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झारखण्ड में इस युवा आईएएस अफसर ने आंगनवाड़ी की सफलताओं का उपाय खोज निकाला है

Ankita Singh

August 16, 2020

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इन दिनों झारखंड के एक आईएएस अधिकारी काफी चर्चा में है। बच्चों की शिक्षा हो या महिलाओं के लिए स्वास्थ की सुविधाएं मुहैया करवाना हो सबके लिए उन्होंने जमीं पर उतरकर काम किया है। उनके कामों को न सिर्फ झारखंड की जनता बल्कि देश भर में लोग तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। ये हैं हाल में सुर्खियों में छाए आदित्य रंजन।आदित्य झारखंड में सिंघभूम में जिला विकास अधिकारी (डीडीसी) के रूप में तैनात हैं। वे जिले की स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए श्रमिकों के साथ काम कर रहे हैं। आदित्य रंजन ने आंगनवाड़ी प्रणाली को एक मॉडल में बदल दिया है, जहां बच्चों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और पोषण की सुविधा मिलती है।

आदित्य रंजन एक बिजनेस फैमिली से हैं। उनकी प्राइमरी स्कूलिंग गवर्नमेंट से हुई। वे तीन भाई और एक बहन हैं। सबसे बड़े भाई डॉ राकेश कुमार एक ऑर्थोपेडिशियन हैं। छोटा भाई बिजनेसमैन है और बहन ने MBA किया है। उनके बहनोई रमनद कुमार रिलायंस के साथ सीए हैं। आदित्य ने लोगों की सेवा करने के लिए सिविल सर्विस को को चुना। आज वो पूरी लगन से झारखंड में लोगों की जिंदगी संवार रहे हैं।

आंगनवाड़ी का नया मॉडल

उन्होनें सबसे पहले अपने खुद के वेतन और खर्चों के साथ पहला मॉडल आंगनवाड़ी केंद्र विकसित किया। बाद में, स्वास्थ्य के साथ-साथ शिक्षा में सुधार के सफल परिणामों के साथ उन्होनें सरकार से और फण्ड मांगे। जब उन्होंने पहली बार अपने जिले के आंगनवाड़ी केंद्रों का विश्लेषण किया, तो उन्होंने पाया कि उन स्थानों पर बच्चे सिर्फ अपना भोजन करने आते हैं जिनकी आयु 3 से 6 वर्ष के बीच की होती है। छोटे बच्चों के लिए कोई शैक्षणिक गतिविधियां नहीं की जा रही हैं। उन्होंने उसके बदले विकासशील केंद्रों की कल्पना की जहां उन्हीं बहच्चों के पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा को एक साथ एकीकृत किया जाएगा ताकि महिलाओं के साथ ही बच्चों को भी उनसे लाभ मिल सके। उन्होंने मॉडल आंगनवाड़ियों को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए एनजीओ जैसे तितली के साथ सहयोग किया। नॉट-फॉर-प्रॉफिट संगठन, तितली ने उन्हें सहायकों या महिला श्रमिकों को प्रशिक्षित करने में मदद की, जो इन केंद्रों पर काम कर रहे थे। ये मॉडल आंगनवाड़ी  गर्भवती महिलाओं को मुफ्त में दवाइयाँ और स्वास्थ्य जाँच प्रदान करके उनकी मदद करती हैं। ऐसे केंद्रों की सफलतापूर्वक नकल करने के बाद, अब वह इस साल के अंत तक उनमें से 1000 को विकसित करने की योजना बना रहा है।

 

 

तर्कसंगत से बात करते हुए आदित्य रंजन ने बताया “जब हमने शुरुआत में आंगनवाड़ी केंद्र का दौरा किया, तो मुझे इसकी हालत को देख कर हैरानी हुई। इन आंगवाड़ी केंद्रों का प्राथमिक उद्देश्य बच्चों को बुनियादी भोजन उपलब्ध कराना और उन्हें स्कूलों में आने के लिए प्रोत्साहित करना है। लेकिन जो कुछ भी हो रहा था वो ठीक इसके विपरीत था।”  बच्चे बस भोजन के लिए वहां आते थे और उसके बाद चले जाया करते थे। इसके बाद हमने खाना कपड़ा और स्टेशनरी सामग्री जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के साथ-साथ परिसर की स्वच्छता की स्थिति में सुधार करने के बाद, हमने सकारात्मक परिणाम देखे। बच्चों के आंगनवाड़ी आने की संख्या नधने लगी। मैंने SAMIKSHA नाम से एक ऐप भी लॉन्च किया है जो हमें अन्य आंगनवाड़ी की निगरानी करने में मदद करता है और इसके साथ, हम यह सुनिश्चित करने में सक्षम हैं कि बच्चों की संख्या बढ़ती रहे।

 

