सप्रेक

कोरोना के दौरान जब मास्क पहनना ज़रूरी हो गया तो एसिड अटैक सर्वाइवर्स ने समाज के मूक बधिर लोगों के बारे में भी सोचा

तर्कसंगत

September 30, 2020

SHARES

COVID-19 महामारी की शुरुआत के साथ, मास्क हर किसी के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है क्योंकि यह संक्रमण के प्रसार को रोकने और किसी भी हवाई संक्रमण से किसी व्यक्ति को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हालांकि, चेहरे के आधे हिस्से को कवर करने वाले  मास्क के साथ आम लोगों की दिक्क्तें उतनी बड़ी नहीं जितनी कि मूक बधिर लोगों के लिए बड़ी दिक्कत है। ऐसे विशिष्ट दिव्यांगों लोगों के लिए अपनी बात कह पाना या दूसरों की बात समसझ पाना एक चुनौती बन जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया की आबादी के 5% से अधिक या समझ लें तो 466 मिलियन लोगों में सुनने की शक्ति नहीं है,ऐसे लोगन के लिए लिप रीडिंग या इशारों को समझना ही किसी की बात को समझने का एकमात्र जरिया है। जिसमें 432 मिलियन वयस्क और 34 मिलियन बच्चे शामिल हैं।

 

पूर्ण रूप से बहरे और आंशिक रूप से सुनने में असमर्थ लोग संवाद करने के लिए लिप रीडिंग और आप के चेहरे के भावों के सहारे ही आपके द्वारा कही गयी बातों को समझ सकते हैं और चेहरे के आधे हिस्से को मास्क से ढक लेने के कारण उनके बातचीत का जरिया खत्म हो जाता है।

इसी समस्या को हल करने के लिए कुलसुम शादाब वहाब की होथुर फाउंडेशन एक नयी विचार एक नए तरह की मास्क का ईजाद किया जो देश के बधिरों और आंशिक रूप से बधिर लोगों के लिए वरदान साबित हो रहा है। ये नए अनूठे तरह का मास्क कोरोनोवायरस संकट के दौरान बधिरों के काफी काम रहा है।

होथुर फाउंडेशन समाज में लड़कियों की शिक्षा पर लोगों को जागरूक करता है, साथ ही समाज के उपेक्षित तबके की बेहतरी की दिशा में अथक प्रयास कर रहा है, इतना ही नहीं दिव्यांग बच्चों के पुनरुत्थान के लिए भी काम कर रहा है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनका एक महत्वपूर्ण अभियान है एसिड अटैक सर्वाइवर्स को पुनर्वास और सशक्त बनाना।

फाउंडेशन से जुड़े एसिड अटैक सर्वाइवर्स हस्तनिर्मित हेडगेयर को डिजाइन करने और बनाने में लगे हुए हैं। अब, इन सर्वाइवर्स ने मूक बधिर लोगों की लिप रीडिंग की ज़रूरत को देखते हुए मास्क बना रहे हैं।

 

 

तर्कसंगत से बात करते हुए, कुलसुम कहती हैं, “ले मॉट्स का मतलब होता है शब्द। ये विशेष रूप से बनाये हुए मुखौटे हैं जिनमें होठो के पास पारदर्शी सामान लगा होता जिससे लिप रीडिंग में मुश्किल नहीं होती और दिव्यांग एक दूसरा की बात को समझ सकते हैं ।”

वह आगे कहती हैं “ले मॉट्स मास्क एसिड अटैक सर्वाइवर्स द्वारा बड़े प्यार से बनाए गए हैं जिससे उनकी कोशिश है कि दुनिया को मूक बधिर लोगों के लिए एक बेहतर और आसान जगह बनाया जा सके। मुझे उनकी रचनात्मकता और प्रतिभा पर वास्तव में गर्व महसूस होता है।”

