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अमेरिका के सिलिकॉन वैली के करोड़पति और जोहो के संस्थापक अब तमिलनाडु के गाँव में बच्चों को क्यों पढ़ा रहे हैं?

तर्कसंगत

Image Credits: The Indian Express, Twitter/ Sridhar Vembhu

October 13, 2020

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जोहो कॉरपोरेशन के संस्थापक, श्रीधर वेम्बु, वैसे तो सिलिकॉन वैली स्टार के नाम से भी जाने जाते हैं मगर अब एक शिक्षक के रूप में उनकी नई भूमिका में लोग उन्हें देख रहे हैं. उन्हें इन दिनों तमिलनाडु में एक साइकिल पर सवार देखा जा सकता है। दुनिया भर में नाम और शोहरत कमाया हुआ ये व्यक्ति तमिलनाडु में माथलमपराई गाँव के स्थानीय लोगों के लिए, वह एक समर्पित शिक्षक है जो गाँव में घूमता है और इस बात का ख्याल रखता है कि गाँव के बच्चों को शिक्षा प्राप्त हो।

 

छः महीने पहले हुई शुरुआत

उनका ये नया काम छह महीने पहले तीन बच्चों के लिए होम ट्यूशन के रूप में शुरू हुआ था। प्रारंभ में, यह अपने खाली समय के दो-तीन घंटे इस काम में लगाते थे। लेकिन अब उनकी इस छोटी सी पहल का नया विस्तार होने जा रहा है. अब उनके साथ गाँव के चार शिक्षक भी जुड़ चुके हैं जो साथ में मिल कर बच्चों की कक्षाएं चलाते हैं। उनके द्वारा पढ़ाए जा रहे सभी बच्चे ज्यादातर खेतिहर मजदूरों के परिवारों से संबंधित हैं।

 

नए मॉडल की पढ़ाई

इस पहल के माध्यम से प्रभाव को देखने के बाद, वह अब अपने इस “लॉकडाउन प्रयोग” को अगले स्तर पर ले जाने के लिए तैयारी कर रहे है। पारंपरिक शिक्षा में विश्वास नहीं करने वाले श्रीधर वेम्बु एक नए मॉडल के साथ आए हैं जो डिग्री या दूसरे तरह के सर्टिफिकेट्स पर न ज़्यादा भोरसा करते हैं न ज़्यादा रूचि ही रखते हैं।

उन्होंने “एक रूरल स्कूल स्टार्ट-अप” स्थापित करने की योजना बनाई है जो कि एक पारंपरिक स्कूली शिक्षा प्रणाली से अलग होगी। इस स्कूल के साथ, वह बच्चों को मुफ्त शिक्षा के साथ-साथ भोजन भी देना चाहते हैं। अभी के लिए, वह पूरी तरह से आश्वस्त है कि उनका स्कूल किसी भी पारंपरिक शैक्षिक बोर्ड से संबद्धता या एफिलिएशन के लिए आवेदन नहीं करेगा।

ऐसा नहीं है कि ये उनके लिए कोई पहला प्रयोग है अपने पिछले कार्यकाल में, जोहो विश्वविद्यालय का प्रबंधन करते हुए, उन्होंने कक्षा 10, 11 और 12 ड्रॉपआउट छात्रों को आईटी पेशेवरों में बदलने के लिए सफलतापूर्वक मदद की है। यहां तक ​​कि पर्याप्त प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होनें कई छात्रों को अपने फर्म में महत्वपूर्ण भूमिकाएं भी दी हैं।

 

उनके स्कूल में खास क्या है?

उनकी स्कूल दुसरो से अलग कैसे है इस बात का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अपने स्कूल में उन्होनें बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार अलग-अलग कक्षाओं में नहीं बांटा हैबल्कि उनकी रूचि और हुनर के आधार पर अलग अलग क्लास में रखा है।

लॉकडाउन नियमों के साथ, छात्रों के लिए कक्षाएं संचालित करना उसके लिए आसान नहीं रहा है। वेम्बु ने बताया किया कि उनमें से कई बच्चों के लिए यह संभव नहीं था कि वे स्मार्टफोन के साथ ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लें। वेम्बू अपने ओपन-एयर क्लास में सोशल डिस्टैन्सिंग के साथ पढ़ाना शुरू किया। देखते देखते छात्रों की संख्या तीन से बढ़कर 25 हो गई, उन्होंने महसूस किया कि एक शिक्षक के कर्तव्यों को पूरा करना कठिन है।

