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झारखंड के 7 लाख किसानों को केंद्र सरकार से मिली मायूसी, खारिज हुआ सूखा राहत का प्रस्ताव

तर्कसंगत

Image Credits: Financialexpress/Twitter/TV9

July 20, 2020

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झारखंड सरकार को केंद्र सरकार ने बड़ा झटका दे दिया है। केंद सरकार ने झारखंड सरकार की ओर से किसानों को राहत देने के लिए राज्य के सात जिलों के 55 ब्लॉकों को सूखाग्रस्त घोषित करने के लिए भेजे गए प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

इसके साथ ही प्रदेश में सूखा राहत पर राजनीति शुरू हो गयी है। सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने पूर्ववर्ती भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

सूखे की मार झेल रहे राज्य के सात लाख किसानों की मुआवजा मिलने की उम्मीदें धूमिल हो गई है। अब इन किसानों को सरकार की ओर से कोई राहत नहीं मिल पाएगी।

 

सात जिलों के लिए भेजा था प्रस्ताव

हिंदुस्तान टाइम्स  के अनुसार आपदा प्रबंधन विभाग के संयुक्त सचिव मनीष तिवारी ने बताया कि सरकार ने अप्रैल में राज्य के बोकारो, चतरा, पाकुड़, देवघर, गिरिडीह, गोड्डा और हजारीबाग जिले के 55 ब्लॉकों को सूखा क्षेत्र माना था।

इस पर सरकार ने इन ब्लॉकों को सूखाग्रस्त घोषित करते हुए यहां के साल लाख किसानों को राहत देने का प्रस्ताव तैयार कर मई में केंद्र सरकार को भेजा था, लेकिन अब केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

अप्रैल, 2020 में झारखंड सरकार ने राज्य के 7 जिलों (बोकारो, चतरा, पाकुड़, देवघर, गिरिडीह, गोड्डा और हजारीबाग) के 55 प्रखंडों को सूखाग्रस्त घोषित करने का प्रस्ताव कैबिनेट में पास किया। मई के महीने में राज्य आपदा प्रबंधन विभाग ने इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार को भेजा। राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के संयुक्त सचिव मनीष तिवारी ने रविवार को कहा, ‘हमने केंद्र को प्रस्ताव भेज दिया था, लेकिन उसने इसे रद्द कर दिया है।’

प्रक्रिया समाप्त होने के बाद भेजा प्रस्ताव

केंद्र के अधिकारियों ने बताया कि राज्यों द्वारा सूखाग्रस्त घोषित करने की प्रक्रिया 31 अक्टूबर, 2019 को समाप्त हो गई थीं और झारखंड सरकार ने उसके बाद प्रस्ताव बनाकर भेजा था। ऐसे में केंद्र सरकार ने उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

 केंद्र सरकार के नियम के मुताबिक, तीन ऐसे पैमाने हैं, जिसके आधार पर ही राज्य किसी क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित कर सकता है। ये तीन पैमाने हैं : (1) वर्षा, (2) फसल, रिमोट सेंसिंग, मिट्टी में नमी और हाइड्रोलॉजी और (3) सत्यापन यानी जमीनी हकीकत।

राज्य सरकार से कहा गया था कि वह सभी प्रक्रिया को पूरा करते हुए 31 अक्टूबर, 2019 तक सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित करने के लिए अपना प्रस्ताव कैबिनेट से पास कराकर केंद्र सरकार को भेजे। नियमों के मुताबिक, राज्य सरकार को सूखा क्षेत्र घोषित करने के बाद केंद्र सरकार से मदद मांगनी होती है। राज्य सरकार के दावे के आधार पर केंद्र सरकार की एक टीम राज्य का दौरा करती है और सूखे के हालात की जमीनी हकीकत देखने के बाद केंद्रीय मदद की सिफारिश करती है।

 

मुआवज़ा मिलने की कोई उम्मीद नहीं

यह पूछे जाने पर कि अब किसानों को फसल के नुकसान का मुआवजा कैसे मिलेगा, श्री तिवारी ने कहा, ‘आपदा प्रबंधन विभाग किसी को मुआवजा नहीं दे सकता, क्योंकि उसे केंद्र सरकार से इसका फंड मिलता है। यदि हमें केंद्र से फंड ही नहीं मिलेगा, तो हम किसानों को मुआवजा कैसे दे सकते हैं?’

