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वीडियो देखें, छत्तीसगढ़ में पुलिस ने एड्स पीड़ित बच्चियों को शेल्टर होम से निकाला, महिला वकील की पिटाई की

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Image Credits: Patrika

August 18, 2020

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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एचआईवी पॉजिटिव बच्चों के लिए आश्रय गृह में सोमवार को पुलिस द्वारा घेराबंदी किए जाने के बाद दिल दहला देने वाला दृश्य देखने को मिला, कथित तौर पर जिला प्रशासन के आदेश पर शेल्टर होम में रह रहे बच्चों को बाहर निकाला गया, साथ ही एक महिला वकील के साथ मारपीट की जिसने विरोध किया और शेल्टर होम बंद करने के प्रयास में उसे हिरासत में लिया।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार सोमवार को सुबह करीब 11 बजे पुलिस की टीम के साथ महिला बाल विकास विभाग के बिलासपुर और अन्य जिलों से 15-16 अधिकारी पुलिस बल से साथ आश्रम पहुंचे। वहां मौजूद लोगों और स्टाफ का कहना है कि वे सीधे आश्रम के भीतर घुसे। फरमान दिया कि आदेश के मुताबिक सभी बच्चों को कलेक्टर के आदेश पर बाहर निकालकर ले जाना है। स्टाफ ने ऑर्डर दिखाने के लिए कहा। ‘अपना घर’ आश्रम की अधीक्षिका दीपिका सिंह के मुताबिक एक कागज उन्हें लहराकर दिखाया गया पर उन्हें आदेश की कॉपी नहीं दी गई। सभी बच्चों से कहा गया कि बाहर निकलें। बच्चे निकलने के लिए तैयार नहीं हुए तो बल प्रयोग शुरू हो गया।

 

पुलिस के डर से 7 से 9 साल की बच्चियां बाहर भागने लगीं जिसके बाद पुलिस ने उनका पीछा करके पकड़ा। इसी क्रम में शोरगुल हुई और आस पास के लोग बाहर आ गए. इसके बाद वकील प्रियंका शुक्ला ने कुछ लड़कियों को घायल देखा उन्होनें पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए कहा कि एचआईवी पॉजिटिव बच्चों को एक सामान्य शेल्टर होम में भेदभाव का सामना करना पड़ेगा। मगर उन पुलिस द्वारा हमला किया गया, हिरासत में लिया गया और उन्हें पुलिस स्टेशन ले जाया गया।

आसपास के रहने वाले लोगों ने पुलिस की कार्रवाई को चुपके से वीडियो बना लिया। वीडियो में स्पष्ट रूप से लड़कियों को बालों से घसीटते हुए दिखाया जाता है, ले जाया जाता है। उन्हें वाहनों में डाल दिया जाता है और ऐसा दुर्व्यवहार इसलिए क्योंकि पुलिस कार्रवाई के दौरान लड़कियों ने सामूहिक रूप से विरोध किया। फर्श पर बच्चियों के कान के छल्ले, हेयर बैंड, मास्क और अन्य सामान फर्श पर बिखरे हुए दिखाई दिए जो इस बात का प्रमाण हैं कि पुलिस ने बल प्रयोग किया। ‘अपना घर’ अधीक्षक दीपिका सिंह ने स्थानीय मीडिया को बताया कि पुलिस और कर्मचारियों ने बच्चों को बाहर खींच लिया और अधिकारियों ने सक्षम अधिकारी द्वारा जारी निष्कासन आदेश की एक प्रति प्रदान करने से भी इनकार कर दिया।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए, बिलासपुर के पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि ‘अपना घर ’में रहने वाली 11 नाबालिग लड़कियां एचआईवी पॉजिटिव हैं और कलेक्टर के आदेश के आधार पर महिला और बाल विभाग, पुलिस और प्रशासन की एक टीम सोमवार सुबह ईमारत खाली करने के लिए गई थी। लड़कियों को सरकारी आश्रय गृहों में स्थानांतरित किया जा रहा है और अन्य जिलों के लोगों को वहां स्थानांतरित किया जाएगा।

पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि आश्रम के लोगों ने न सिर्फ सरकारी काम में बाधा पहुंचाने की कोशिश की बल्कि खुद महिला वकील प्रियंका शुक्ला ने पुलिस वालों के साथ मारपीट की कोशिश की। इसकी वजह से उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।

लड़कियों को पुलिस द्वारा पीटा गया या घसीटा गया के सवाल पर, एसपी ने कहा कि लड़कियों ने “खुद को चोट पहुंचाई” क्योंकि ऐसा लग रहा था कि उन्हें कार्यकर्ता द्वारा “ब्रेनवॉश” किया गया था और उन्होंने इसे स्थानांतरित करने से इनकार कर दिया। उन्होंने दावा किया कि अधिकारियों और पुलिस ने सहयोग किया था, लेकिन उन्होंने विरोध किया और खुद को चोट पहुंचाई, उन्होंने दावा किया।