उन्होंने देखा कि कई बच्चे घर पर कोई भोजन किए बिना ही अपने ट्यूशन सेंटर में आ जाया करते थे। उन्हें तब इस बात को महसूस किया कि ऐसे छात्रों के लिए कुछ भी सीखना या अध्ययन करना मुश्किल है क्योंकि बच्चा भूखा है।

वह आगे कहते हैं कि उनका ‘स्कूल’ एक दिन में दो समय भोजन उपलब्ध कराता है, और बच्चों को घर भेजे जाने से पहले लगभग 4.30 बजे नाश्ता दिया जाता है। वेम्बू के अनुसार, अच्छे इरादों के साथ चेन्नई या दिल्ली में बनाई गई नीतियां गाँवों तक पहुँचते पहुँचते बेअसर हो जाती हैं या कई बार पहुँच भी नहीं पाती।

उन्होनें अपने इस काम के दौरान कई साड़ी चीज़ों को गौर से अध्ययन किया और पाया कि सरकारी नीतियों को लागू करने के लिए पर्याप्त जमीनी प्रतिभा नहीं है. यह एक प्रमुख कारण है कि नीतियां जमीनी स्तर पर सफल नहीं हो पाती हैं।

अब तक उन्होंने जिन बड़ी चुनौतियों का सामना किया है, उनमें से एक गांव में  ड्रॉपआउट छात्रों को दोबारा स्कूल ले कर आना। उनके सामने एक और चुनौती है गांव में शिक्षकों की कमी की। उनके काम में सहयोग करने वाले अधिकांश शिक्षक शहर से यात्रा करते हैं जो कम से कम 30-40 किमी दूर स्थित है।

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए उन्होनें कहा कि “शराब एक और गंभीर समस्या है। एक पिता अगर काफी ज़्यादा शराबी है तो वह घर पर पर्याप्त कमाई ले कर नहीं आएगा और नतीजतन बच्चे उपेक्षित रहेंगे।  वेम्बु जोर देकर कहते हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली में प्रमाणिकता या सर्टिफिकेट्स एक सबसे बड़ी समस्या है और इस कारण से अधिकांश छात्र जो काफी तेज़ भी होते है वो केवल अच्छी ग्रेड लाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, उनके अनुसार बच्चों द्वारा अर्जित ज्ञान पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।

वह गैर-पारंपरिक प्रणाली से बच्चों को पढ़ाने की आवश्यकता पर ज़ोर देते है।

 

तर्कसंगत का तर्क

कोरोना महामारी ने जहाँ एक तरफ हम सभी को अपने घर में बंद कर रखा है. वहीँ इसके साथ ही हमें कुछ अच्छे करने के लिए नए अवसर भी दिया हैं. वेम्बू की कहानी भी ऐसी ही कहानियों में से एक है. अमेरिका की सिलिकॉन सिटी में नाम कमाने के बाद उन्होनें अपने पैतृक गाँव का रुख किया है. न केवल गाँव का रुख ही किया बल्कि ये कोशिश भी की है कि भविष्य में उनके गांव से ऐसी प्रतिभाओं को संवारा जा सके जो आगे जा कर देश का नाम रोशन करें। अपने इस कोशिश को समझते हुए उन्होनें ज़मीनी स्तर पर पारम्परिक शिक्षा के असफल होने के कई कारण को गौर से देखा है।

इसी कारण से उन्होनें उसकी कमियों को भी भली भांति जाना है और अपने स्तर पर उन कमियों को हटा कर एक बेहतर और आधुनिक शिक्षा प्रणाली देने का सफल प्रयोग कर रहे हैं. हम उम्मीद करते हैं कि उनकी ये कोशिश आगे चल कर केवल उनके गाँव तक ही सिमित न रहे बल्कि भारत भर में इसका अनुसरण किया जाये।

ऐसा नहीं है कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली में केवल कमियां ही हैं मगर समय के साथ और भविष्य की रूपरेखा को तैयार करने के लिए बेहतर होगा यदि हम अपने शिक्षा प्रणाली में योग्यता अनुसार बदलाव लाएं।

 

 

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