मेरी कहानी

मेरी कहानी : दस साल की उम्र में मेरा यौन शोषण हुआ था मगर इसका असर मुझे 19 की उम्र में झकझोर गया

तर्कसंगत

September 25, 2020

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मैं केवल 10 वर्ष की थी जब मेरा यौन शोषण किया गया था। उतनी छोटी उम्र में मुझे पता भी नही कि इसका क्या मतलब है और मैंने इसके बारे में किसी को भी नहीं बताया। मुझे बस इतना याद है कि मैंने अपनी माँ को बताया था कि उस वयक्ति मेरे घर आना मुझे  अच्छा नहीं लगता। उसके बाद मैंने उसे शख़्स को कभी नहीं देखा।

जब मैं 19 साल की थी, तब भी इसी तरह की घटना हुई थी। मैं अपने परिवार से दूर एक हॉस्टल में रह रही थी और मुझे पता नहीं था कि इस एहसास से कैसे निपटना है। मुझे हेलुसिनेशन  होने लगे थे और मेरे साथ साथ आसपास के सभी लोग उसी के कारण बहुत परेशान थे। हेलुसिनेशन शुरू होने से पहले मिनटों के लिए कांप जाया करती थी।

डॉक्टर के पास इस मर्ज़ का इलाज़ करने जब पहुंची तब मुझे मुझे पता चला कि मैं पीटीएसडी (पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) से ग्रसित थी. इसके बाद मुझे कई दवाएं दी गईं। अब इतना होने के बाद मेरे भाई और मैंने इसके बारे में अपने माता-पिता से बात करने का फैसला किया। उनको अपनी इस बीमारी के मारे में बताने में भी मैंने कई दिक्क्तों का सामना किया। शायद इस कारण से क्यों कि हम सभी अपने देश में मानसिक बिमारियों को एक अलग नज़रिये से देखते हैं। मुझे इन्हें यह समझाने में दिक्कत आयी कि मेरे साथ जो 19 साल की उम्र में हो रहा था उसका कारण 9 साल पहले मेरी ज़िन्दगी से जुड़ी एक घिनौनी कहानी है।

इन सब से तंग आ कर मैंने अपनी जान लेने की सोची। इसके लिए भी मैंने उसी चीज़ का सहारा लिए जिससे मेरी बीमारी ठीक हो सकती थी. मैंने दवाइयों का ओवरडोज़ ले लिए और नतीजे में मुहे कुछ दिनों तक आईसीयू में रखा गया। इस बात की खबर जब घर पर मेरे भाई और माता-पिता को लग तो वो भागे भागे मुझसे मिलने आए. उस वक़्त मैंने उन्हें सब कुछ समझाया कि मेरे साथ क्या हुआ था।

मेरी बातें सुनकर वो जैसे ज़मीन में गड़ हो लेकिन उन्होनें मेरा पूरी तरह से साथ देने का फैसला किया। मेरी माँ मेरे साथ तीन महीने तक रही। इसके बाद जब मैं अपनी गर्मियों की छुट्टी के लिए उसके साथ घर वापस गयी तभी मैंने फैसला किया कि मैं बहुत झेल चुकी और मैं दूसरे बच्चों को भी वैसी स्थिति से गुजरने नहीं दे सकती।

 

अतीत में मेरे साथ हुए कुछ बुरे पल के अनुभव मेरी पूरी ज़िन्दगी पर हावी हो रहे थे। मैंने इस दर्द को अपने दिमाग में छिपाए रखने के बजाय, मैं अपनी सारी परेशान भावनाओं को किसी ऐसी चीज़ में शामिल करना चाहता था जिसके माध्यम से मैं दूसरों की मदद कर सकूं।

मैं कुछ हफ़्तों तक दोस्तों के साथ बैठी रही और फिर एक कैंपेन शुरू करने का फैसला किया, जिसका नाम था ब्रेक द साइलेंस। इस कैंपेन के साथ, मैंने छोटे बच्चों को अच्छे स्पर्श, बुरे स्पर्श और यौन शिक्षा के बारे में सिखाने के लिए बिहार, गुजरात और नेपाल की यात्रा की।

वालंटियर्स के साथ, ब्रेक साइलेंस ने अब तक लगभग 50,000 बच्चों को जागरूक किया है। मेरे लिए यह ज़रूरी था कि  न केवल उस चीज से बचे जिससे से मैं गुज़री थी बल्कि यह भी कि वो इस चीज़ को समझ पायें कि गलत उनके साथ कुछ गलत हो रहा है। मैं जितना ज़्यादा हो सके उतने ज़्यादा बच्चों को इसके बारे में बताना चाहती हूँ।

 

कहानी: शिवानी अग्रवाल

 

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