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अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस: मिलिए बिहार के इस युवा से जिसने शुरू की देश में रोजगार की एक नयी पहल!

Sonali

August 12, 2020

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कहते हैं देश-निर्माण और समाज के विकास में युवाओं का अहम योगदान होता हैं। वह कल की नीव रखते हैं और समाज के आगे बढ़ने और आत्मनिर्भर होने में सहायक होते हैं। 

अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस के मौके पर आज आपको एक ऐसे ही युवा की कहानी बताने जा रहे हैं जिन्होंने विदेश की नौकरी छोड़ गाँव में काम करने का और अकुशल युवाओं को रोज़गार से जोड़ने का फ़ैसला किया। अपने कुछ अद्भुत पहलों के साथ वे मेघालय और बिहार के सुदूर गाँवों में युवाओं का कौशल विकास और जम्मू कश्मीर के आतंकवाद ग्रस्त इलाकों में बीपीओ शुरू कर रोजगार में वृद्धि कर रहे हैं और साथ ही देश में अपनी तरह का पहला प्रक्रिया अभिनव बायोगैस प्लांट व्यापार मॉडल (process innovative biogas plant business innovation) शुरू कर नवीकरणीय ऊर्जा और कचरा प्रबंधन को भी बढ़ावा दे रहे हैं। 

आशुतोष कुमार, 32, का जन्म बिहार के औरंगाबाद जिले के एक सब डिवीजन दाउदनगर में हुआ था। पटना से 10वीं तक और बोकारो स्टील सिटी से 12वीं तक की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड, यूनाइटेड किंगडम से संचार में स्नातक किया। 



एक अच्छी नौकरी और बेहतर परिवेश में होने के बाद उनका जीवन काफ़ी बेहतर चल रहा था लेकिन अपनी मातृभूमि लौट आने का आग्रह हमेशा बना रहता था। आखिरकार, लगभग छह महीने तक काम करने के बाद, उन्होंने इंग्लैंड छोड़ने और अपने देश वापस आने का फ़ैसला किया। 

वापस आते ही इस सोशल इंटरप्रेन्योर ने कंप्यूटर शिक्षा के ज़रिये देश में एक नयी रोज़गार और कौशल विकास की मुहिम शुरू की। बिहार और मेघालय जैसे राज्यों में कंप्यूटर ट्रेनिंग और जम्मू-कश्मीर में कॉल सेंटर खोल युवाओं के लिए रोज़गार बढ़ाया। अब तक वे 1600 से ज़्यादा युवाओं को बेसिक आईटी ट्रेनिंग और कॉल सेंटर मॉड्यूल की ट्रेनिंग दे चुके है। 

“बीपीओ शुरू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य जम्मू-कश्मीर के सबसे आतंकवादी हिट जिलों में से एक में आजीविका प्रदान करना था। हमने हुर्रियत कांफ्रेंस के एक नेता सहित कई बेरोजगार स्थानीय युवाओं को काम दिया और उनकी अधिक से अधिक मदद करने की कोशिश की,” अपने शुरू किये गए पहलों के बारे में आशुतोष बताते हैं। “एक और प्रोजेक्ट हैं ‘स्किल ऑन व्हील्स’ — यह ग्रामीण युवाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करने की पहल है जो पढ़ाई के लिए निकटतम उपनगरीय क्षेत्र में आने में सक्षम नहीं। काफ़ी कारणों जैसे कि खराब परिवहन सेवा, घरेलू कार्यों या अन्य स्थानीय मुद्दों के चलते कई युवा अपनी पढ़ाई और कौशल विकास पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। हमारा लक्ष्य ऐसे ही युवाओं तक पहुँच कर उन्हें प्रशिक्षित करना हैं। इसके साथ ही हम नौकरी खोजने में भी उनकी मदद करते हैं।” 

वर्तमान में वे अपनी सहयोगी आकांक्षा के साथ ‘वेस्ट टू वेल्थ’ कांसेप्ट पर काम कर रहे है। देश में अपने प्रकार का पहला ‘प्रक्रिया अभिनव बायोगैस प्लांट व्यापार मॉडल’ बेस्ड स्टार्टअप शुरू कर वे नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) को अगले स्तर पर ले जाने की चेष्टा कर रहे हैं। इसकी नींव 2015 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में रखी गई थी और डेवलपमेंट बैंक ऑफ़ सिंगापुर व सीएसआर फंड के सहयोग से इसे शुरू किया गया था। 



