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ये हैं हमारे देश के ‘रीसायकल मैन’ जो पीपीई किट और मास्क से सख्त ईंट बना रहे हैं, जानिए कैसे?

तर्कसंगत

August 27, 2020

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COVID-19 महामारी के बीच मेडिकल कचरे के ढेर से लड़ने में मदद करने के लिए, ‘रीसायकल मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से मशहूर बिनिश देसाई पीपीपी किट और नॉन वोवन फैब्रिक से बने मास्क से पर्यावरण के अनुकूल ईंटें बना रहे हैं, जिसका उपयोग कंस्ट्रक्शन में किया जा सकता है।

तर्कसंगत से बात करते हुए 27 वर्षीय बिनिश कहते हैं  “जब लॉकडाउन शुरू हुआ, तो हर कोई इस बारे में बात कर रहा था कि प्रकृति कैसे ठीक हो रही है, लेकिन मुझे एक तरह की एक पर्यावरणीय चिंता थी क्योंकि मुझे लगा था कि बड़ी मात्रा में पीपीई किट का उपयोग एक नए प्रकार का प्रदूषण पैदा करेगा – पीपीई प्रदूषण जो अब हम कर रहे हैं. इसी चिंता के साथ और उप्पय खोजने की लग्न से उन्होनें गुजरात में इको-इलेक्टिक टेक्नोलॉजीज के नाम से कम्पनी की शुरआत की है।

 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) की एक रिपोर्ट के अनुसार, COVID-19 संबंधित बायोमेडिकल कचरे का भारत प्रति दिन लगभग 101 मीट्रिक टन का उत्पादन करता है। यह चिकित्सा अपशिष्ट देश के सामान्य बायोमेडिकल कचरे जी कि 609 मीट्रिक टन / दिन के अलावा है जो देश में उत्पन्न होता है।

अप्रैल में, बिनिश ने इन सामग्री का अध्ययन करने के लिए, अपने परिवार से इस्तेमाल किए गए मास्क को इकट्ठा करना शुरू किया, जो गैर-बुने फाइबर से बने थे। उन्होंने अपने घर की प्रयोगशाला में इसपर रिसर्च किया और अंत में पी-ब्लॉक 2.0 नामक ईंटों के एक रूप को अंजाम दिया।

 

पी-ब्लॉक 2.0 ईंट

आधी से ज्यादा ईंटें कटी हुई पीपीई और फेस मास्क सामग्री से बनी हैं। देसाई बताते हैं, “पूरे उत्पाद का दो-तिहाई हिस्सा पीपीई और फेस मास्क सामग्री है और बाकी रद्दी कागज़ है, जिसका उपयोग हम पहले भी ईंटों को बनाने में कर रहे हैं। इसलिए हम इन ईंटों को 2.0 कहते हैं।”

 

 

देसाई का कहना है कि ये ईंटें उन पिछली ईंटों से भी बेहतर हैं जो वे बना रहे थे और बेच रहे थे। “इस नई ईंट में नयी बात यह है कि इसकी मज़बूती और ताकत बढ़ गई है। भले ही ताकत बढ़ गई है, मगर दाम अभी भी वही है – प्रति ईंट 2.8 रुपये। ईंट का आकार भी बड़ा है – 12 x 8 x 4 इंच। उनके द्वारा बनाये गए ईंट वैसे तो पारंपरिक ईंटों से बेहतर थे ही मगर अब यह और भी अधिक उन्नत और बेहतर है, “देसाई बताते हैं।

इससे पहले 2010 में, देसाई अपनी पी-ब्लॉक ईंटों के लिए सुर्खियों में आए थे, जो औद्योगिक कागज के कचरे और गोंद कचरे से बने थे।

 

ये ईंटें कैसे बनाई जाती हैं?

इन ईंटों को बनाने के लिए, देसाई कहते हैं, उन्हें प्रति वर्ग फुट 7 किलोग्राम बायो मेडिकल वेस्ट की आवश्यकता होती।

इस बायो मेडिकल वेस्ट को इकठ्ठा करने के लिए, देसाई की टीम अस्पतालों, पुलिस स्टेशनों और बस स्टॉप जैसे विभिन्न स्थानों में ‘इको बिन्स’ रखती है।

देसाई कहते हैं, “इन इको-बिन्स में पीपीई और फेस मास्क इकट्ठा किये जाते हैं। एक अच्छी बात ये है की इन बिन्स में इंडिकेटर भी है, जो हमें बताएगा कि बिन भरा हुआ है या नहीं।” एक बार बिन भर जाने के बाद, इससे पहले कि वे इसे अपने इस्तेमाल में लाएं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, वे इसे 72 घंटे तक आइसोलेशन में रखते हैं।

