सप्रेक

मिलिए जयपुर के सोनू सूद से, जिन्होंने दिल्ली में रहकर लॉकडाउन में की 8 लाख से ज़्यादा लोगों की मदद!

Sonali

July 20, 2020

SHARES

आप जन्मदिन पर क्या करते हैं?

मैंने अक्सर लोगों को पार्टी करते, वेकेशन मनाते और शॉपिंग करते देखा हैंं। हाँ, कुछ एक ऐसे भी होते हैं जिन्हें सोशल वर्क और डोनेशन से ख़ुशी मिलती हैं। वे दूसरों की ज़रूरतें पूरी कर उसी में अपनी ख़ुशी और सुकून खोज लेते हैंं। ऐसे ही एक व्यक्ति ललित मीणा भी हैं जिन्होंने दूसरों की मदद करने में अपनी सारी जमा पूँजी लगा दी। 

जयपुर के रहने वाले 23 वर्षीय ललित और उनकी बहन निधि को यह गुण अपने माता-पिता से मिली थी — दूसरों की निःस्वार्थ हो कर क्षमतानुसार मदद करना। “मैं अक्सर अपने माता-पिता के साथ लोगों की सहायता वास्ते जाता था। मैंने कभी भी उन्हें किसी को मदद के लिए इंकार करते नहीं देखा — चाहें किसी मज़दूर ने घर आकर पानी/ खाना माँगा हो या बाहर किसी ने पैसे या कपड़े — मैंने हमेशा उन्हें लोगों की निःस्वार्थ भाव से मदद करते देखा हैं,” ललित तर्कसंगत से हुए एक वार्तालाप में बताते हैंं। “अक्सर लोग कहते हैंं कि जेब काट कर किसी की मदद नहीं करनी चाहिए, लेकिन अगर थोड़ी सी जेब काटने से किसी का भला हो सकता हैंं तो रुकना भी नहीं चाहिए,” ललित अपने पिता की कही इस बात में काफी विश्वास रखते हैंं। 



 

“पहले मैं जितना कमाता था, ख़र्च कर देता था लेकिन वक़्त के साथ एहसास हुआ कि आंतरिक ख़ुशी दूसरों को ख़ुश करके मिलती हैंं,” ललित आगे कहते हैं। “अचानक लॉकडाउन हो जाने से मैं घर नहीं जा सका लेकिन मुझे यह भी समझ आ रहा था कि इस अचानक हुई बंदी से काफ़ी लोगों को नुकसान और परेशानियों को सामना करना पड़ेगा। इसलिए मैंने पहले ही दिन से डोनेशन ड्राइव करने का फ़ैसला किया। विचार यह था कि इसे तब तक कायम रखा जाए जब तक कि सरकारी मदद शुरू न हो जाए लेकिन अफ़सोस, ना तो सरकारी मदद आयी और ना ही उन्होंने हमारी की हुई अर्जियों को सुना। परिणामस्वरूप यह डोनेशन ड्राइव 100 दिनों से भी ज़्यादा चली और 8 लाख़ लोगों की मदद में लगी और वक़्त के साथ भोजन की सहायता के अतिरिक्त और कई काम करने लगी।”

ललित बताते हैंं कि शुरुवात में वे लोगों को राशन आदि दे कर मदद करते थे लेकिन उन्हें जल्द ही अहसास हुआ कि उन्हें पकाये हुए खाने का इंतज़ाम करना होगा क्योंकि इस हालात में सबके पास गैस स्टोव या चूल्हे की व्यवस्था नहीं होगी। अंजान शहर में उनके लिए यह थोड़ा मुश्किल था लेकिन उन्होंने फिर भी हार नहीं मानी और एक रसोई की तलाश में लग गए। उन्हें एक रेस्टोरेंट मालिक, गुरप्रीत सिंह, के बारे में ख़बर मिली जिनकी राजौरी गार्डन में ‘सरदार जी  चिकन कार्नर’ के नाम से रेस्टोरेंट हैं। उनसे बात करने पर ललित को पता चला कि वे पहले से ही हर दिन 10-20 खाने की पैकेट लोगों में बांट रहे थे। इसलिए उन्होंने साथ मिलकर काम करने का फ़ैसला किया क्योंकि अंतिम लक्ष्य लोगों की मदद करना था। 


 


शुरुवात के दो दिन 500 लोगों को खाने के पैकेट बांटे, तीसरे दिन 1,500 और चौथे दिन से आनंद विहार में 10,000 लोगों को खाना बांटने लगे। एक वक़्त ऐसा भी हुआ जब वे दिन में करीब 21,000 लोगों को खाना बांट रहे थे। इसके अलावा रसोई से खाना ले जाने वालो की संख्या अलग ही थी। औसतन हर दिन कम से कम 15,000 लोगों का पेट तो भरा ही जा रहा था। 

विचार यह किया गया था कि जब तक सरकारी मदद सबके पास पहुँचनी शुरू नहीं हो जाती तब तक ललित और गुरप्रीत सबकी मदद करते रहेंगे मगर दुर्भाग्यवश सरकार की मदद किसी के पास कभी पहुँची ही नहीं और इन दोनों ने एक हफ़्ते के लिए सोचा यह नेक कार्य 100 दिनों से ज़्यादा चलाया। 

