सचेत

मथुरा: कृष्ण जन्मस्थान परिसर से ईदगाह मस्जिद हटाने के लिए याचिका दायर

तर्कसंगत

Image Credits: Mathura.nic

September 27, 2020

SHARES

उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर में श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर के पास स्थित शाही ईदगाह मस्जिद को वहां से हटाने के लिए अदालत में एक याचिका दायर की गई है.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह मुकदमा ‘भगवान श्रीकृष्ण विराजमान, कटरा केशव देव खेवट, मौजा मथुरा बाजार शहर’ के नाम से उनके अंतरंग सखी रंजना अग्निहोत्री और छह अन्य भक्तों ने दाखिल किया है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि 17वीं शताब्दी में मुगल शासक औरंगजेब के आदेश पर हिंदू मंदिर को तोड़कर इस मस्जिद को बनाया गया था.

श्री कृष्ण विराजमान ने शुक्रवार को मथुरा की अदालत में एक सिविल मुकदमा दायर कर 13.37 एकड़ की श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर मालिकाना हक की मांग की है.

1968 का समझौता अवैध

उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन द्वारा बीते शुक्रवार को मथुरा की एक अदालत में दाखिल की गई याचिका में कहा है कि 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान एवं शाही ईदगाह प्रबंध समिति के बीच हुआ समझौता पूरी तरह से गलत है तथा उसे निरस्त किया जाए.

मुकदमे में कहा गया है कि 1815 में अंग्रेजों ने जमीन की नीलामी कर राजापाटनी मल को बेची थी. 1944 में राजापाटनी के वारिसों ने जमीन पंडित मदन मोहन मालवीय, गोस्वामी गणेश दत्त को 19,400 रुपये में बेच दी. उन्होंने मार्च 1951 में एक ट्रस्ट बनाया और जमीन पर मंदिर बनाने की घोषणा की.

अक्टूबर 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह सोसाइटी के बीच जमीन का ट्रस्ट होने पर समझौता हुआ था.

दिवानी न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) छाया शर्मा की अदालत में शुक्रवार को लखनऊ निवासी रंजना अग्निहोत्री व त्रिपुरारी त्रिपाठी, सिद्धार्थ नगर के राजेश मणि त्रिपाठी एवं दिल्ली निवासी प्रवेश कुमार, करुणेश कुमार शुक्ला व शिवाजी सिंह की ओर से दाखिल किए गए वाद में श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर में बनी शाही ईदगाह मस्जिद को जमीन देने को गलत बताया गया है.

याचिका में कहा गया है कि 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ (जो अब श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के नाम से जाना जाता है) व शाही ईदगाह मस्जिद के बीच जमीन को लेकर समझौता हुआ था. इसमें तय हुआ था कि मस्जिद जितनी जमीन में बनी है, बनी रहेगी.

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991

श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर दायर किए गए इस मुकदम में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 एक बड़ी अड़चन है. इसके तहत देश में 1947 में मौजूद धार्मिक स्थलों की यथास्थिति को बदलने वाले मामलों को कोर्ट नहीं ले जाया जा सकता है. हालांकि, इस एक्ट के जरिए के विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मुकदमेबाजी को लेकर मालकिना हक पर मुकदमे के लिए छूट दी गई थी. ऐसे में अब इस मामले में छूट मिलना डेढ़ी खीर होगा.

13.37 एकड़ जमीन पवित्र

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि विवादित स्थल कत्रा केशव देव (ऐतिहासिक नाम) की 13.37 एकड़ भूमि का एक-एक इंच भगवान श्री कृष्ण के भक्त एवं हिंदू समुदाय के लिए पवित्र है. याचिका में दावा किया गया है कि कृष्ण का जम्मस्थान ‘वास्तविक कारागार’ मस्जिद समिति के द्वारा बनाए गए निर्माण के नीचे ही स्थित है और वहां पर खुदाई होने पर सच्चाई का पता चलेगा.

उन्होंने दावा किया कि सेवा संघ और मस्जिद समिति ने समझौता करते एक ‘मानव-निर्मित कारागार’ बना दिया था, ताकि राजनीतिक कारणों के चलते लोगों से सच्चाई छिपाई जा सके.

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 26 तहत उन्हें अधिकार है कि वे भगवान श्री कृष्ण विराजमान की जमीन का देखरेख कर सकें.

सुप्रीम कोर्ट की रोक

पिछले साल 9 नवंबर को अयोध्या पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने ऐसे मामलों में काशी मथुरा सहित देश में 1947 के समय के मौजूद धार्मिक स्थलों पर नए मुकदमे दायर करने पर रोक लगा दी थी.

रंजना अग्निहोत्री ने कहा कि मथुरा कोर्ट ने पहले ही उनकी याचिका को स्वीकार कर लिया है और सोमवार को उसकी कॉपी मिलने की उम्मीद है. प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 पर उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा भरोसा है कि मुकदमे पर स्थगन आदेश जैसी कोई समस्या नहीं आएगी. उन्होंने एक्ट का अध्ययन करने के बाद ही मुकदमे का आधार तैयार किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्यों के आधार पर मुकदमे को हरी झंडी मिलेगी.

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...