केंद्र सरकार की ओर से प्रस्ताव को रद्द कर दिये जाने के बाद राज्य सरकार भी किसी राहत पैकेज की घोषणा नहीं कर पायेगी, क्योंकि क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित करने का प्रस्ताव ही खारिज हो गया है। इसलिए पैकेज को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकेगा।

सूखाग्रस्त क्षेत्र बोकारो के 45 वर्षीय किसान राहू महतो ने कहा कि उन्होंने अपनी फसल के नुकसान का मुआवजा मिलने की उम्मीद बहुत पहले ही छोड़ दी थीं। उन्होंने कहा कि उनकी फसलें गत वर्ष अगस्त-सितंबर में खराब हुई थी, लेकिन सरकार ने उसके मुआवजे के लिए इस साल मई में प्रस्ताव बनाकर भेजा है।

उन्होंने दो एकड़ में चावल की फसल बोयी थी, लेकिन बारिश की कमी के कारण वह खराब हो गई। अब कोई उम्मीद नहीं है।

रामगढ़ के किसान कहते हैं कि पिछले साल अगस्त-सितंबर में हमारी फसल बर्बाद हो गयी। लेकिन, सरकार ने अप्रैल, 2020 में केंद्र सरकार को मदद का प्रस्ताव भेजा। हमारी फसल को हुए नुकसान के मुआवजे की हमने उम्मीद ही नहीं पाली थी। हमने धान की खेती की थी, लेकिन पर्याप्त वर्षा नहीं होने की वजह से मेरी पूरी फसल बर्बाद हो गयी। एक तो राज्य सरकार ने देरी से प्रस्ताव भेजा, अब केंद्र ने उसे रद्द भी कर दिया। ऐसे में हमारी सुनने वाला कोई नहीं है।

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का भाजपा पर आरोप

राज्य की सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के महासचिव सुप्रीयो भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि पिछली भाजपा सरकार ने न तो सूखे की घोषणा की और न ही सूखे की सिफारिश करने की समय सीमा का ध्यान रखा। ऐसे में समय सीमा समाप्त होने के बाद प्रस्ताव भेजा गया। उन्होंने कहा कि उस दौरान चुनाव का समय था तो तत्कालीन भाजपा सरकार इसकी ब्रांडिंग में लगी हुई थी। किसान भाजपा सरकार की प्राथमिकता सूची में थे ही नहीं।

भाजपा का सत्ताधारी पार्टी पर आरोप

झारखंड भाजपा के प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने किसानों के नुकसान के लिए वर्तमान झामुमो-कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने के कारण सूखा प्रस्ताव केंद्र को नहीं भेजा जा सका था। जनवरी में आचार संहिता हटने के बाद वर्तमान सरकार ने इसका अनुसरण किया होगा। अगर हेमंत सोरेन सरकार ने जनवरी या फरवरी में प्रस्ताव भेजा होता तो किसानों को नुकसान नहीं होता।

तर्कसंगत का तर्क

इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक दोषरोपण के बजाय केंद्र और राज्य सरकार को इस बार पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि अब जब समय सिमा गुज़र चुकी है तो किस प्रावधान के अंदर इन 7 जिलों के किसानों को सूखे का मुआवज़ा दिया जा सके। सिस्टम की लचर व्यवस्था हो या कागज़ी करवाई में हुई देरी नुक्सान किसानों का ही होने जा रहा है। झारखण्ड पहले से ही देश का अत्यधिक पिछड़ा राज्य रहा है। यहाँ के किसानों को कई सारी तकलीफों और परेशानियों से गुजरना पड़ता है। उसके बाद सूखे की मार इनकी कमर तोड़ देती है। फिर वर्ष से कोरोना किसानों मजदूरों की हालत और भी खराब है।

राजनीतिक इच्छाशक्ति अगर सही से रही तो किसानों को मदद मिलने में देरी नहीं होनी चाहिए, नियमों में आंशिक बदलाव कर राज्य और केंद्र किसानों की भलाई के लिए कदम उठा सकती है। हम ये उम्मीद करेंगे कि किसानों की भलाई और सूखे की मार से उन्हें बचाने के लिए सरकार तुरंत ही कोई उपाय निकाले।

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