“हमने सरकार से मदद की अपील की थी। जितने नेताओं से, हो सका, मदद की गुज़ारिश भी की लेकिन किसी ने हमारी मदद नहीं की। हमने आम आदमी पार्टी के नेता, खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री, इमरान हुसैन से भी मदद की अपील की, उनके दफ़्तर में भी बात की लेकिन हमें कभी उनसे जवाब मिला ही नहीं। वे लोग हमारा मैसेज देख कर छोड़ देते थे। जितने बड़े लोग, दफ़्तर थे, सभी जगह मदद के लिए पूछा लेकिन किसी ने मदद नहीं की। हम कई ऐसे जगह भी खाना बांटने जाते जहाँ अरविंद केजरीवाल जी का नाम बैनर में लिखा होता पर खाना असल में हम बांट रहे होते और लोगों को लगता कि उनकी तरफ से खाना बांटा जा रहा हैं। जब हमने वहाँ के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने कहा कि हमसे जितना हो सकता हैं करे वरना छोड़ दे, वे हमें राशन नहीं दे सकते हैं,” ललित दिल्ली सरकार का हाल हमें बयां करते हुए कहते हैं। 


 


सरकार की मदद तो नहीं मिली लेकिन कुछ अधिकारियों ने उनका साथ ज़रूर दिया। दिल्ली के किसी डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर का उन्हें जवाब नहीं आया था लेकिन सेंट्रल दिल्ली के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ने उनकी सुनी और उन्हें करोल बाग के SDM अंकुर मेश्राम से कनेक्ट करवाया जिन्होंने फिर दिल्ली ट्रेड एसोसिएशन के प्रेसिडेंट से ललित की बात करवाई। ललित को एक लोकल ट्रेडर से जोड़ा गया जिनके पास से वे भरपूर मात्रा में राशन ख़रीद सकते थे। “अगर हम छोटे दुकानों से राशन लेते तो बाकि लोगों के लिए कुछ नहीं बचता। हम दिन के कम से कम 350 KG चावल और 150-200 KG दाल लेते थे और लोकल दुकानों से लेने का मतलब था अव्यवस्था को बढ़ावा देना,” ललित आगे कहते हैं। इसके अलावा उन्हें केंद्रीय दिल्ली और दक्षिण पूर्व दिल्ली डीसीपी ने भी मदद की। 

सोनू सूद से प्रेरित होकर उन्होंने भी लोगों को घर भेजने का सोचा। “हम लोगों को कब तक खिला पाते इसलिए उन्हें घर भेजने का निश्चय किया ताकि वे आराम से अपने घरों में अपने लोगों के साथ रह सके”, लेकिन जब SDM साहब ने उन्हें सेंट्रल दिल्ली के तहसीलदार से जोड़ा तो उन्होंने बोला कि बस की अनुमति नहीं मिल रही अभी। “लेकिन हमने हार नहीं मानी और लोगों को स्पेशल ट्रेनों से घर भेजने लगे। चूकि श्रमिक ट्रेनों की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया काफ़ी लंबी थी, हमने ख़ुद से लोगों को स्पेशल ट्रेन, फ्लाइट, और बस द्वारा भेजना शुरू किया,” ललित बताते हैं। 



दिक्कतें काफ़ी आ रही थी लेकिन कहते हैं न कि जब कोई नेक काम करना चाहता हैं तो चीज़े अपने आप ठीक होने लगती हैं। इन सभी के बीच सिर्फ़ एक नेता ने ललित की मदद की और वो थे परवेश साहिब सिंह वर्मा। उन्होंने ललित को 3,000 KG चावल और 1,500 KG दाल डोनेट किये जिनसे ललित हफ्ते भर लोगों को पेट भर खाना खिलाने में सक्षम रहे। ऐसा नहीं कि खाना बांटने की प्रक्रिया दिन में एक ही बार होती थी। ललित बाक़ायदा तीनों टाइम अलग अलग सब्ज़ी के साथ लोगों को दाल-चावल परोसते थे। इसके अलावा कभी खीर, कभी सीरा, कभी फल तो कभी ठंडी दूध रूहाफ्ज़ा में मिलाकर दी जाती थी। बच्चों के लिए अलग से पीने को दूध भी उपलब्ध कराया जाता था। 

कई बार उनको लोग राशन, दूध, चीनी आदि डोनेट कर देते थे। प्रसिद्ध कलाकार वरुण ग्रोवर ने भी उनके इस नेक काम को कई बार ट्विटर पर सराहा। इसके अलावा सोनू सूद ने भी उनके काम की काफ़ी तारीफ़ की जिससे लोगों को और जानकारी मिलती गयी। 



