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बिहार के हुनरमंद प्रवासी मजदूर अपने गाँव वापस आकर बल्ला बनाने का कारखाना चला रहे हैं

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Image Credits: Hindustan Times

July 25, 2020

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बिहार में प्रवासी श्रमिकों के कोरोनोवायरस-प्रेरित रिवर्स माइग्रेशन की प्रक्रिया देखने को मिली है।

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में अपने पैतृक शहर लौट आए मजदूर अपने आजीविका कमाने के लिए अपने क्रिकेट बैट बनाने के हुनर का उपयोग करने की उम्मीद कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग, अवंतीपोरा और काजीगुंड में स्थानांतरित होने वाले ये प्रवासी श्रमिक बैट-निर्माण इकाइयों में कार्यरत थे और कोरोना के समय लगाए गए यात्रा प्रतिबंधों में ढील के बीच अपने गाँव बिहार में वापस आ गए हैं।

लगभग 10 ऐसे मजदूर ने पश्चिम चंपारण जिले के सहोदरा गांव में एक महीने पहले एक स्थानीय इकाई स्थापित की है और कथित तौर पर 50 बल्लों का उत्पादन किया है जो खरीदारों के बीच  काफी लोकप्रिय है।

परसौनी गाँव के 30 वर्षीय अबुलेश अंसारी ने कहा, “घर से बेहतर कोई जगह नहीं है। यदि आप अपने गाँव पर रहकर अपनड़े लिए अच्छी कमाई कर सकते हैं तो इससे अधिक संतुष्टि की कोई दूसरी बात नहीं हो सकती है।”

वह  पोपलरके पेड़ को काटकर लकड़ी के मोटे टुकड़े तैयार करते हैं जिसका उपयोग उत्तम क्रिकेट बैट बनाने के लिए किया जाता है उन्होनें अनंतनाग के एक कारखाने में बैट-मेकिंग का हुनर सीखा है। उन्होंने कहा, “बैट बनाना एक सटीक कला है, जिसे बनाने में निर्णय, समायोजन, और गणना सभी शामिल हैं। यह एक कला है जिसमें हर किसी को महारथ हासिल नहीं हो सकती है।”

खरीदार अफरोज आलम ने कहा, “हल्का वज़न और बल्ले की स्ट्रोक बनाने की क़ाबलियत ही है जो अच्छे और बुरे बल्ले में अंतर बताई है।”

काजीगुंड की एक फैक्ट्री में काम कर चुके 29 वर्षीय दिलशाद आलम ने कहा, “ज़्यादा बल्ले बनाना मुश्किल है क्योंकि हम अभी भी इसका हाथों से ही कर रहे हैं हमारे पास ज़रूरी मशीन नहीं है। हमारा लक्ष्य है कि प्रत्येक बैट को 800 रुपये में बेचा जाए। पश्चिम चंपारण एक ऐसे हब के रूप में उभर सकता है जहाँ क्रिकेट बल्लों का कारखाना खुल सके। क्यूंकि क्रिकेट बैट बनाने में पोपलर के पेड़, का अहम योगदान है जो इस जिले में बहुतायत में मिलते हैं। ”

एक अन्य प्रवासी श्रमिक ने कहा कि वे कश्मीर में प्रति दिन कम से कम 12 बल्ले बनाते थे, लेकिन यहां यंत्रीकृत उपकरणों की कमी और बरसात के मौसम में सूखी लकड़ी की अनुपलब्धता के कारण उत्पादन कम है।

हालांकि, मजदूर आशावादी हैं और उनहोनें वित्तीय सहायता के लिए सरकारी अधिकारियों से संपर्क किया है। गौहा ब्लॉक के सर्कल अधिकारी (सीओ) राजू रंजन श्रीवास्तव ने कहा, “हम बल्ले के नमूनों से संतुष्ट हैं। हम उन्हें आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान करेंगे।”

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