इस तरह के मुखौटे को डिजाइन करने का विचार उनको आये कैसे ? इस सवाल पर बोलते हुए, कुलसुम कहती हैं, “अधिकांश एसिड हमले में जीवित रहने वाली महिलाओं की आजीविका सिलाई पर निर्भर करती है। ये महिलाओं एक सशक्तिकरण प्रोजेक्ट, पर आरा लुमियर अभियान के अंतर्गत काम कर रही थी जहाँ कुछ सर्वाइवर्स ने मूक बधिर लोगों के साथ काफी नज़दीक से काम किया और पाया कि महामारी के दौरान उन्हें काफी दिक्कत आ रही थी।

 

 

“पहली दिक्कत ये कि अपनी बात समझाने के लिए मास्क हटाने से वायरस के संपर्क में आने का जोखिम और दूसरा, कि अगर मास्क  नहीं हटाते तो दूसरों की होंठों को पढ़े बिना संवाद नहीं कर सकते थे, जिससे कि मास्क पहनना असंभव हो जाता था। इन साड़ी मुश्किलों को देखते हुए उन्हें इस नए तरह के मास्क को डिजाइन करने के ख्याल आया जिससे की आप मूक बधिर के होठ भी देख सकें।” “एक तरह से बिना वायरस के जोखिम में पड़े हुए बातचीत की आसानी पहले की तरह कायम थी” कुलसुम ने तर्कसंगत को बताया।

उन्होंने आगे कहा कि पारम्परिक मास्क से बातचीत में आनेवाली बाधा लोगों के रोजमर्रा के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है, जो विशेष रूप से विकलांग लोगों के बीच अकेलेपन, अलगाव और निराशा की भावनाओं को जन्म दे सकती है।

जिस तरह से कोविड ​​-19 महामारी ने बचे लोगों के जीवन को बाधित किया, उस पर बात करते हुए, कुलसुम कहती हैं, “एसिड अटैक सर्वाइवर्स में से कई महामारी के कारण हुए लॉकडाउन की स्थिति में घर में रहने के दौरान गंभीर घरेलू हिंसा का सामना कर रही थी। उस समय, हमारे पास अपने सुरक्षित घरों में शरण लेने वाली कई महिलाएं थीं। जिन्हें हम पेशेवर परामर्श और वित्तीय और कानूनी सहायता प्रदान कर रहे थे। रोजगार की असुरक्षा, भोजन की कमी, अपमानजनक पतियों ने उन्हें और उनके बच्चों को और परेशान किया।”

 

 

फाउंडेशन ने महामारी के दौरान सर्वाइवर्स के लिए एक सुरक्षित आश्रय बनाया है और उनकी सभी आवश्यकताओं के लिए मदद प्रदान कर रहा है जिसमें भोजन, चिकित्सा आवश्यकताएं, मनोवैज्ञानिक सहायता और आजीविका शामिल है।

सरोजिनी नाम की एक सर्वाइवर्स ने बताया कि “जब लॉकडाउन शुरू हुआ, तो हमें हर जगह मास्क पहनना पड़ा। हमारी थेरेपी के दौरान मैंने अपने सहकर्मी को बात करने और सुनने की कोशिश करते समय मास्क के साथ तकलीफ उठाते देखा। इसी तरह मुझे एक ‘सी थ्रू मास्क’ बनाने का आईडिया आया। मैंने सोचा कि इस आईडिया से मेरे दोस्तों और जो शारीरिक रूप से बात करने और आसानी से सुनने में सक्षम नहीं है उन्हें बड़ी मदद मिलेगी।

अपने टीम की सरहना करते हुए कुलसुम कहती हैं, “ले मोट प्रतिभा से भरा एक काम है। मुझे सरोजिनी को एक पारदर्शी मास्क का आईडिया देते देख काफी गर्व महसूस हुआ। हमने हमेशा अपने बीच रह रहे लोगों में विश्वास दिखाया है। हम एक समूह एक परिवार की तरह एक दूसरे की मदद करते है और इस मास्क के पीछे का विचार वास्तव में हमारी उसी सोच और भरोसे पर खरा उतरा है।”

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...