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बहन के कहने पर 8 लाख के इनामी नक्सल डिप्टी कमांडर ने किया सरेंडर

तर्कसंगत

Image Credits: Bhaskar/Jagran

August 4, 2020

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रक्षाबंधन के पावन अवसर पर किसी बहन के लिए इससे अच्छा गिफ्ट क्या हो सकता है कि उसका भाई जुर्म और खून-खराबे की दुनिया को बस इसलिए अलविदा कह दे, क्योंकि उसे अपनी बहन की फिक्र है और वह उससे राखी बंधवाना चाहता है. यह कहानी काल्पनिक नहीं, बल्कि वास्तविक है और छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दांतेवाड़ा की यह कहानी त्योहार और रिश्ते के साथ ही प्यार और विश्वास की मिसाल पेश कर रही है, वो भी रक्षाबंधन के दिन. हुआ यूं कि दांतेवाड़ा के एक कुख्यात नक्सली मल्ला तामो, जिसपर 8 लाख रुपये का इनाम है, ने अपनी बहन से राखी बंधवाने की खातिर पुलिस में सरेंडर कर दिया. दरअसल, उसकी बहन ने कहा था कि वह जब तक पुलिस के सामने सरेंडर नहीं कर देता, तब तक वह उसे राखी नहीं बांधेगी. मल्ला तामो ने रिश्ते का मान रखते हुए पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और रक्षाबंधन त्योहार की लाज रख ली.

जिस मल्ला तामो को पुलिस लंबे समय से तलाश रही थी, उसे खुद अपने सामने पाकर छत्तीसगढ़ पुलिस हैरान हुई कि आखिरकार ये कैसे हुआ, लेकिन जब पुलिसकर्मियों को हकीकत का अंदाजा हुआ तो वे मल्ला तामो की बहन लिंगे को आभार जताए बिना नहीं रह सके. रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले लिंगे ने पुलिसकर्मियों को फोन कर बताया कि उसका 22 वर्षीय भाई मल्ला तामो अब जुर्म की दुनिया से बाहर निकलना चाहता है और पुलिसकर्मियों की मदद करना चाहता है. लिंगे की बात सुनकर पुलिस को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब लिंगे खुद मल्ला तामो को लेकर थाने पहुंची तो फिर इसके पीछे की सच्चाई सामने आई, जो कि रिश्तों के साथ ही रक्षाबंधन जैसे त्योहार पर लोगों का विश्वास बढ़ाता है.

दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक अभिषेक पल्लव ने एएनआई को बताया, “चूंकि वह भैरमगढ़ इलाके का प्लाटून कमांडर था तो वह सभी बड़ी घटनाओं में शामिल था. इन घटनाओं में कई पुलिसकर्मियों की जान गई है.” उन्होंने कहा, “उसने दंतेवाड़ा जिले की ‘लोन वर्राटू अभियान’ के तहत सरेंडर किया है.”

मल्ला से उसकी पिछली जिंदगी के बारे में पूछे जाने पर उसने बताया, “मैं 2016 से प्लाटून डिप्टी कमांडर था.” वह जिस प्लाटून का नेतृत्व कर रहा था कि वह एक नक्सल कैडर के “भैरमगढ़ एरिया कमेटी” में स्थित है.

दंतेवाड़ा पुलिस की ओर से नक्सलियों को वापस लाने के लिए यह मुहिम चलाई जा रही है. इस स्कीम के तहत, नक्सलियों के आत्मसमर्पण करने पर उन्हें उनकी पंसद का रोजगार देने का वादा किया गया.

यह सबकुछ पुलिस के लोन वर्राटू अभियान के तहत हुआ है. बचपन से ही हिंसा के रास्ते पर चले मल्ला के रक्षाबंधन से दो दिन पहले लौटने पर अफ़सरों ने भी तालियां बजाकर स्वागत किया. एसपी डॉ अभिषेक पल्लव ने इसे लोन वर्राटू अभियान की सफलता बताया और कहा कि मुख्यधारा में लौटने वालों का स्वागत है. मल्ला ने बताया कि वह वर्तमान में भैरमगढ़ एरिया कमेटी का प्लाटून नंबर 13 का डिप्टी कमांडर था. वह कई बड़ी घटनाओं में शामिल था. बहन के बुलावे पर 14 साल बाद घर लौटा.

