मेरी कहानी

मेरी कहानी: मैं गोरी दिखना चाहती थी, घरेलु हिंसा से भागना चाहती थी, डिप्रेशन से जूझ रही थी

तर्कसंगत

September 22, 2020

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एक पारंपरिक और पुरुष प्रधान परिवार में जन्मे होने के कारण पितृसत्ता मेरे बचपन का एक प्रमुख हिस्सा था और अब भी है। जन्म से सांवली होने के कारण, मैं अपने ही घर में एक आउटकास्ट की तरह महसूस करती थी। जवानी की देहलीज़ पर Fair & Lovely मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी। लेकिन गोरे रंग का जुनून अब लेजर ट्रीटमेंट और पॉपिंग पिल्स की ओर रुख कर चूका था और 20 की उम्र तक आते आते तो दूल्हे की तलाश भी मेरे लिए एक जुनून बन चुकी थी।

25-28 साल की उम्र के बीच, मैं 10 ‘होनेवाले’  पतियों से मिल चूक थी। जिनके लिए मुझे हर बार अच्छे नए कपड़े पहनना, सजना  और कॉफी परोसना पड़ता था। चौंकने वाली बात ये कि मुझे मेरी त्वचा के रंग के कारण, मेरी लम्बाई के कारण “रिजेक्ट ” किया गया था, इस कारण से भी कि मैं नॉन वेज खाती थी, क्योंकि मैंने शराब पिया था और इन सारे कारणों में सबसे अच्छा था “क्योंकि मैं लड़के से ज़्यादा पढ़ी लिखी थी”, मेरे पास आर्किटेक्चर में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री है। एक समय बाद तो मैं अपने बारे में सारी बात बताती भी नहीं थी क्यों की कहीं मुझे “रिजेक्ट ” न होना पड़े ।

इतने समय बीत जाने के बाद मैं अपने शरीर पर काम करना शुरू कर दिया था और मैंने रोजाना एक्सरसाइज करने के लिए दो घंटे दिया करती थी। आखिरकार, खुद पर शक करने के 3-4 साल बाद, अपनी पहचान, अपना सेल्फ कॉन्फिडेंस खोने के बाद, मैंने किसी ऐसे व्यक्ति से शादी करने का फैसला किया जो मुझे किसी ब्रोकर के मध्य से मिलने वाला था। उस समय, यह सही विकल्प की तरह लग रहा था। इस समय तक मैं खुद से भी बहुत निराश थी, मेरे दोस्तों की भी शादी हो रही थी, फॅमिली से भी ‘सेटल डाउन’  होने का दबाव था और निश्चित रूप से मेरी भी अपनी ज़िंदगी से कुछ अपेक्षाएं थीं।

फिर वो दिन आ ही गया जब लगा कि मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ा सवाल का जवाब मुझे मिलने जा रहा है। मुझे मेरा दुलह मिलने वाला था। जैसा कि हमारे यहाँ की पारम्परिक शादियों में  होता है शादी की मेजबानी मेरे पिता ने की थी। मैं शादी के तुरंत बाद ऑस्ट्रेलिया  चली गयी और तब से मेरी ज़िन्दगी की कश्ती जैसे तूफानी समंदर में उतर गयी थी। मेरे पास काम करने के लिए वीज़ा नहीं था इसलिए मैं मुख्य रूप से खाना बना रही थी और घर की देखभाल कर रही थी। मैंने एक जिम मेम्बरशिप ली थी जो समय बिताने और सेहत के लिए मददगार थी। उस दौरान मैंने ऑस्ट्रेलियाई स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग एसोसिएशन से मान्यता प्राप्त कोच के रूप में एक सर्टिफिकेशन कोर्स भी किया।

अपने पूर्व पति के साथ रहने के एक महीने के भीतर, वो मुझसे एक घर, कार आदि की  मांग करने लगे। मुझे यह बेतुका लगा और मैं ऐसी किसी भी चीज़ के लिए तैयार नहीं थी। जब मैंने विरोध किया तो मुझे मारा गया। शुरू शुरू में मुझे कई घंटे के लिए घर से बाहर बंद कर दिया जाता था। मैं अपने बीच हुए बातचीत को रिकॉर्ड करती थी। उस आदमी में ये नया बदलाव मुझे सुरक्षित महसूस नहीं करता था; जब उसे इस  बात का पता चला तो उसने मेरा फोन जब्त करने की कोशिश की।

