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कोरोना अन्धविश्वास: कोरोना महामारी से बचने के लिए ननद दे रही है ‘भौजी साड़ी’

तर्कसंगत

Image Credits: Bhaskar

September 14, 2020

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एक तरफ देश के कई राज्यों में कोरोना के आंकड़े आसमान  छूते जा रहे हैं। दूसरी तरफ देश मेमिन अंधविश्वास के कारण इस बीमारी के  बढ़ने की आशंका और बढ़ते जा रही है।

ताज़ा मामला झारखंड के रामगढ़ जिले में देखने को मिला। जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं कोरोनावायरस पर कंट्रोल के लिए ‘कोरोना माई’ की पूजा से लेकर ‘भौजी साड़ी’ जैसे नुस्खा आजमा रही हैं। पिछले एक सप्ताह के दौरान झारखंड के कई जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में यह अफवाह फैली हुई है कि विवाहिता ननद अपने मायके की भाभियों के लिए साड़ी और श्रृंगार की सामग्री भेजेंगी तो उनके परिवार को कोरोनावायरस से बचाया जा सकता है। यही वजह है कि हर दिन भीड़ में महिलाएं नदियों में स्नान के बाद मंदिर में पूजा करने पहुंच रहीं। इसके बाद मायके की भाभियों को साड़ी के साथ श्रृंगार सामग्री भिजवा रही हैं। रविवार को रामगढ़ जिले के चितरपुर देवी मंडप में ऐसे ही सैकड़ों ननदों की भीड़ पूजा-अर्चना के लिए देखी गई। सभी के हाथों में साड़ी और श्रृंगार का सामान था।

 

सोशल डिस्टेंसिंग का नहीं हो रहा है पालन

भौजी साड़ी का कॉन्सेप्ट कहां से आया, यह बताने की स्थिति में कोई नहीं है। लेकिन, इस नुस्खे को पूरा करने के लिए मंदिरों में पूजा के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह से धज्जियां उड़ रही हैं। कोई भी महिला मास्क पहने हुए नहीं दिख रही है। आस्था अपनी जगह है लेकिन महिलाओं को कोविड-19 से बचाव के लिए जारी दिशा-निर्देशों का पालन जरूर करना चाहिए।

 

क्या कहती हैं महिलाएं

भौजी साड़ी के साथ पूजा के लिए रविवार को चितरपुर स्थित देवी मंडप आई मायल की कौशल्या देवी ने बताया कि हमारे मायके कसमार (जिला बोकारो) से भी ननंद ने साड़ी और श्रृंगार की सामग्री भेजी है, इसलिए हमें भी फर्ज बनता है कि हम भी अपनी भाभियों के लिए साड़ी भेजें। महिला के अनुसार, परिवारों को इस महामारी में बीमारी से बचाने के लिए यह करना जरूरी है। पूजा करने पहुंची एक महिला ने कहा कि ननद अपनी भाभियों को साड़ी भेज रही हैं। मुझे भी साड़ी मिली है, मैं भी पूजा करके साड़ी भेज रही हूं। साड़ी भेजने से क्या होगा, पूछने पर महिला ने बताया कि मुझे ये तो नहीं पता लेकिन सभी महिलाएं कर रही हैं तो मैं भी ऐसा कर रही हूं।

उधर, इस आस्था और अंधविश्वास के कारण कपड़ों की दुकानों में लॉकडाउन के कारण धीमी पड़ी बिक्री ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है। बाजार के कई दुकानदारों ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान दुकानें बंद थी, कमाई नहीं हो रही थी। अब चार-पांच महीनों के बाद दुकानें खुली हैं तो आस्था ही सही, साड़ियों और श्रृंगार के समानों की बिक्री ने रफ्तार पकड़ ली है।

 

 

अंधविश्वास और रुढ़ीवादिता के चक्कर में कर्ज ले रही है महिलाएं

छात्र संघ के उपाध्यक्ष अनुराग भारद्वाज की मानें तो राज्यभर के ग्रामीण महिलाएं अंधविश्वास और रुढ़ीवादिता के चक्कर में पड़कर भौजी साडी पहुंचा रही है। इसके लिए महिलाएं कर्ज भी ले रही है। इस अंधविश्वास में ज्यादातर राज्य के आदिवासी मूलवासी समाज की महिलाएं फंस रही है।

इसे लेकर रविवार को आजसू पार्टी के विभावि उपाध्यक्ष अनुराग भारद्वाज सचिव सुबिन तिवारी ने चिता जताते हुए कहा कि राज्यभर के ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं आज भी अंधविश्वास के चक्कर में पड़कर भौजी साड़ी पहुंचा रही हैं। इसके लिए महिलाएं कर्ज भी ले रही हैं। इस अंधविश्वास में ज्यादातर राज्य के आदिवासी मूलवासी समाज की महिलाएं हैं। गांव की कई महिलाएं से भाभी को साड़ी पहुंचाने के संबंध में पूछने पर किसी के पास कोई विशेष जानकारी तक नहीं मिली। सिर्फ एक दूसरे के देखा देखी में सभी ननद अपने-अपने भाभी को भौजी साड़ी पहुंचाने में लगी हैं। साथ महिलाओं ने बतलाया कि बहुत जगहों से महिलाएं साड़ी लेकर अपनी भाभियों को दे रहे है ताकि कोई अनहोनी न घटे।

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