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लॉकडाउन में गरीबों का पेट भरने से लेकर लावारिसों लाशों को कन्धा देने तक का काम कर रहे हैं दीपक और वर्षा

Nikhil Sahu

July 24, 2020

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अक्सर आप सड़क किनारे, चौराहों पर, पार्को में लावारिस लोगों को देखते होंगे और नजर घुमा लेते होंगे, लेकिन लखनऊ के रहने वाले वर्षा वर्मा और दीपक महाजन ऐसा नहीं करते। ये अपने एनजीओ द्वारा लावारिस लोगों की सेवा का काम कर रहे हैं। ये लोग सड़कों पर पड़े लावारिस लोगों के इलाज से लेकर उनकी मौत के बाद अंतिम संस्कार कराने का काम कई वर्षों से करते आ रहे हैं। लॉकडाउन के बीच ही इन लोगों ने करीब 20 लोगों का अंतिम संस्कार किया है।

दीपक महाजन रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारी है। पत्नी भी एग्रीकल्चर विभाग में तैनात है। वो बताते है कि “एक दिव्य कोशिश” एनजीओ से 2014 में जुड़े थे। बेटियो ने उनके इस काम को हमेशा सपोर्ट किया है।

 



 

वर्षा वर्मा नैशनल जुडो प्लेयर भी रही है। वो बताती है, उनकी स्कूलिंग और यूजी की पढ़ाई शहर के कई कॉलेजों से हुई है। एक 9 साल की बेटी है। उनके पति पी डब्लू डी में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर तैनात हैं। वो खुद एक हाउस वाइफ होन के साथ साथ एक सोशल वर्कर भी है। वो बताती है कि लोगो ने एनजीओ सेक्टर को बदनाम कर दिया है। पैसा कमाने का जरिया बना लिया है। लेकिन हम ऐसा नही करते।

वर्षा तर्कसंगत को बताती हैं कि उन्हें हमेशा कुछ अलग करने की चाहता थी और इसी चाहत के साथ साथ लोगों की मदद करना भी चाहती थी। वर्षा और दीपक लखनऊ और आसपास के क्षेत्र के ऐसे असहाय गरीब निराश्रित लोग जो सड़कों पर रहने के लिए मजबूर हैं, जिनका कोई नहीं है, जो नजाने कितनी बीमारियों से ग्रसित होते हैं। ऐसे लोगों को सरकारी अस्पताल में एडमिट कराने से लेकर नहलाना-धुलाना, अपने हाथों से खाना खिलाना और मल मूत्र साफ करने तक का काम करते हैं। जब वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाते हैं तो उनको लखनऊ के ही किसी शेल्टर होम में भर्ती करवा देते हैं।



 

वर्षा वर्मा बताती हैं कि जब पहली बार किसी लावारिस को कंधा दिया था तो समाज के कई लोगों ने रोका, खास तौर पर महिलाओं ने, ये सभी लोग समाज की दुहाई देने लगे। एक लड़की कभी कंधा नही देती, या वो ये क्यों कर रही है। इतना ही नही आसपास के लोग एक अलग ही निगाहों से देखते थे। तरह तरह की बाते बोलते थे। “लोग कहेंगे लोगो का काम है कहना” ये बोलते हुए वो बताती है कि बचपन में स्कूल से आने के बाद घंटा दो घंटा सरकारी अस्पतालों में जाकर गरीब या जिनका कोई तीमारदार नही होता ऐसे मरीजो की छोटी-मोटी सेवाएं देती थी उसी को अब बड़े रूप में कर पा रही हूं। उनका कहना है समय रहते मैंने इस चीज को जान लिया था कि असली सुख पैसा कमाने, होटल बाजी, लंबी-लंबी कारों और बड़े वाले मकानों में नहीं है बल्कि असली सुख और सच्ची पूजा इस तरह की सेवा में है। अपने भविष्य की योजनाओं का जिक्र करते हुए उनका कहना है कि यदि ईश्वर ने चाहा तो मैं एक ऐसा शेल्टर होम बनाना चाहती हूं जहां पर मानसिक रूप से विक्षिप्त महिला या पुरुष रह सकें।