जब मैंने इंकार किया तो मुझे ‘काटा’ करता मेरा फोन छीन कर उसे वॉशबेसिन में बहाने की धमकी देता। फिर वह मुझे बालकनी पर खींच कर ले जाता और मुझे बाहर से बंद कर दिया करता। बाहर 6-डिग्री तापमान थी और मैं सादे पजामे में पूरी रात बाहर थी।

इस समय पर, मेरे अंदर कुछ बदल गया, वो नजरिया जिससे में उसे देखती थी, खुद को देखती थी और जिस नज़रिये से मैं अपनी ज़िन्दगी को देखती थी सब बदल गया। इस घटना के दो सप्ताह के बाद मैं बेंगलुरु वापस लौट आयी और वीजा और नौकरी पाने तक ऑस्ट्रेलिया वापस नहीं जाने का फैसला किया।

अपनी वापसी पर, मैंने बैंगलोर में स्ट्रेंग्थ और कंडीशनिंग की कोचिंग शुरू की। यहाँ, मैं कुछ एथलीटों को ट्रैन किया करती थी। मुझे कहा गया था कि मैं अपने पति के साथ रहने के लिए अपना जॉब छोडूं और वापस ऑस्ट्रेलिया लौटजाऊं क्योंकि यही एक महिला को करना चाहिए। चुप रहो और सहो। लेकिन मेरे अंदर एक आवाज थी, जिसने मुझसे कहा कि अगर मैं खुद को बचाना  चाहती हूँ तो मुझे स्वार्थी होना होगा और अपने लिए कुछ करना होगा।

आज मैं कह सकता हूं, मैं जीत गयी। मैंने अपने पूर्व पति को माफ करने की कोशिश की, लेकिन मैं  नहीं कर पायी और मैंने तलाक के लिए आवेदन किया। मेरे परिवार ने मेरा विरोध किया और उनमें से कुछ ने मुझसे बात करना भी बंद कर दिया। मुझे ‘आर्किटेक्ट’ की जगह  “ट्रेनर” बनने के लिए भी कई सारी आलोचना का सामना करना पड़ा, लेकिन यह मुझे रोक नहीं पाया। इन सब हालात में मैं डिप्रेशन से भी जूझ रही थी लेकिन मैं इसके लिए तैयार थी की मैं डिप्रेशन को भी हराकर बाहर आउंगी और मुझे पता था कि मैं ज़िंदा रहूंगी ।

मेरे काम ने मुझे बचाया, कोचिंग ने मुझे बचाया, प्रशिक्षण ने मुझे बचाया, मेरे एथलीटों ने मुझे बचाया और सबसे महत्वपूर्ण बात, मैंने खुद को बचाया। एक कहावत है, “आप कभी नहीं जानते कि आप कितने मजबूत हैं जब तक कि मजबूत होना एकमात्र विकल्प नहीं होता ।” मैंने यह अनुभव किया और यह एक सुंदर अनुभव था। कोई फर्क नहीं पड़ता कि जीवन में आपको कितनी भी मुश्किलों का सामना करने को मजबूर करे, आपको अपना हीरो बनना होगा। हां, मेरे पास एक सपोर्ट सिस्टम थी, लेकिन इस सब के अंत में, संघर्ष मेरा था और मैं बच गयी।

आप सभी को ना कहने का साहस चाहिए! यह कठिन है, लेकिन इसीलिए यह इसके लायक है। एक विफलता आपके ज़िन्दगी की दिशा तय नहीं करती है। मेरे पास अब एक अद्भुत कैरियर है, मैं महिलाओं को मजबूत बनने और मज़बूत महसूस करने में मदद करती हूं। मैं सबसे अद्भुत महिलाओं में से कुछ के साथ काम करती हूं जो सभी बेहद प्रेरणादायक हैं और यह मेरे काम के लिए और अधिक अर्थ जोड़ता है। मुझे अब मेरी ज़िन्दगी का एक प्यार भी मिल गया।

हम दोनों ने लगभग एक जैसी ज़िंदगी जी थी। हम एक साथ ठीक हुए और हम दोनों ने एक साथ जीवन करने का फैसला किया। तो आप देख सकते हैं, यह सिर्फ शुरुआत है और मुझे पता है कि यह सुंदर होगा।

कहानी: शिवा निधि

 

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