 

 

 

बिनिश बताते हैं “एक बार जब यह हमारे कम्पनी में  लाया जाता है, तो हम इसे कीटाणुनाशक कक्ष में खोल देंगे, इसे कीटाणुरहित कर देंगे, और फिर इसे छोटे टुकड़ों में फाड़ देंगे। फिर इसे बाइंडर और हमारे कागज के कचरे के साथ मिलाया जाएगा। इसे तब वांछित सांचों में ढाला जाएगा और इसे प्राकृतिक रूप से सूखने देते हैं। एक बार जब वे तैयार हो जाते हैं, तो हम उत्पादों को बेचना शुरू कर करते है।”

 

 

सुरक्षा और सावधानियां

चूंकि वे चिकित्सा अपशिष्ट के साथ काम कर रहे हैं, इसलिए देसाई सुरक्षा सावधानियों को सर्वोपरि रखते हैं। देसाई कहते हैं, “72 घंटे तक सामग्री को आइसोलेशन में रखने के अलावा, एक बार जब यह हमारे तक पहुंचती है, तो इसे छूने से पहले कीटाणुनाशक से दो बार सैनिटाइज़ किया जाता है।”

देसाई की टीम विभिन्न कॉलेजों के साथ भी सहयोग कर रही है जो अपने द्वारा विकसित किए गए कीटाणुशोधन कक्षों पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा, बाइंडर के साथ मिलाने के बाद, वे इसे 24 घंटे तक सूखने के लिए रखते हैं। इसके अलावा, उनकी निर्माण इकाई में, सभी मजदूर अतिरिक्त सुरक्षा के लिए पीपीई किट पहनकर काम करते हैं।

देसाई का कहना है कि वे सितंबर के दूसरे सप्ताह से पी-ब्लॉक 2.0 का उत्पादन शुरू कर देंगे। वे कहते हैं, “हमने इको-बिन्स के निर्माण के लिए आर्डर  दिए हैं। COVID-19 स्थिति के कारण, बिन्स  की खरीद की प्रक्रिया में कुछ देरी हो रही है,” वे कहते हैं।

देसाई कहते हैं कि वे सूरत और वलसाड में बिन्स लगाने के लिए स्थानीय निकायों के साथ बातचीत कर रहे हैं। “देसाई ने कहा,” सितंबर के पहले सप्ताह में, हम सब्सक्रिप्शन बॉक्स भी लॉन्च करेंगे। इसलिए, भारत या विदेश में बैठे कोई भी व्यक्ति इन बॉक्स को ऑर्डर कर सकता है। वे इसे इकट्ठा कर सकते हैं और इसे वापस भेज सकते हैं और हम इसे रीसायकल करेंगे।”

देसाई की टीम ने पिछले समय में 150 से अधिक उत्पादों का निर्माण किया है जिसमें ईंट भी एक हैं। उनकी टीम ने 100 अलग-अलग प्रकार के कचरे जैसे मेटल वेस्ट, कपड़े का वेस्ट, कॉफी वेस्ट, और कागज के कचरे के साथ भी काम किया है। इतना ही नहीं उन्होंने सैलून के लिए फर्नीचर बनाने के लिए सैलून से बाल एकत्र कर बनाये हैं।

 

 

इस क्षेत्र में उद्यम करने की उनकी प्रेरणा के बारे में बोलते हुए, देसाई याद करते हैं, “एक बच्चे के रूप में, मेरा पसंदीदा कार्टून कैप्टन प्लैनेट और डेक्सटर की प्रयोगशाला थी। इसलिए, मैं हमेशा से घर पर अपनी खुद की ‘डेक्सटर लैब’ रखना चाहता था। यह भी एक कारण है। मेरे पास घर पर एक लैब है जहां मैं काम करता हूं, यहां तक ​​कि लॉकडाउन के दौरान भी, और वह वह जगह है जहां से ईंट आई थी। ”

जब देसाई 11 साल के थे, तब एक  बार च्यूइंग गम उनकी पतलून में चिपक गया था। जिसे उन्होनें कागज के एक टुकड़े में लपेट दिया, मगर फेंकना भूल गए। हालांकि, जब उन्हें याद आया तो उन्होंने पाया कि गोंद और कागज एक साथ चिपके हुए थे और एक ब्लॉक के रूप में कठोर हो गए थे। इसी से उन्हें कागज और गोंद का उपयोग करके ईंटें बनाने का विचार आया। अनोखा है न !!!

 

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