 



 

संस्था के दूसरे सदस्य दीपक महाजन भी इस काम को पिछले 10 वर्षो से कर रहे है। दीपक बताते है कि हम लोगो के सामने कई तरह की दिक्कत आती है। कई बार ऐसा होता है की किसी लावारिस की इलाज के दौरान मौत हो जाती है। उसे पोस्मार्टम के लिए मरचुरी में रखा जाता है। 70 से 72 घंटे बॉडी फ्रिज में रहती है। वो जम जाती है। बॉडी ठोस हो जाती है उसका वेट 20 किलो बढ़ जाता है। ऐसे में बॉडी को उठाने वाले सिर्फ दो लोग है मैं और वर्षा। हम लोगो को काफी मसक्कत करनी पड़ती है। कई बार ऐसा होता है कि हमारे सामने कोई गरीब या लवारिस होता है जिसको मदद करनी होती है और हमारे पास मदद के लिए पैसे नही होते है, ऊपर वाले का शुक्र है कि कोई न कोई मदद देने के लिए आ जाता है। हमारी संस्था को किसी भी तरह से कोई सरकारी मदद नही मिलती और हम इसके लिए कोशिश भी नही करते है।



 

संस्था द्वारा ऐसे परिवार जिनके पास दाह संस्कार के लिए पैसा नहीं होता है या ऐसे लोग जिनका कोई नहीं होता है उन लोगों का वर्षा वर्मा और दीपक महाजन द्वारा अपने हाथों से अंतिम संस्कार कराया जाता है। अंतिम संस्कार विद्युत मशीन द्वारा कराया जाता है। ऐसा क्यों पूछने पर उन्होंने बताया ताकि समाज के लिए एक मिसाल बन सके कि किसी के मरने के बाद पेड़ों को भी बचाया जा सके।

 



 

साथ ही संस्था द्वारा लोगों की मदद से सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे गरीब बच्चों को कॉपी रबड़ पेंसिल कटर पेंसिल बॉक्स स्केल भी बाटी जाती है। कुछ ऐसे बच्चे जो पढ़ने में बहुत ही काबिल हैं परंतु उनके परिवार के पास पैसे की कमी के चलते एडमिशन नहीं कराया जाता है, ऐसे बच्चों का पता लगाकर उनके साल भर की फीस का इंतजाम करके उनका एडमिशन भी करवाया जाता है।

इतना ही नहीं जब लॉक डाउन शुरू हुई तो इन दोनों ने गरीब बेसहारा लोगों के लिए भोजन का भी इंतज़ाम करवाया। इनकी संस्था एक दिव्या कोशिश ने 400 से ज़्यादा ज़रूरतमंदों को सूखा नाज बांटा है।

 



 

इसके अलावा भी तैयार भोजन इन्होनें लॉकडाउन में कई सारे ज़रूरतमंदों तक पहुंचाई है।

आम आदमी अगर उनसे कोई मदद चाहे तो कैसे ले सकता है?  इस सवाल पर वर्षा कहती है कि हम अपने फेसबुक पर पूरी डिटेल से साथ एक पोस्ट डाल देते है उसमें मेरा और दीपक जी का फोन नम्बर 8318193805, 9450111567 रहता है। जिसे भी मदद करनी होती है तो वो हम लोगो से इस नम्बर पर सम्पर्क कर सकता है।

 



 

इस लॉकडाउन में लोगों को भोजन करने आदि का नेक कार्य तो कई संस्थाएं और देवात्माएं करती हैं, मगर दिपक और वर्षा जी ने इस कोरोना महामारी के समय लावारिस लोगों का अंतिम संस्कार कर औरों से एक कदम आगे बढे हैं।

इनके इस नेक कार्य के मध्यम से कई सारी मृत आत्माओं को मोक्ष मिला हो ऐसी हमारी कामना है। हम अपने पाठकों से उम्मीद करेंगे कि वो भी दीपक महाजन और वर्षा जी की इस ‘एक दिव्य कोशिश’ से प्रेरणा ले कर अपने समाज में असहाय लोगों के प्रति उदारता दिखा कर पुण्य के भागी बनें।

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