं, ईरान सोच रहा है कि जब वो फंसा हुआ है, उसकी अर्थव्यवस्था को अमरीका ने पूरी तरह जकड़ा हुआ है, तब आप उसकी मदद नहीं कर रहे। फिर वो कैसे आपको चाबहार का सेफ़ खोलकर दे दे। अब अगर चीन उसके साथ लंबा समझौता कर रहा है, उसे पैसे दे रहा है तो वो चीन के साथ क्यों नहीं जाएगा।”

उनका कहना है कि “ऐसे प्रोजेक्ट तभी बनते हैं जब दोनों के बीच रिश्ते सही हों। अगर ईरान महसूस करता है कि आप अमरीका से डरकर उससे बात नहीं कर रहे तो वो आपके साथ प्रोजेक्ट क्यों करेंगे। अगर उनको चीन का पैसा मिल गया है, तो चीन के पैसे से पूरा कर लेंगे प्रोजेक्ट।”

 

सचेत होने का समय

ईरान पर चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के कान खड़े करने वाले हैं। पेइचिंग भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार में सड़कें और गलियारा बना रहा है। पाकिस्तान के बाद अब नेपाल भी उसके इशारों पर काम करता दिख रहा है। अब ईरान में उसका भारी-भरकम निवेश क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने की उसकी विस्तारवादी नीति को ही आगे बढ़ा रही है।

ईरान द्वारा भारत को चाबहार से जाहेदान तक की महत्वपूर्ण रेल परियोजना से बाहर करने पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ट्वीट कर कहा, “भारत की वैश्विक रणनीति की धज्जियां उड़ रही हैं। हम हर जगह शक्ति और सम्मान खो रहे हैं और भारत सरकार को पता नहीं है कि क्या करना है।”

 

 

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