समय के साथ उनको सिर्फ़ दिल्ली ही नहीं, देश भर से मदद के लिए कॉल आने लगे। जम्मू, जयपुर, दक्षिण भारत, बिहार, हर जगह से लोग उन्हें कॉल करते, और सिर्फ कोरोना संबंधित ही नहीं, और भी कई सारी समस्याओं के लिए मदद मांगते थे। “मुझे रात के दो-तीन बजे लोगों के कॉल आते जो चिंता विकार (anxiety disorder) से ग्रसित हैं। कितनों को आत्मघाती विचार (suicidal thoughts) भी आते थे। मैंने हर तरीके से लोगों की मदद करने की कोशिश की,” ललित ने कहा। 

और निश्चित रूप से ललित ने हर तरीके से मदद करने की कोशिश की। उन्होंने खाना बांटने के अलावा, लोगों को कपड़े, मास्क, स्वच्छता के उत्पाद, सब बांटे — लोगों को घर भेजा, अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे दिए, और मौखिक रूप से भी लोगों की बात सुनी। 

 

लॉकडाउन शुरू होने के पहले ही दिन से ललित और गुरप्रीत ने अब तक — 

  • 6,75,000+ से ज़्यादा लोगों भोजन कराया हैं
  • कई लोगों को आर्थिक रूप से सहायता कर रोड/ रेल/ फ्लाइट के माध्यम से घर भेजा
  • हाईवे पर प्रवासियों को भोजन, पानी, रूहअफजा, केला, बिस्कुट, चप्पल आदि उपलब्ध कराया
  • दिल्ली की जलजलाती गर्मी में भी 30,000+ गिलास रूहअफजा और हज़ारों लोगों के लिए ख़ीर बांटी और नित दिन खाना खिलाया  
  • 1000 से भी ज़्यादा कपड़े और 10,000 से भी ज़्यादा मास्क वितरित किए
  • हर दिन जानवरों को खाना खिलाते, कुत्तों के लिए चिकन चावल, गायों के लिए चारा और बंदरों के लिए केले
  • अनगिनत परिवारों को राशन दिया  
  • हर कुछ दिनों में स्वाद बदलने के लिए फल, बच्चों के लिए दूध और बाकियों के लिए पानी शामिल किया
  • साबुन/ टूथपेस्ट/ आदि आवश्यक वस्तुएं बांटी
  • दिल्ली पुलिस में 3000 वाटर बोतल वितरित किया 
  • विभिन्न राज्यों में फंसे लोगों की मदद की, उन्हें राशन उपलब्ध कराया और कई लोगों को अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए आर्थिक सहायता की

 

ललित कहते हैं कि भले ही सरकार ने उनकी मदद नहीं की लेकिन आम जनता ने उनकी खूब सहायता की। ललित को अपने करीबी लोग और ऑनलाइन डोनेशन से लगभग 4-5 लाख रूपये मिल गए, इसके अलावा उन्होंने अपनी सारी जमा पूँजी लगा दी और साथ ही गुरप्रीत ने भी अपने किचन और कर्मियों के अलावा 50% राशि का दान दिया। जनाधार पर जन सेवा करने वाले ललित कहते हैं, “क्योंकि करने की कोशिश करी तो सारी चीज़ें लाइन अप होती गयी। सही काम था तो लोग भी सही मिलते गए।” वक़्त के साथ दिल्ली सरकार ने भी उनकी मदद करना शुरू कर दिया। 



ललित को अपने इस काम के लिए SDM साहब से ‘लेटर ऑफ़ अप्प्रेसिअशन’ भी मिला और साथ ही अनगिनत लोगों की दुआएँ। लेकिन अंतिम दिनों में उनमे और गुरप्रीत में कोरोना के लक्षण पाए गए और दोनों ने ही ख़ुद को सेल्फ क्वारंटाइन करने का फ़ैसला किया। टेस्ट के बाद गुरप्रीत पॉजिटिव और ललित नेगेटिव निकले जिसके बाद उनको सेवा कार्य घर तक सीमित करना पड़ा। साथ ही एक NGO को  थोड़े पैसे और राशन दे दिया जो इस काम को ज़मीनी स्तर पर आगे बढ़ा पाते। ललित डोनेशन में प्रोमोशन नहीं पसंद करते। हाँ, लेकिन जिस प्रोमोशन से लोगों की और सहायता हो सके उसके लिए मना भी नहीं करते। उनके मानना हैंं कि सेवा कार्य बिना किसी सराहना या उम्मीद के करनी चाहिए। 100 दिन पूरे होने पर और संसाधन ख़त्म होने पर उन्हें काम बंद करना पड़ा लेकिन अभी भी उन्हें रोज़ रक्त, प्लाज्मा, राशन, यात्रा या कोई और अनुरोध आते रहते हैं। 



ललित अभी अपनी आगामी यूपीएससी परीक्षा की तैयारी में लगे हुए हैं और लोगों को आगे भी मदद की अपील करते हैंं। आगे वे ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं और साथ ही NGO शुरू कर पंजीकरण भी करना चाहते हैं। राहत कार्य में उनकी मदद करने के लिए उनसे उनके फेसबुक, ट्विटर, या फ़ोन (7014199132) द्वारा संपर्क कर सकते हैंं। देश को ललित जैसे और कई युवाओं की ज़रूरत हैं!

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...