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उत्तराखंड की ये महिला बॉक्सर महिलाओं को योग सिखाने के लिए हर बाधा पार कर रही हैं

तर्कसंगत

Image Credits: Hindustan Times

September 27, 2020

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17 वर्षीय एक मुक्केबाज नैनीताल जिले के हल्द्वानी शहर में अपने समुदाय की लगभग 40 महिलाओं को योग सिखाने के लिए सभी बाधाओं से लड़ रही है।

विनम्र पारिवारिक पृष्ठभूमि से आयी रेहानुमा मिकारानी के पिता एक ऑटोरिक्शा चालक हैं। जबकि उनकी माँ एक आंगनवाड़ी केंद्र में काम करती हैं। जब लॉकडाउन की घोषणा हुई, तो रेहनुमा ने अपने समुदाय की महिलाओं को योग और अन्य व्यायाम सिखाने का फैसला किया। वह एक राज्य स्तरीय मुक्केबाज हैं और पहले भारतीय खेल प्राधिकरण उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के डे-बोर्डिंग एक्सटेंशन सेंटर में प्रशिक्षण ले चुकी हैं।

शुरुआत में, उन्होंने सिर्फ चार महिलाओं को योग सिखाना शुरू किया। अब, उनके समुदाय की लगभग चालीस महिलाओं का एक बैच है। कक्षाएं प्रत्येक सुबह स्थानीय खेल के मैदान में आयोजित की जाती हैं।

हालांकि, पहल एक आसान शुरुआत नहीं थी। इसके लिए, उन्हें समुदाय के कुछ सदस्यों की आलोचना सहित सभी प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ा। उन्हें स्थानीय लड़कों की भद्दी टिप्पणियां भी झेलनी पड़ी।

रहनुमा ने कहा कि यह जुलाई में शुरू हुआ जब मेरी मां और कुछ अन्य महिलाओं ने उन्हें योग सिखाने के लिए कहा। एक स्पोर्ट्स पर्सन होने के नाते, उन्हें इस तरह की चीजों में प्रशिक्षित किया गया था और यह उनके लिए योग में दूसरों को प्रशिक्षित करने के लिए भी सहायक था।

लॉकडाउन में वो अपने घर के पास एक खेल के मैदान में व्यायाम करती थी। वहां कुछ मुस्लिम महिलाओं को अपने घरों के पास कुछ बुनियादी व्यायाम करते हुए देखती थी लेकिन उचित तरीके से नहीं। अपनी माँ के साथ इस पर चर्चा करने के बाद, उन्होंने उनसे उन्हें ठीक से प्रशिक्षण देने के बारे में पूछने का फैसला किया। तीन महिलाएं सहमत हुईं और फिर वो भी रहनुमा की कक्षाओं में शामिल हुईं।

 

तो अब इस छोटे से ग्रुप ने सुबह 5.30 बजे से योग और अन्य अभ्यास कारण शुरू किया जो सुबह 7 बजे तक चलता था। रेहानुमा ने कहा कि यह उनके लिए शुरू में बिल्कुल भी आसान नहीं था क्योंकि कुछ पुरुष रास्ते में रुक कर उन्हें देखा करते थे। न केवल लोग रस्ते पर रुक कर उन्हें देखा करते थे भद्दे टिप्पणियां भी किया करते थे। उन्हें कई लोगों द्वारा घर पर बैठने के लिए कहा गया, जिन्होंने उन्हें योग करते देखा। प्रारंभ में, उन्होंने उन लोगों के लिए कोई भी ध्यान नहीं दिया जो उनके बारे में टिप्पणी करते थे। लेकिन जब यह एक हद पार कर बढ़ता गया, तो रहनुमा ने उन सबका सामना किया, उनकी आवाज़ उठाने के बाद से उनक लोगों  पर की जाने वाली भद्दी टिप्पणी बंद कर दी गयी।