 

 

घर छोड़ भागा था

मल्ला तामो जब 12 साल का था तो वह पालनार इलाके स्थित घर से भाग गया था. बाद में पता चला कि वह नक्सलियों के संपर्क में आ गया है और उसने नक्सलवाद को अपना लिया है. मल्ला भैरवगढ़ इलाके स्थित पश्चिमी बस्तर संभाग में सक्रिय था. बीते 10 साल में उसने कई ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया, जिसमें पुलिसकर्मी समेत बेगुनाह लोगों की जानें गईं. दांतेवाड़ा में इसका इतना खौफ था कि पुलिस ने उसपर 8 लाख रुपये का इनाम रखा था. मल्ला तामों को पकड़ने की पुलिस ने कई कोशिशें कीं, लेकिन वह हर बार पुलिस की गिरफ्त से बच निकलता था. पुलिस उसे तलाश ही रही थी कि रक्षाबंधन से एक दिन पहले उन्हें संदेश मिला कि मल्ला तामो आत्मसमर्पण करना चाहता है. दरअसल, छत्तीसगढ़ में लंबे समय से मुहिम चल रही है कि जो भी नक्सली मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं, वे आत्मसपर्पण कर दें. इसके बाद उन्हें पुलिस की सुरक्षा मिलती है और वह नक्सल विरोधी गतिविधि में पुलिस का साथ देते हैं.

मल्ला तामो की बहन लिंगे ने पुलिस को बताया कि उसका भाई नक्सलवाद छोड़ आत्मसमर्पण करना चाहता है. बाद में उसने पुलिस के सामने सरेंडर किया और आज रक्षाबंधन के दिन उसकी बहन ने अपना वादा पूरा करते हुए उसे राखी बांधी. मल्ला तामो की जिंदगी उसकी बहन ने बदल दी और मल्ला ने भी बहन का मान रखते हुए भाई का फर्ज निभाया. दरअसल, किसी भी रिश्ते में प्यार और विश्वास सबसे बड़ी चीज होती है. लिंगे मल्ला को नक्सलवाद से निकालने की लंबे समय से कोशिश कर रही थी, जब वह सफल नहीं हुई तो उसने राखी का कर्ज दिया और जब मल्ला को लगा कि वह अपनी बहन की राखी का कर्ज नहीं चुका रहा है तो उसने नक्सली की दुनिया को त्यागने का फैसला किया. अगर वैसा नहीं करता तो किसी न किसी दिन पुलिस की गोलियों का शिकार हो ही जाता. आज राखी के एक धागे ने न सिर्फ भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते का मान बढ़ाया है, बल्कि उसने मल्ला की जिंदगी भी बचा दी, जहां वह अपनी कुकृत्यों का पाश्चाताप कर सकता है और सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर सकता है.

 

तर्कसंगत का तर्क

हमारी आंखों के साथ ही कान और जेहन से कई ऐसी खबरें गुजरती हैं, जो रिश्तों और परंपराओं पर हमारे विश्वास को और मजबूत करती है. चाहे दिवाली हो या ईद, चाहे होली हो या प्रकाश पर्व, ये सारे त्योहार इंसानियत को इंसानियत और धर्म को धर्म से मिलाने के लिए बने हैं. इन त्योहारों की बुनियाद ही प्यार और विश्वास पर टिकी है और ऐसे त्योहार में लोग गिले-शिकवे भुलाकर इंसान बनने की दिशा में प्रयास करते हैं. रक्षाबंधन एक ऐसा त्योहार है, जहां भाई अपनी बहन से सदा खुश रहने और खुश रखने का वादा करता है और उसकी हमेशा रक्षा करने का दावा करता है. मल्ला और लिंगे की यह कहानी भाई-बहन के इसी रिश्ते को दुनिया के सामने अलग तरह से रखती है, जहां लिंगे की कोशिशों से मल्ला का मन बदला और उसने राखी बंधवाने की खातिर जुर्म की जिंदगी छोड़ सामान्य जिंदगी जीने का फैसला किया. हमें उम्मीद है कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के साथ साथ बाकि नक्सल प्रभावित राज्य की पुलिस भी इस मानवीय रास्ते को अपनाकर भटके हुए युवकों को समाज की मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयास करेगी.

 

 

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