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लक्ष्यम: बच्चों को शिक्षा देना और उनकी माँ को आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनाने का एक प्रयास है

तर्कसंगत

September 2, 2020

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लक्ष्यम की संस्थापिका राशि आनंद ने तर्कसंगत से कहा  “मैं स्नातक के लिए झारखंड के रांची से दिल्ली आ गई थी,यह मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। मैंने कई गैर सरकारी संगठनों के साथ स्वेच्छा से काम करना शुरू किया लेकिन ट्रैफिक सिग्नल पर हरी बत्ती का इंतजार करते हुए वंचित बच्चों को जब मैंने देखा और उनके साथ मेरा जो अनुभव था उस घटना ने मेरे मन में कई सवाल खड़े कर दिए और तभी मैंने यह फैसला किया कि मुझे  इनकी किसी भी प्रकार मदद करनी ही होगी।”

 

लक्ष्यम एक नाॅट-फाॅर-प्राॅफिट संगठन है, जिसे 2012 में स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य सड़क पर रहने वाले बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा प्रदान कराना और महिलाओं को रोजगार के साथ सशक्त बनाना है।

 

 

संगठन कई सड़क पर रहने वाले बच्चों और दिल्ली के बस्तियों में रहने वालों के लिए तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास प्रदान करता है, लक्ष्यम समाज के पिछड़े वर्ग के समुदायों की महिलाओं को व्यावसायिक कौशल का प्रशिक्षण देकर उन्हें सशक्त बनाने की दिशा में काम करता है साथ ही साथ रोज़गार के अवसर पैदा करने में सहायता करेगा।

 

समाज के पिछड़े तबके के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के उद्देश्य से निरंतर प्रयासों के साथ संगठन ने 3 लाख से अधिक लोगों  कि सहायता की है और अब दिल्ली उत्तराखंड और मध्य प्रदेश सहित 17 राज्यों में काम रहा है।

 

 

“एक ऑटो या ई-रिक्शा में यात्रा करते समय ट्रैफिक सिग्नल पर मुझे कई बच्चे भीख मांगते हुए दिखते थे, वह पैसे मांगते हुए या कुछ बेचने के लिए  कभी-कभी  मेरा हाथ भी छूने की कोशिश करते थे | जैसे ही रोशनी हरी हो जाती वह अपने कोने में वापस चले जाते और खाली बोतलों टायरों और रंगों के साथ खेलना शुरू कर देते”- राशिआनंद ने तर्कसंगत को बताया।

 

उस घटना के बाद उन्होंने इस बात पर गौर किया कि उनके परिवार में ऐसे कई खिलौने थे जिनको कि बच्चे अब इस्तेमाल नहीं करते थे। वो खिलौने या तो टूट गए थे, या बच्चे बड़े हो गए थे या फिर बच्चों को कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी। जब उन्होंने इसी चीज़ को उन भीख मांग रहे बच्चों की नज़र से देखा तभी उन्होंने या काम करने का फैसला किया।

 

अपने कॉलेज के दिनों के दौरान ही राशि ने ऐसे बच्चों के साथ जुड़ने और उन्हें भीख मांगने, पिकपॉकेटिंग और मादक पदार्थों की तस्करी जैसी गतिविधियों में शामिल होने से रोकने के लिए खिलौने और किताबें इकट्ठा करने के अभियान के साथ पहल की। मगर जब अपने अभियान को औपचारिक रूप देने और अपने इस नेक कोशिश को और लोगों तक पहुँचाने की योजना बनाई तो उस समय उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

 

चूँकि मैं उम्र में छोटी थी तो बहुत कम लोगों ने मेरी सोच और योजनाओं को गंभीरता से लिया उनमें से अधिकांश का तो यह मानना था कि एक एनजीओ चलाना एक अनुभवी और उम्र दराज व्यक्ति का काम है और मेरे जैसा युवा यह नहीं कर पाएगा। मुझे अपने एनजीओ  को खड़ा करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी।

 

राशि ने कहा  “मेरी मां जो कि एक सामाजिक सुधारक भी रही है, उनके साथ की वजह से मेरे सपने सच होने लगे, जो कि मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी।”

 

हालांकि, शुरू की रणनीति और कोशिशें नाकाम रहे थे। राशि ने कहा, कि वह एक चुनौती पूर्ण और कठिन समय था जब मैंने अपनी टीम के साथ समाज के वंचित लोगों के लिए ज़मीनी तौर पर काम करना शुरू किया।

 

“यह एक दुष्चक्र है जिसका सामना मैंने तब किया जब मैं स्किल डेवलपमेंट के लिए बच्चों और उनके परिवारों से संपर्क कर रही थी ताकि उन्हें जूता पॉलिश करने, भंगार उठाने और कलम बेचने जैसे कामों का सहारा न लेना पड़े। राशि ने कहा, “जब हमने उन बच्चों के माता-पिता से इस बात का आग्रह किया की उनके बच्चे काम करने और परिवार को खिलाने के लिए कमाई की बजाय शिक्षा ग्रहण करें ,तो उनके माता-पिता ने मुझे 1 घंटे के आधार पर उन्हें पैसे देने के लिए कहा। मैंने इस चीज़ की उम्मीद नहीं की थी कि उन्हें पढ़ाने के लिए मुझे उन्हें पैसे देने होंगे।

 

चर्चा के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि एक बच्चा भीख मांगने के माध्यम से एक बड़े आदमी से अधिक कमा सकता है और इस तथ्य ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।”

 

 

इसी दौरान मुझे इस बात का भी अहसास हुआ कि ऐसे बच्चों की माताओं की उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है और ऐसे समुदायों की महिलाओं को गरीबी से मुक्त करने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाना सबसे अहम कदम है।