योग का अभ्यास करने के लिए कई महिलाएं बुर्का पहनती हैं। एक और योग सीखने वाली लड़की जो  जो शुरू से ही रेहानुमा के साथ रहा है, वह हैं समरीन खान है। समरीन ने कहा कि जैसा कि ज्यादातर महिलाओं को स्वतंत्रता नहीं है और उनसे घूंघट या बुर्का में रहने की उम्मीद की जाती है, ऐसे हालात को देख्रकर उन दोनों ने इन महिलाओं को बुर्का में ही योग सिखाने का फैसला किया।

“अधिकांश महिलाएं बुर्के में हमारे साथ योग का अभ्यास कर रही हैं और उन्हें इससे कोई समस्या नहीं है। वे कहते हैं, ऐसा करके वे रीति-रिवाजों को कायम रखने में सक्षम हैं और योग का अभ्यास अपने स्वास्थ्य और फिटनेस के लिए भी करते हैं।” समरीन ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया।

उन्होंने यह भी कहा कि शुरू में कई महिलाएं उनके साथ जुड़ने में संकोच कर रही थीं, लेकिन जब एक बार वे शामिल हुई तो वो धीरे धीर योग के लाभों को भी समझने में सक्षम थीं। कई सारी महिलाओं ने समूह में शामिल होने के बाद, उन्होंने कई योग आसन और व्यायाम सीखे हैं जिनके माध्यम से वे अपने स्वास्थ्य में सुधार कर पायी हैं। इस पहल को समुदाय के कई प्रमुख सदस्यों ने सराहा है।

 

तर्कसंगत का तर्क

रहनुमा की कहानी कई मायनों में प्रेरणादायक है। छोटे से शहर की लड़की जो पुरुष प्रधान खेल में अपनी पहचान बना रही है। इतना  ही नहीं जब कोरोना के लॉक डाउन की घोषणा शरू हुई तो भी एक कर्तव्यनिष्ठ और सच्चे स्पोर्ट्सपर्सन की तरह अपनी ट्रेनिगं और प्रैक्टिस को जारी रखने की हर संभव कोशिश की है।

सबसे अच्छी और बड़ी बात है कि उन्होनें अपने साथ साथ अपने समाज की महिलाओं को भी शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए जागरूक किया। न केवल जागरूक किया बल्कि भारत की सबसे पुरानी योग विद्या के सहारे उनको स्वास्थ्य बनाने की कोशिश भी कर रही है। कई बार हम किसी भी कला या शिक्षा को उसकी उतपत्ति और उसके मानने वालों के धर्म से जोड़ कर देखते हैं। मगर रेहनुम इन सारे संकीर्ण विचारधारा से ऊपर उठ कर योग को सीखा और दूसरी महिलों को सिंहने का प्रयास किया जो कि काबिले तारीफ है। रहनुमा की तरह बाकि महिलाओं और निश्चित तौर पर उनके घरवालों ने भी परिपक्वता का परिचय देते हुए इस योग विद्या को सीखा जो कि सराहनीय है। ताज्जुब इस बात की है जब हम आज भी इतनी प्रगतिवादी सोच और समाज का दम भरने वाले लोग खुले में व्यायाम कर रही महिलाओं पर भद्दी टिप्पणियां करते हैं।

ये कतई ही एक सभ्य समाज की निशानी नहीं है। हमें महिलओं को हर क्षत्र में आगे आने देने के लिए प्रोत्साहन करना चाहिए। पोषण से ले कर शारीरिक स्वाथ्य तक महिलाएं अपने परिवार को आगे कर खुद के साथ कई सारे समझौते करती हैं। ऐसे में रेहनुमा जैसे लोगो की वजह से उन महिलाओं को और समाज के दूसरे लोगों को इस समस्या से अवगत होने का मौका मिलता है।

हम रहनुमा जैसी सोच और हिम्मत लाने का प्रयास करें जो महिलाओं की मदद के लिए आगे रहती हैं। जो कि भविष्य में स्वास्थ्य भारत की परिकल्पना को पूरा करने में एक छोटी ही सही मगर काफी असरदार और कारगर भूमिका अदा कर रही है।

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