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14 सालों से राजस्थान की मरुभूमि को अपने खर्च पर हरा भरा बना रहे हैं ये प्रोफेसर

तर्कसंगत

Image Credits: Facebook/FamilialForestry

August 16, 2020

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राजस्थान के गर्म रेतीले और वीरान धोरों को हरियाली में बदलने के लिए बीकानेर संभाग में पर्यावरण सरंक्षण की अलख जगा रहे हैं श्रीगंगानगर के प्रो. श्यामसुंदर ज्याणी। 2006 में बीकानेर के गांव हिम्मतासर में एक कार्यक्रम में पौधरोपण किया, तब से पौधे लगाने की ऐसी लगन लगी कि 14 सालों में अब तक लाखों पौधे अपनी देखरेख में लगवा चुके हैं। 1 लाख से भी अधिक घरों, 2500 स्कूल व हजारों किसानों के खेत उनकी जिद के गवाह हैं।

ख़ास बात यह है कि इन पेड़ों को उन्होंने अपने पैसों से लगाया है. अपनी समाजशास्त्र पृष्ठभूमि का उपयोग करते हुए, उन्होंने इस बदलाव को लाने के लिए कई आम लोगों की मदद ली. उनका मानना है जैसे समाज की मूलभूत इकाई परिवार होता है, उसी तरह परिवार में पेड़ भी महत्वपूर्ण सदस्य होना चाहिए। ऐसा करने से हमारे समाज के बच्चे-बूढ़े सभी में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी।

 

इस सफर की शुरुआत

उनका सफ़र 2003 के आसपास शुरू हुआ. दरअसल, उनके कॉलेज परिसर में कुछ नीम के पेड़ों मर रहे थे। जिन्हें पुनर्जीवित करने के लिए उन्होंने अपने स्टूडेंट्स के साथ मिलकर एक सामूहिक प्रयास किया। लगभग एक महीने में ही सभी पेड़ हरे-भरे व स्वस्थ हो गए। तब उन्हें लगा कि कॉलेज की 108 एकड़ भूमि में और भी बहुत पेड़ लग सकते हैं। यह प्रयास सफल रहा तो उन्होंने इसे अपनी दिनचर्या बना लिया। उनके छात्रों ने उनका साथ दिया और शुरू हो गया पेड़ लगाने का सिलसिला। परिणाम स्वरूप राजस्थान के बीकानेर के आसपास का इलाका पहले की तुलना में ज़्यादा हरित बन गया।

उन्होंने धीरे-धीरे बाकी प्रांगण में भी पेड़ लगाये और अपने विद्यार्थियों के साथ रोज उन में पानी देने और देख-रेख का कार्य शुरू किया। इससे प्रभावित हो कर उन्हें एनएसएस का काम भी संभालने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी!

 


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पारिवारिक वानिकी

साल 2006 में राजस्थान सरकार के एक प्रोग्राम के तहत वे  बीकानेर के पास हिम्मतासर गांव में बच्चों के साथ कैंप के लिए गये। उसी गांव से श्याम सुन्दर की “पारिवारिक वानिकी” की शुरुआत हुई। जो सिलसिला हिम्मतासर में साल 2006 में शुरू हुआ वह आज भी बरकरार है।

इसमें ग्रामीणों से आग्रह किया जाता है कि वे अपने घर-आंगन में फलों के पेड़ लगाएं और अपने परिवार के सदस्यों की तरह उनकी देखभाल करें। आपके मन में सवाल कौंध सकता है कि आखिर फलों के पेड़ ही क्यों? दरअसल, इससे दो बड़े फ़ायदे होते हैं।  पहला तो यह कि फल के पेड़ जैव विविधता की बेहतरी में योगदान करते हैं।  दूसरा यह कि इन पेड़ों से पैदा होने वाले फलों को ग्रामीण अपने आहार में भी उपयोग कर सकते हैं।

इससे भुखमरी और कुपोषण की समस्या का समाधान भी हो सकता है। वहीं फलों की पैदावार ज्यादा मात्रा में होने पर ग्रामीण इन्हें बेचकर आर्थिक रूप से समृद्ध भी हो सकते हैं।

 


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पर्यावरण की समस्या सुलझाने की कोशीश