 

“इसके लिए हमने हस्तशिल्प उत्पादों और सिलाई  के कौशल विकास शिक्षा के कार्यक्रमों के साथ शुरुआत की। इसके अतिरिक्त यह सुनिश्चित करने के लिए कि महिलाएं वित्तीय निर्णय लेने में सक्षम है, हमने कंसल्टेशन सेशन भी शुरू किया और साथ-साथ वित्तीय प्रशिक्षण देना भी शुरू किया”, राशि ने बताया।

 

संगठन तीन मुद्दों के साथ अपने सामाजिक लक्ष्यों की दिशा में काम कर रहा है – (बटरफ्लाई कार्यक्रम) जो सड़क पर रहने वाले बच्चों और किसी कारण वश अपनी शिक्षा ना पूरा कर पाने वाले बच्चों के लिए “रेमेडियल एजुकेशन” सेंटर प्रदान करता है, (टॉय लाइब्रेरी) जो कि प्रत्येक बच्चों को खिलौने और किताबें प्रदान करता है, तथा (रूह कार्यक्रम ) जिसमें महिलाओं को शिक्षित करने के लिए उन्हें आत्मविश्वास के साथ जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है।

 

 

झुग्गी – झोपड़ियों में रहने और अपने बच्चों को भिखारी बनाने के लिए मजबूर करने वाले लोगों की सामाजिक- आर्थिक स्थिति पर बोलते हुए राशि ने समझाया कि राष्ट्रीय राजधानी के एक समृद्ध पड़ोस में स्थित एक बस्ती में पानी, स्वच्छता और गुणवत्ता जीवन का भारी  अभाव है। वह छोटे स्थानों में रहकर अपना गुजर-बरस करते हैं तथा जीवन की बुनियादी ज़रूरतों के लिए वह हर रोज संघर्ष करते हैं।

 

‘हमें शुरुआत से शुरू करना था। ऐसे बच्चों को यकीन दिलाना उनके अंदर आत्मविश्वास जगाना हमारा पहला कदम था। बाद में हमने उनका ध्यान और रुचि हासिल करने के लिए टॉय लाइब्रेरी ( खिलौना पुस्तकालय ) का इस्तेमाल किया आखिरकार, हम उन्हें पढ़ाई के लिए तैयार कर पाए।’

 

 

राशि ने बताया “ब्रिज एजुकेशन मॉडल केजरिये उन्होनें ने उन बच्चों की अधूरी शिक्षा को पूरा करने का प्रयास किया। हम वह शिक्षा प्रदान करते हैं, जिसके द्वारा बच्चा विद्यालय प्रवेश के लिए योग्य हो जाए तथा “ रेमेडियल एजुकेशन मॉडल”  के द्वारा हमारी केंद्रों में कक्षा 5 तक के छात्रों को पढ़ाया जाता है।”

 

कोरोनावायरस महामारी की समस्या के ऊपर चर्चा करते हुए, युवा कार्यकर्ता राशि ने “तर्कसंगत” को बताया कि उनकी टीम लॉकडाउन के कारण सबसे अधिक प्रभावित समुदायों की मदद करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही है।

 

 

हमने ज़रूरतमंदों को पका हुआ भोजन और सूखा राशन वितरित किया लेकिन लोगों ने हमसे अपने परिवारों को खिलाने, दवाइयाँ और बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काम माँगना शुरू कर दिया। यह लोग दैनिक वेतन भोगी थे और लॉकडाउन इनके लिए किसी विपदा से कम नहीं है।

 

राशि ने कहा ,”उनकी टीम ने मास्क बनाने के काम में आने का फैसला किया जो इन श्रमिकों की मदद करेगा और संकट के समय में उपयोगी भी होगा। हमें लगभग 10000 – 15000 मास्क के ऑर्डर मिले जो लक्ष्यम से जुड़ी महिलाओं द्वारा बनाया गया था और उनके द्वारा किए गए काम के लिए उन्हें वेतन भी दिया गया। ”

 

राशन और भोजन वितरित करते समय प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग किया जा रहा था, इसके पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में रखते हुए संगठन ने इस तरह के बैगों के उपयोग को रोकने का फैसला किया और श्रमिकों द्वारा सिले कपास के बैग का उपयोग करना शुरू कर दिया। उन्होंने अन्य संगठनों को भी इस बात के लिए जागरूक करना शुरू कर दिया।

 

 

कोविड-19 के प्रकोप और बदलती शिक्षा प्रणाली को अपनाने की योजना के कारण उत्पन्न असफलताओं को देखते हुए,  राशि ने कहा ,”सभी प्रयास और योजनाएं ऑनलाइन शिक्षा के साथ अनिश्चित लगती हैं। तीन महीनों से बच्चों का स्कूल आना बंद है, तथा ऐसे बच्चों के माता-पिता के लिए स्मार्ट फोन खरीदना संभव नहीं है, ऑनलाइन कक्षा में स्मार्ट फोन, लैपटॉप और डाटा कनेक्टिविटी जैसी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर ( डिजिटल बुनियादी ढाँचा) आदि चीजें शामिल होती है , उनके माता-पिता ऐसी सुविधाएँ देने के लिए सक्षम नहीं हैं।

 

राशि ने कहा, “हमने महसूस किया है कि डिजिटल और प्रौद्योगिकी शिक्षा गतिशील सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण है और ऑनलाइन कक्षाओं के संचालन के लिए तैयार हो रही है। हमने कक्षाओं को शुरू करने के लिए गैजेट्स की व्यवस्था करने के लिए ऑनलाइन फंड ( निधि) इकट्ठा करने वाले कार्यक्रम का आयोजन किया हैं। ”

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