“ग्रामीण महिलाओं के धुएँ से भरे जीवन, जो ज्यादातर यक्ष्मा (tuberculosis) और आँखों की खुजली के समस्या से जूझते थी, ने मुझे उनकी बेहतरी के लिए काम करने को प्रेरित किया। हालांकि, उज्ज्वला योजना ने उनकी समस्या को हल करने की कोशिश की, लेकिन फिर भी पूरी तरह नहीं कर पायी क्योंकि अब भी कई औरतें सिलेंडर का भुगतान करने में विफल हैं। लेकिन हमारा समाधान एलपीजी से सस्ता है — बायोगैस न केवल कम लागत वाले खाना पकाने के ईंधन और बिजली बनाने में मदद करता हैं बल्कि साथ ही जैविक खेती करने के लिए उम्दा जैविक खाद का उत्पादन भी करता है,” आशुतोष बताते हैं कि कैसे उन्हें लोगों ने यह कह कर हतोत्साहित किया था कि बायोगैस पुराना मॉडल हैं और अब शायद काम ना करे। 

डेवलपमेंट बैंक ऑफ़ सिंगापुर और सीएसआर फंड की मदद से शुरू किया पायलट प्रोजेक्ट का उपयोग आर्थिक रूप से पिछड़े स्थानीय समुदाय में बिजली की आपूर्ति के लिए किया गया। लेकिन सरकार द्वारा विद्युतीकरण के बाद से वे अब सिंचाई के उद्देश्य से इसका उपयोग कर रहे हैं। 2015 में आशुतोष और आकांशा ने मिलकर एक कंपनी पंजीकृत की और फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उनकी कंपनी ‘स्वायंभु इनोवेटिव सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड’ को बिहार स्टार्टअप नीति, बनस्थली-अटल ऊष्मायन केंद्र (Banasthali-Atal incubation center), ICCO-GiZ कार्यक्रम आदि से बहुत समर्थन मिला हैं और वे इसे और बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। 



“हम भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप हैं और डी-सेंट्रलाइज्ड कम्युनिटी बायोगैस प्लांट के क्षेत्र में काम कर रहे हैं जो घर में खाना पकाने के ईंधन की आपूर्ति करता है। हम ग्रामीण घरों से अपशिष्ट (waste) खरीदते हैं और रसोई गैस बेचते हैं जो कि एलपीजी के दाम से आधे में बिकता है। साथ ही हम किसानों को कम लागत पर जैव घोल/ जैविक खाद भी बेचते हैं,” आशुतोष अपने स्टार्टअप मॉडल के बारे में बताते हुए कहते हैं। 

अपने इंटरप्रेन्योरशिप की यात्रा में हुए भूल-चूक या ग़लतियों पर वे कहते हैं कि उन्हें अपनी किसी भी गलती पर पछतावा नहीं है। वे हर गलती से निश्चित रूप से कुछ सीखने की और उसे अपने जीवन में लागू करने की कोशिश करते हैं। आशुतोष की कोशिश अधिकतम गाँवों तक पहुँचना और उन्हें सस्ते में खाना पकाने वाला स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना हैं। 



आकांक्षा के हिसाब से युवाओं को सबसे पहले उस विषय पर कठोर शोध करना चाहिए, जिस पर वे काम करना चाहते हैं। समस्या समाधान के रूप में कूदने के बजाय उस समस्या के साथ रहना चाहिए, नृवंशविज्ञान करना चाहिए और फिर समाधान पर काम करना चाहिए। कई बार हम जिस चीज़ को एक समस्या के रूप में देखते हैं वह वास्तविकता में कई लोगों की दैनिक जीवन शैली का हिस्सा होती है। 

“धैर्य रखें और ख़ुद पर विश्वास रखें। अगर कोई आपके बारे में नकारात्मक बात कर रहा है तो ध्यान न दें। वे कोई प्रमाणित एजेंसी नहीं हैं जो आपको आपकी सफलता या विफलता का प्रमाण पत्र देगी। वही लोग आपकी सफलता के बाद आपके पास यह कहते हुए वापस आएँगे कि उन्हें आप पर पूरा भरोसा था और आपने इसे साबित कर दिया है। इसलिए अपने आसपास किसी भी नकारात्मकता पर ध्यान न दें, आगे बढ़ते रहें और अच्छे काम करते रहें,” अपने स्टार्टअप और सोशल इंटरप्रेन्योरशिप से मिले सबक को ध्यान में रखते हुए अंत में आशुतोष बस इतना ही कहते हैं। 

उनके स्टार्टअप के बारे में और जानने और उनसे जुड़ने के लिए आप उनके वेबसाइट या फ़ेसबुक पेज पर जा सकते हैं। इसके अलावा आप उन्हें ईमेल भी कर सकते हैं।

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