श्याम सुन्दर का मानना है कि यदि घरों में फल के वृक्ष लगाए जाएँ तो एक वक़्त के बाद घर के सदस्यों के आहार में एक फल शामिल हो जाएगा। अगर हर गरीब के घर में कोई भी फल का वृक्ष हो तो बच्चों में कुपोषण की समस्या को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

इसके अलावा बढ़ते जलवायु परिवर्तन और घटते वनों के कारण बहुत से जीव जैसे तितलियाँ, चिड़ियाँ आदि की प्रजातियां लुप्त हो रही हैं तो घरों में पेड़ होने से उन्हें भी आश्रय और कुछ भोजन मिले तो हम अपनी बायोडायवर्सिटी को भी सहेज सकते हैं। बहुत से पेड़ों के पत्ते घरेलु जानवरों के चारे के रूप में भी इस्तेमाल हो सकते हैं।

उनका मानना है कि पीपल के पेड़ पर पक्षी रहते हैं, जो हमारी फ़सलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को अपना आहार बना लेते हैं और हमारी फसल को उनसे बचाते हैं। यही नहीं उनके अनुसार पीपल के पेड़ और केचुए का कोई न कोई कनेक्शन है। जहां पर पीपल का पेड़ होता है, वहां केचुए ज्यादा होते हैं। अब चूंकि, केचुए भूमि को उपजाऊ बनाते हैं। मसलन पीपल का पेड़ लाभदायक होता है।

हालांकि, ज्याणी मानते हैं कि घर के आसपास पीपल का पेड़ लगाना परेशानी पैदा कर सकता है। दरअसल, इसकी जड़े घर को छति पहुंचा सकती है. मगर खेतों पर अपनी जमीन के अनुपात के हिसाब से पीपल लगाने को वह लाभदायक बताते हैं।

 


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पूर्व राष्ट्रपति से मिला सम्मान

सरकार ने उनके प्रयासों को मान्यता दी है। प्रकृति संरक्षण के प्रति अपनी सेवाओं के लिए ज्याणी को साल 2012 में भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा सम्मानित किया गया था। राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किए जाने के बावजूद श्याम को लगता है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

बीकानेर जिले के स्कूलों और पंचायतों में सरकारी सहायता के साथ पारिवारिक वानिकी प्रयोगशालाओं को विकसित करने की उम्मीद के साथ, ज्याणी चाहते हैं कि अधिक से अधिक गांव प्रकृति संरक्षण की आवश्यकता को समझे और इसके बारे में जागरूक हों।

 


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किया कई चुनौतियों का सामना

श्याम सुन्दर ने इंडियन काउन्सिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च के वैज्ञानिकों के सामने प्रस्ताव रखा कि वे मरुस्थली पेड़ जैसे कि झारबेरी, जिसे पनपने के लिए ना के बराबर पानी की जरूरत होती है, उस पर बड़ा बेर (थाई एप्पल) की बडिंग कर दी जाये तो वह बिना किसी पानी की जरूरत के प्राकृतिक रूप में यह फल उग जाएगा।

पर श्याम सुन्दर के इस प्रस्ताव को उन्होंने असंभव बताते हुए मना कर दिया। लेकिन इसे चुनौती के रूप में लेने वाले श्याम सुन्दर ने अपने कुछ विद्यार्थियों के साथ मिल कर सम्भव कर दिखाया। उनका यह प्रयोग अन्य मरुस्थली पेड़ लसूदा और खेजड़ी पर भी कारगर साबित हुआ।

श्याम सुन्दर का उद्देश्य पारिवारिक वानिकी को समाज के साथ-साथ शिक्षा से भी सही मायनों में जोड़ना है। अपनी इसी सोच पर काम करते हुए उन्होंने अपने कॉलेज, बीकानेर में ही तरह-तरह के पेड़ लगा एक छोटा-सा जंगल बनाया है; जो धीरे-धीरे अन्य छोटे-मोटे जीव जैसे तीतली, चिड़िया के आने से एक बायोडायवर्सिटी का रूप ले रहा है।

तर्कसंगत ये उम्मीद करता है कि अपने इस प्रयास से श्याम सुन्दर अपनी इस सुन्दर सोच को आने वाली पीढ़ी तक भी पहुंचा पाएं जिससे मरुभूमि में भी हरियाली फ़ैल सके। पर्यारण के प्रति उनकी संजीदगी और लग्न हमारे पाठकों के लिए भी अनुकरणीय है।

 

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