संपर्क करने पर महिला और बाल विकास सचिव आर प्रसन्ना ने टीओआई को बताया कि “एनजीओ के निदेशक ने खुद लिखित में दिया है कि वह उस एनजीओ को चलाने में सक्षम नहीं है जो उस जिला स्तर की टीम के निरीक्षण में गया था, जिसके बाद तत्कालीन कलेक्टर संजय अलंग ने उनकी मान्यता रद्द कर दी थी पिछले साल।” अब, लड़कियों को सरकारी संस्थान में स्थानांतरित किया जा रहा है, जहां उन्हें समावेशी संस्कृति में रहने की सलाह दी जाती है, लेकिन अगर एचआईवी पॉजिटिव लड़कियों का आरोप है कि पहले उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा, तो इसे सुलझाया जा सकता है। हम अलग आश्रय गृह विकसित कर सकते हैं यदि वांछित है, ”उन्होंने कहा।

संस्था के संचालक संजीव ठक्कर ने एनडीटीवी से बातचीत में कहा कि हमने सरकार से अनुदान मांगा जिसके ऐवज में रिश्वत मांगी गई। हमसे कहा गया कि 30 परसेंट रिश्वत देना होगी। हमने शिकायत की गुहार लगाई कि एड्स पीड़ित बच्चों के लिए राज्य की एकमात्र संस्था है जिसे मदद के बजाए आप बंद कर देना चाहते हैं। यह मामला हाईकोर्ट तक गया, जहां कोर्ट ने कलेक्टर को मामला सुलझाने के लिए कहा।

संस्था की पैरवी करने वाली वकील प्रियंका शुक्ला ने कहा कि अचानक जुलाई में नोटिस आया है। हर जिले से लोग आने लगे। कोविड के वक्त में आना क्या सही है। बच्चों ने कहा नहीं जाना चाहते, पुराने अनुभव बुरे हैं। हमने इस बारे में कलेक्टर से मुलाकात का समय मांगा, लेकिन नहीं मिला। क्या आदेश है वो बताया नहीं जाता है। सरकारी अधिकारियों से हमने भी जवाब मांगने की कोशिश की लेकिन कैमरे पर जवाब नहीं मिला। कहा गया कि संस्था में किसी नियम का पालन नहीं हो रहा है। अगर बच्चियों को कुछ हुआ तो कौन जिम्मेदार होगा. इस पर भी संस्था के अपने सवाल हैं।

अपाना घर, जो आधिकारिक रिकॉर्ड में “हमारा घर” है, सामाजिक संगठनों और व्यक्तियों के समर्थन के साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा संचालित एचआईवी रोगियों के लिए राज्य का एकमात्र आश्रय घर है।

इससे पहले जिला कलेक्टर के निर्देश पर, बिलासपुर जिला बाल कल्याण समिति ने मामलों की जांच की, कुछ विसंगतियां पाईं और कुछ अन्य केंद्रों पर “हमारा घर” पंजीकरण और कैदियों को स्थानांतरित करने की सिफारिश की। हालाँकि, संस्था ने उच्च न्यायालय को आदेश को चुनौती दी लेकिन न्यायालय ने याचिकाकर्ता को किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 के प्रावधानों के तहत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष एक प्रतिनिधित्व करने का निर्देश दिया।

बाद में, इस वर्ष मार्च में जिला कलेक्टर द्वारा पारित एक आदेश में कहा गया था कि दोनों पक्षों- संस्था और बाल कल्याण समिति को इस वर्ष 16 मार्च को सुना गया था। दूसरी जांच के रूप में यह भी स्थापित किया गया कि संस्था में अनियमितताएँ थीं, बच्चों को अन्यत्र स्थानांतरित करने के लिए नवंबर 2019 के बाल कल्याण समिति के निर्णय को बरकरार रखा गया था और पिछले आदेश में किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी।

प्रियंका शुक्ला ने बताया कि उनसे कहा गया कि संस्था में ओवन नहीं है, फ्रिज नहीं है। जबकि यहां बच्चों की लाइब्रेरी है, 14 शौचालय हैं… लेकिन अधिकारी कहते हैं व्यक्तिगत नहीं है। संस्था का दावा है कि फिलहाल 14 बच्चों को रखने में करीब 75 हजार रुपये खर्च आता है, जिसे कुछ समाजसेवी मिलकर उठाते हैं।

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