डिस्ट्रिक्ट ई- गवर्नेंस प्रोग्राम

डिस्ट्रिक्ट ई- गवर्नेंस प्रोग्राम की मदद से आदित्य का मानना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य बेहतर भविष्य के लिए दो प्राथमिक ज़रूरतें हैं और अपना अधिकांश समय उन तरीकों पर शोध करने में बिताते हैं जिनके माध्यम से वह अपने जिले में उन्हें बेहतर बना सकते हैं। एक ऐसे युग में जहां सब कुछ डिजिटल हो गया है और कंप्यूटर / लैपटॉप हमारे दैनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गए हैं, उन्होंने महसूस किया कि सिंहभूम जिले में अधिकांश लोगों के पास बुनियादी कंप्यूटर साक्षरता कौशल का अभाव है।

वह इस समस्या से लड़ने के लिए जिला ई-गवर्नेंस सोसाइटी कंप्यूटर ट्रेनिंग प्रोग्राम (डीजीएस) नामक एक अत्यंत नवीन और लाभकारी कार्यक्रम के साथ आए। डीजीएस को टेक-सेवी बनने के लिए वंचितों के लिए एक अवसर प्रदान करने के विचार के साथ शुरू किया गया था। कार्यक्रम में 60 दिनों का एक व्यापक पाठ्यक्रम शामिल है जिसमें 32 मॉड्यूल शामिल हैं जो कंप्यूटरों की मूल बातें को कवर करते हैं।

 

 

सभी आयु वर्ग के छात्रों की बढ़ती संख्या से पता चलता है कि यह जिले में सफलतापूर्वक चल रहा है। लगभग 1,700 छात्र पहले ही कार्यक्रम से लाभान्वित हो चुके हैं और उनका उद्देश्य कंप्यूटर कौशल प्रशिक्षण को किसी भी उम्र या किसी भी पृष्ठभूमि से संबंधित लोगों के लिए एक व्यवहार्य विकल्प बनाना है। हालाँकि, उनके लिए अपनी सामाजिक पहल को लागू करना आसान नहीं रहा है और वे बताते हैं कि यह काफी धीमी प्रक्रिया है।

 

 

अब तक की अपनी पहल के बारे में तर्कसंगत के साथ बात करते हुए, आदित्य रंजन कहते हैं, “सरकारी क्षेत्र में काम करने की गति धीमी है। इसलिए, भले ही आप किसी भी नई पहल को लागू करना चाहते हों और इसके परिणामों का विश्लेषण करना चाहते हों, लेकिन इसमें एक लंबा समय लगेगा। अब तक, हमें जिले के लोगों से जबरदस्त प्रतिक्रियाएं मिली हैं और यह मुझे हर दिन प्रेरित करता है। जब आप अपने काम के साथ सकारात्मक रूप से जीवन को प्रभावित करने में सक्षम होते हैं, तो इससे अपार संतुष्टि मिलती है और यह भावना अपूरणीय होती है। नए आंगनवाड़ी केंद्र खोलने के लिए धन की कमी का सामना करना पड़ सकता है, इसके लिए भारी वित्तीय निवेश की आवश्यकता होगी। मुझे उम्मीद है कि राज्य इस तरह की सफल परियोजनाओं के लिए अधिक धनराशि आवंटित करेगा। ”

 

 

बच्चों के लिए ‘वंडर ऑन व्हील्स’

शिक्षा के क्षेत्र में उनकी एक और पहल है जिसको वो ‘वंडर ऑन व्हील्स’ कहते है। हाई स्कूल और सीनियर सेकेंडरी स्कूल के बच्चों के डेटाबेस से गुजरने के दौरान, उन्हें पता चला कि उनमें से अधिकांश आर्ट्स स्ट्रीम के लिए चयन कर रहे थे। इसके अलावा जब उन्होंने इस पर गहराई से ध्यान दिया, तो उन्हें पता चला कि पश्चिमी सिंहभूम में विज्ञान और गणित के शिक्षक की सख्त कमी है। परिणामस्वरूप, अधिकांश छात्रों को केवल आर्ट्स स्ट्रीम का चुनाव करना पड़ता है। वंडर ऑन व्हील्स की स्थापना के पीछे मुख्य रूप से कोशिश है कि आने वाले पीढ़ी के मन में वैज्ञानिक स्वभाव विकसित करना और उन्हें अधिक से अधिक विकल्प देना।

 

 

यह पहल हर स्कूल में विज्ञान और गणित के शिक्षकों को विषय को पढ़ाने के लिए पर्याप्त तकनीकी सहायता प्रदान करने के उद्देश्य के साथ शुरू हुई। हर स्कूल में लैब बनाने का खर्च बड़े पैमाने पर होता। इसलिए, इस पहल के तहत, उन्होंने सभी आवश्यक उपकरणों के साथ एक मोबाइल वैन विकसित की। यह स्कूल में थियोरेटिकल और साथ ही प्रैक्टिकल पढाई में काम आएगा। यह परियोजना अब सदर क्षेत्र में 30 स्कूलों को कवर करती है और चक्रधरपुर क्लस्टर में भी चलती है। इस परियोजना के साथ, उनका उद्देश्य सरकारी स्कूलों को पर्याप्त वैज्ञानिक उपकरणों से लैस करना है ताकि वे अपने छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करने के मामले में निजी संस्थानों से पीछे न रहें। वह अपने जिले के छात्रों के लिए उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करते हैं।

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